भावों ने फिर ली ‘करवट’, बदली अपनी कहानी।
कभी सोना आसमान चढ़े, कभी ज़मीन पर आए,
निवेशक की धड़कन बढ़े, जो भाव नए बन जाएँ।
चाँदी भी अब कहाँ पीछे,अपनी चमक दिखाती है,
कल तक जो थी शांत पड़ी, आज रफ्तार लाती है।
दुकानों में गहनों की बातें, जेबों में हिसाब लगाया,
खरीदारी से पूर्व हरेक, आज भावों को देख आया।
किस्मत भी बाज़ार जैसी, कब क्या? ‘रंग’ दिखाए,
आज जो महँगा लगता है, कल वो सस्ता कहलाए।
सोना हो या चाँदी भाई, वर्तमान भाव नहीं हैं स्थाई,
बाज़ार की दुनिया में, कीमत है सबसे बड़ी सच्चाई।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
![]()
