विज्ञापन, अखबार और जवाबदेही का सवाल

डॉ. सत्यवान सौरभ अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हर सामग्री पाठक के मन में एक विशेष विश्वसनीयता पैदा करती है। यही कारण है कि जब किसी विवादित व्यक्ति या संस्था के पक्ष में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित होता है और उसका प्रस्तुतीकरण समाचार या तथ्यात्मक पड़ताल जैसा दिखाई देता है, तो मामला केवल विज्ञापन और भुगतान तक सीमित नहीं रहता। वह मीडिया की विश्वसनीयता, संपादकीय विवेक और सामाजिक जवाबदेही से जुड़ जाता है। 12 सितंबर 2026 को ‘द हिन्दू’ के दिल्ली, मोहाली और उत्तर भारत के संस्करणों में…

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व्यंग्य : जब करोड़पति को भिखारी बनने का शौक चढ़े!

संजय एम तराणेकर (व्यंग्यकार) वाह रे लोकतंत्र! यहाँ कुछ लोग गरीबों की जिंदगी समझने के लिए गरीब बनते हैं, और कुछ गरीब लोग पूरी जिंदगी यह सोचते रह जाते हैं कि आखिर अमीर बनने का अनुभव कैसा होता होगा! करोड़ों के मालिक विधायक भिखारी बने। यह खबर समाचार-पत्रों में पढ़कर तो बड़ा आश्चर्य होता है। गंदे मैले-कुचेले कपड़े पहनकर वे सड़क पर घूमें। अब अगर कोई विधायक महोदय करोड़ों की संपत्ति के मालिक हों और फिर गंदे-मैले कपड़े पहनकर हाथ में झाड़ू और झोला लेकर सड़कों पर निकल पड़ें, तो…

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नितिन नवीन का दौरा, मोहन यादव या हेमंत खंडेलवाल किसे कर गया मजबूत?

पवन वर्मा विनायक फीचर्स)मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की जोड़ी पर सबसे ज्यादा नजर है। सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ सहज नहीं होने की चर्चाओं के बीच दोनों नेताओं के समन्वय को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग तरह की बातें चल रही हैं। ऐसे समय में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का मध्यप्रदेश दौरा खास राजनीतिक महत्व रखता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका प्रदेश का पहला दौरा था, इसलिए उनकी मौजूदगी, दोनों नेताओं के साथ…

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पुलिस मुख्यालय से सत्ता के गलियारों तक चर्चा में है बिहार डीजीपी की छुट्टी

रंजीत विद्यार्थी नौकरशाही में ‘लंबी छुट्टी’ का मतलब हमेशा सिर्फ छुट्टी नहीं होता। और जब बात राज्य के पुलिस महानिदेशक की हो, तो सवाल और भी गहरे हो जाते हैं। बिहार के डीजीपी विनय कुमार के 21 दिन के अवकाश ने पुलिस मुख्यालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक चर्चाओं को हवा दे दी है। लोग इस छुट्टी के अपने-अपने अर्थ निकाल रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर डीजीपी की छुट्टी इतनी चर्चा में क्यों है? अपने जमाने की चर्चित फिल्म ‘गंगाजल’ में एसपी अमित कुमार की लंबी छुट्टी…

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प्रकाशमान सत्य श्रीकृष्ण की आनंदमयी अनुभूति हैं राधारानी

डॉ. दीपक गोस्वामी “सदा राधिकानाम जिह्वाग्रतः स्यात्…” यह केवल स्तुति नहीं, साधना का संकेत है। जिह्वा पर राधा हों तो वाणी में माधुर्य उतरता है, नयन में राधा हों तो दृष्टि में करुणा आती है, श्रवण में राधा हों तो सुनना भी साधना बन जाता है और हृदय में राधा हों तो मनुष्य के भीतर प्रेम का जन्म होता है। राधा कौन हैं? यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा है। दार्शनिक दृष्टि से श्री राधा को कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति के रूप में समझा जाता है, वह…

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निशुल्क यूपीआई का अंत लेकिन बोझ किसकी जेब पर?

विवेकानंद यूपीआई अब फ्री नहीं रहेगा, इस पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगेगा। हालांकि सरकार का दावा है इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं बल्कि दुकानदार पर पड़ेगा, वहीं विरोध करने वाले इसे जनता पर बोझ बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि यूपीआई से पेमेंट करने पर कितना पैसा लगेगा। सवाल यह है कि सरकार झांसा दे रही है या यूपीआई पर एमडीआर वसूली को लेकर ईमानदार है? जिस दिन से पेमेंट्स एंड सैटलमेंट्स सिस्टम्स एक्ट संसद में पास हुआ था उसी दिन से यह आशंकाएं…

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बिहार में एएनएम का मानदेय और स्वास्थ्य नीति की विसंगतियां

सोनी कुमारी बिहार के गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली दस्तक अक्सर डॉक्टर की नहीं, एएनएम की होती है। गर्भवती की निगरानी हो, बच्चे का टीकाकरण हो, परिवार नियोजन की जानकारी देनी हो या सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम को घर-घर पहुंचाना हो, एएनएम सबसे पहले दिखाई देती है। अस्पताल और गांव के बीच वह ऐसी कड़ी है, जिसके कमजोर पड़ने का असर अंततः मरीज तक पहुंचता है। गांव में स्वास्थ्य सेवा की दूरी किलोमीटर से नहीं, परिस्थितियों से तय होती है। कच्ची सड़क, बारिश, नदी-नाला और परिवहन की कमी उस दूरी…

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दृष्टिकोण : हिंदी के प्रति कितने समर्पित हैं हम ?

डॉ. सुधाकर आशावादी किसी कवि ने लिखा है – ‘सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर, जिस दिन सोया देर तक भूखा रहा फ़कीर।’ व्यवहारिक सत्य भी यही है, कि दिनचर्या में जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि हम अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक नहीं हैं, तब हमें अपने अधिकारों की बात नहीं करनी चाहिए। बहरहाल चौदह सितम्बर हिंदी दिवस से प्रारंभ होने वाली औपचारिकता हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े तक निभाई जाती है, शेष ग्यारह महीने पन्द्रह दिन हिंदी हमारी संवाद की भाषा तो रहती है, मगर काम…

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जड़ों से जुड़े, आकाश की ओर

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय वरिष्ठ स्तंभकार, देवरिया भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम संस्कृतियों में से एक है। यह केवल खान-पान, वेशभूषा या त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् पूरा विश्व एक परिवार है और ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ जैसे शाश्वत सिद्धांत इसी दर्शन की नींव हैं। यह संस्कृति हमें सहिष्णुता, सम्मान, त्याग और कर्तव्य का पाठ पढ़ाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाषा, भोजन, वेशभूषा और संगीत बदल जाता है, पर अतिथि-सत्कार, परिवार का सम्मान…

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भगवान गणेश: प्रथम पूज्य ही नहीं, आदर्श पथ-प्रदर्शक भी

डॉ. राघवेंद्र शर्मा गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर जब संपूर्ण सृष्टि विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के स्वागत में लीन होती है, तब केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। सच्चा उत्सव तब सार्थक होता है जब हम भगवान गणेश की दिव्य कार्यशैली, उनके स्वरूप और आचरण के पीछे छिपे जीवन-दर्शन को अपने भीतर उतारें। आज के घोर कलियुग में, जहाँ मानवीय संवेदनाएं क्षीण हो रही हैं और भौतिकता का बोलबाला है, भगवान गणेश का प्रत्येक कार्य हमें जीने की श्रेष्ठ राह दिखाता है। भगवान श्री गणेश की सबसे…

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