बरिष्ठ कवयित्री, छत्तीसगढ़
मैं इतिहासकार, न भूगोल-खगोलवेत्ता हूँ, न ही कोई वैज्ञानिक। लेकिन निम्नांकित बात बिना शोध-अनुसंधान के, साधारण बुद्धि वाली मुझ जैसी एक कवयित्री को भी समझ आ सकती है, तो मेरा मानना है कि हर कोई इस तथ्य को समझ सकता है। लेकिन दूसरों को उलझाकर भटकाने वाले लोग स्वयं भटकते हैं।
दुनिया में सबसे प्राचीन लिखित ग्रंथ वेद हैं। वेद चार हैं। सनातनी वेद को स्वयं भगवान मानते हैं। वेद ब्रह्मा-ब्रह्माणी के हाथों में रखे हुए हजारों साल पुरानी मूर्तियों में दर्शाए गए हैं। वेद और इस पृथ्वी की उत्पत्ति हिंदू धर्म के अनुसार एक साथ हुई। कथा भी है कि राक्षस वेद को चुराकर ले जा रहे थे, जिसे भगवान विष्णु ने राक्षस को मारकर बचाकर लाए थे ।
चारों वेदों में यज्ञ, संगीत, स्वास्थ्य, देवार्चन का वर्णन है।
देव कौन हैं? — प्रकृति, चंद्र, सूर्य, धरती, ग्रह, नक्षत्र, सितारे।
त्रिदेव ही परमात्मा हैं।
मैं आज वेद पर नहीं लिख रही हूँ। मेरी इतनी बुद्धि भी नहीं कि वेद पर कुछ लिख सकूँ। मैं वेद विरोधियों की ओर उन्मुख हूँ।
जब वेद इतने प्राचीन और प्रथम हैं, तब मान लीजिए कि इसे आर्यों ने लिखा और हजारों वर्षों में व्यक्ति और समाज के हितार्थ हजारों लोगों ने इसे लिखा या संकलित किया। क्योंकि कहीं मैंने इस प्रकार का विचार भी पढ़ा है। तब तो आर्य भारत में उससे भी पहले से, ज्ञान-विज्ञान से पूर्ण और भौगोलिक रूप से यहाँ बसे हुए रहे हैं। तभी तो उन्होंने गंगा, यमुना, सरस्वती का आदि इतिहास और उद्गम, उत्पत्ति अपनी आँखों से देखी और उनकी महत्ता लिखी। यहाँ तक कि हिमालय में बंद उमड़-घुमड़ रही गंगा को नहर बनाकर मैदानों में लाने वाले भी यही आर्य हैं, जो राम के पूर्वज भागीरथ थे। तो गंगा लाने वाले विदेशी और गंगा देशी कैसे हुई? समुद्र से भूमि माँगकर केरल प्रांत बसाने वाले आर्य अगस्त्य ऋषि विदेशी और केरल देशी कैसे हुआ?
कुछ महामानव कह सकते हैं कि ये पौराणिक बातें हैं, प्रमाण नहीं हैं। प्रमाण ये हजारों साल पहले लिखे ग्रंथ ही तो हैं। जिसे इन्हें नहीं मानना है, वे अपनी आँखों देखे दृश्य, तथ्य, कथ्य भी नहीं मानते।
अब जो लोग इस भूमि पर गंगा के आगमन के समय से पहले से रह रहे हों, धरती की उत्पत्ति के साथ से रह रहे हों, वे आर्य, वे सनातनी हिंदू यूरेशिया से आए हुए कैसे हो गए?
यह मूल और अमूल / आर्य और अनार्य भारतीय का सिद्धांत भारत में किसने और क्यों लाया? समझिए।
भारतवर्ष एक विशाल उपमहाद्वीप है और पहले इससे भी बड़ा हुआ करता था। यहाँ हर प्रकार की जलवायु है। यहाँ से अक्षांश-देशांतर की रेखाएँ गुजरी हैं।
यहाँ पृथ्वी और ब्रह्मांड की धुरी उज्जैन क्षेत्र में पड़ती है। इस जलवायु विविधता और अक्षांश-देशांतर रेखाओं में पड़ने के कारण यहाँ हर प्रजाति के मनुष्य, हर प्रकार की फसल और खनिज भी पाए जाते हैं।
इसी तरह हर प्रजाति के मनुष्य भी भारत में पाए जाते हैं — निग्रो, मंगोल, कॉकेशाइड, ऑस्ट्रेलाइड आदि। ये सब अंश-वंश कुछ नहीं, सभी भारतीय हैं। विविधता केवल जलवायु के कारण है। आज विज्ञान भी कहता है कि मनुष्यों में 99.9% डी.एन.ए. एक जैसा है। 1% का अंतर त्वचा के रंग, बाल, ऊँचाई आदि में है, वह भी जलवायु के कारण है। भारत में सभी प्रजातियाँ पाई जाती हैं और सभी मूल भारतीय ही हैं।
साथ ही अपने कुल, देश, समाज, क्षेत्र आदि के नवीन देवों, अवतारों, गुरुओं, संतों का पूजन-आराधन और आराध्य मानते हुए संपूर्ण भारत में वेद और वैदिक देवताओं के साथ परम ‘ॐ’ त्रिदेवों और उनकी शक्ति की पूजा होती रही है और आज भी है। पूरे भारत के लोगों का धार्मिक और मानवीय रूप से मानसिक जुड़ाव रहा है।
अपनी जलवायु के कारण फसल-विविधता, खान-पान में भी कुछ विविधता रही। जैसे वन क्षेत्र वालों का वनोपज व मांस, एवं समुद्र किनारे वालों का मछली।
भाषायी रूप से भी संपूर्ण भारत एक रही। संस्कृत मूल थी और उससे उत्पन्न अनेक देशज भाषाएँ प्रांत-प्रांत में बोली जाती थीं। कृषि मुख्य कार्य था और बाकी सभी व्यवसाय कृषि और जीवनोपयोगी कार्यों से जुड़े थे।
विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले इन्हीं वेदों-उपनिषदों के अनुसार ही भारत के नियम-कानून चलते रहे।
एक प्रश्न सदैव भटके हुए लोग उठाते हैं — इतनी समृद्ध सभ्यता होते हुए भी इन आक्रांताओं को भारत पर कब्जा करने से कोई रोक क्यों नहीं सका? इसका उत्तर है: भारत में युद्ध भी एक धर्म और मानवता के नियम से लड़े जाते थे। बर्बर, दानव जैसे असभ्यों से, जिनका सब कुछ तलवार और उद्देश्य धर्म-विस्तार हो, उनसे अकेले-अकेले राजा लोग कब तक लड़ते? भारत के राजाओं में सामूहिकता, सहयोग और एकता की भावना कम रही। फिर भी अंग्रेजों के आगमन तक भारतीय राजा इनसे लड़ते ही रहे। इनका अधिकतम भारत पर कब्जा अवश्य रहा, किंतु पूरे भारत पर कभी नहीं रहा।
फिर आए अंग्रेज… इन लोगों ने देखा कि 7-8 सौ वर्षों तक तलवारों के दम पर हुकूमत करके भी आक्रांता सनातन को मिटा नहीं सके, यहाँ पूर्ण धर्मांतरण नहीं करा सके। तब इन्होंने अपनी रणनीति बदली। खोज की कि ऐसा क्या है जो भारत और भारतीयों को तोड़ नहीं पा रहा। निष्कर्ष निकाला — वेद, उपनिषद, धर्म।
इन लोगों ने धीरे-धीरे तोड़ना शुरू किया:
1. वेद-उपनिषद कपोल-कल्पना हैं, कथाएँ हैं।
2. भारत में आर्य बाहर से आए।
3. सवर्णों ने दलितों का शोषण किया, जो मूल निवासी हैं।
शिक्षा संस्थान, समाज समरसता, प्रांत-भेद, भाषा-भेद, जाति-भेद, मूलनिवासी-विदेशी थ्योरी, जनजाति-शहरी सिद्धांत, दलित-ब्राह्मण सिद्धांत लाए। धर्मांतरण के लिए तलवार की जगह सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा का सहारा लेने लगे। भारत के लाखों गाँव और जनपदों में आज भी ब्राह्मण नहीं रहते, वहाँ किसने शोषण किया?
इसी क्रम में मुगल और अंग्रेज दोनों ने यह सिद्धांत फैलाया कि “हम विदेशी नहीं, तुम्हारे भाई हैं। यह भारत भूमि हमारी और तुम्हारी है।” शूद्र वर्णों को समझाया-बताया कि “जो तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं, वे तुम्हें शिक्षा दे रहे हैं, वे तुम्हारे श्रम का धन दे रहे हैं — वे विदेशी हैं।” और इस सिद्धांत को इतनी गहराई से मन में बोया कि आज दलित-सवर्ण मतभेद गहरा गया है। यहाँ कार्य के आधार पर चार वर्ण, यानी चार प्रकार के मनुष्यों का भेद किया गया था। सुनार, लोहार, ताम्रकार, नाई, कुम्हार, ग्वाला, भूमिहार, कुर्मी, तेली, क्षत्रिय, पटेल, मरार, बिंझवार, विप्र आदि संपूर्ण समाज कल भी एक साथ, घर से घर लगे हुए, बिना छुआछूत माने साथ रहते थे, आज भी रहते हैं।
जाति तो मुगलों-अंग्रेजों की देन है। कैसे? अब सविस्तार समझाती हूँ…
1. भारत में प्राचीन काल में दैनिक स्वच्छता और निवृत्ति के लिए राजा हो या रंक, नदी-तालाबों में ही जाते थे। घर में पाखाना नहीं बनाते थे। ‘पाखाना’ शब्द ही अरबी है। अति आवश्यकता के लिए सैकड़ों घरों से एकांत में, घर से बहुत दूर गड्ढे खोदकर लकड़ी के पल्लों से ढककर बनाते थे। जिसे नदी-तालाब न जा सकने वाले अशक्त गृह सदस्य ही उपयोग करते थे। इसे छह माह-साल भर में पाटकर नया खोद लेते थे। महिलाएँ मुँह अंधेरे उठकर नहा-धोकर आ जाती थीं। सूर्योदय के साथ पूजा-पाठ और घर-बाहर के कार्य प्रारंभ हो जाते थे।
मुगलों के आने से पहले ‘स्वीपर’ जाति और सिर या गाड़ी पर विष्ठा ढोने का चलन नहीं था। मुगलों ने घरों के अंदर पाखाना बनाया। धर्मांतरण न करने वाले हिंदुओं से जबरदस्ती यह कार्य कराया और एक दलित-अछूत जाति बनाई।
2. भारत में चमड़े के जूते-चप्पल नहीं पहनते थे। सोने-चाँदी या धातु की पादुका, लकड़ी की खड़ाऊँ, या वृक्षों की छाल और बेल से, रुई-कपास से बनी पादुका पहनते थे। प्राचीन भारत में चर्मकार नहीं थे, न ही चमड़े की कोई वस्तु उपयोग करते थे। वनों में रहने वाले कभी-कभी भूमि पर बिछाने के लिए मृत मृगों की खाल ले आते थे।
लेकिन मुगल-अंग्रेज सामान रखने का बैग, बेल्ट, पानी रखने-लाने-ले जाने और कई चमड़े के सामान के साथ जूते-चमड़े का उपयोग करते थे। भारत आने पर इस काम के लिए मृत पशुओं की खाल उतारकर ये सब बनाने के लिए कुछ हिंदुओं को मजबूर किया गया। स्वास्थ्य की दृष्टि से हीन कार्य समझकर इन्हें मानव बस्तियों से दूर रखा और अछूत बनाया। इस तरह एक नई जाति ‘चर्मकार’ पैदा की। आज भी भारत में संत-ज्ञानी चमड़े का जूता-चप्पल, बैग, बेल्ट आदि उपयोग नहीं करते। पानी रखना-पीना तो बहुत दूर की बात है।
अंग्रेजों के मन में भारत की प्रबुद्ध जनता को सैकड़ों साल में भी मानसिक गुलाम न बना पाने की इतनी पीड़ा रही कि वे जाते-जाते जाति और धर्म-भेद बोकर भारत को बर्बाद और अकर्मण्य बनाने वाली शिक्षा लागू कर गए। सभी संस्थानों में अपने विचारों के पोषक भारतीयों को बिठा गए। जब दिल से समानता लाने की भावना थी तो संविधान में यह क्यों नहीं लिखा हम सारे भारतीय आर्य हैं, कोई ऊँच नीच, छुआ छूत नहीं, सबकी एक जाति और धर्म है भारतीय, जाति प्रथा समाप्त किया जाता है, मानने वाले को दंड भोगना होगा. सभी मानव एक समान है। इन्हें राजनीति का धंधा जो चलाना था। भारत को और टुकडों में बाँटना जो था। इसलिए नहीं किए।
अंग्रेजों ने मुस्लिमों के लिए दो बार भारत को काटकर अलग देश दे दिया — एक अफगानिस्तान, दूसरा पाकिस्तान। नेपाल भूटान से पछाड़ खाकर उसे अलग देश समझकर उलझने की हिम्मत ही नहीं की।
आज कुछ राजनीतिक दल, विधि नियंता अँग्रेजों के नक्शेकदम पर हैं।
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