वंदे मातरम् : राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का अमर गीत

सुनीता कुमारी “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है। यह गीत करोड़ों भारतीयों के हृदय में देशभक्ति की भावना जागृत करता है। जब-जब भारत की स्वतंत्रता की बात होती है, तब-तब “वंदे मातरम्” की गूंज सुनाई देती है। इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में साहस, त्याग और बलिदान की भावना उत्पन्न की। आज भी यह गीत राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रेरणास्रोत है। वंदे मातरम् की रचना “वंदे मातरम्” की रचना महान…

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संस्कार, इतिहास और सत्य के पत्रकार: दादा दिनेश चंद्र वर्मा

विवेक रंजन श्रीवास्तव   कुछ लोग चले जाते हैं तो पीछे सिर्फ खालीपन नहीं छोड़ते, एक पूरा युग छोड़ जाते हैं। दादा दिनेश चंद्र वर्मा ऐसे ही थे। 29 जुलाई 1944 को विदिशा के शमशाबाद में जन्मे और कलम का आखिरी सांस तक साथ निभाने वाले इस फकीर पत्रकार को देखकर लगता था जैसे समय यहीं थम गया है। लंबे सफेद बाल, गरिमामय सफेद दाढ़ी, सादा कुर्ता और कंधे पर हमेशा लटका रहने वाला झोला। इस वेश में वे भोपाल की सड़कों पर ऐसे चलते थे जैसे कोई साधु तीर्थयात्रा…

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मध्य प्रदेश: जंगल उजाड़ कर बाघ संरक्षण संभव नहीं

उमंग सिंघार 29 जुलाई को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाती है। लेकिन मध्य प्रदेश में बाघ संरक्षण को  विकास परियोजनाओं और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से  उजाड़ा जा  रहा है। केन-बेतवा लिंक परियोजना, भोपाल का पश्चिमी बाईपास, विभिन्न सड़क और रेल परियोजनाएं तथा वन क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता भूमि कारोबार यह संकेत देते हैं कि विकास की वर्तमान दिशा पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश स्वयं को “टाइगर स्टेट” कहकर गौरवान्वित महसूस करता है। इसके लिए मैं सभी बाघ प्रेमियों को संरक्षण के प्रहरी के रूप में …

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गुरु पूर्णिमा : ज्ञान-परम्परा का सांस्कृतिक प्रतिमान

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय स्वतंत्र लेखक आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा भारतीय कालगणना और सांस्कृतिक चेतना में ज्ञान और कृतज्ञता के पर्व के रूप में प्रतिष्ठित है। गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह उस शाश्वत परम्परा का स्मरणोत्सव है जिसने भारतीय सभ्यता को निरंतरता, गहनता और दिशा प्रदान की है। यह दिन गुरु-शिष्य सम्बन्ध की गरिमा, ज्ञान के महत्व और कृतज्ञता के भाव का सामूहिक उद्घोष है। इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। परम्परा के अनुसार इसी दिन महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का…

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श्रावण मास (सावन): पौराणिक कथाएं, धार्मिक महत्व और पूजन नियम

– लेखिका गरिमा सिंह अजमेर राजस्थान ✍️ हिंदू धर्म में *श्रावण मास (सावन)* को सबसे पवित्र और फलदायी महीनों में से एक माना गया है। यह पूरा महीना देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) को समर्पित होता है। मानसून की पहली फुहारों के साथ आने वाला यह महीना केवल भक्ति और अध्यात्म का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के नए रूप और उमंग का भी प्रतीक है। आइए विस्तार से जानते हैं सावन मास का धार्मिक महत्व, इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं और इस दौरान अपनाए जाने वाले नियम। ## 1. श्रावण मास की…

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भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही की राजनीति की वापसी

पवन वर्मा लोकतंत्र में सबसे बड़ा जनादेश चुनाव नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। चुनाव सरकारें बनाते हैं, लेकिन विश्वास उन्हें चलाता है। जब उस विश्वास पर प्रश्न उठते हैं, तब सरकारों को केवल प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही भी निभानी पड़ती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। शायद यही कारण है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जाएगा। यह एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है, यह उस दबाव की स्वीकारोक्ति भी है, जो देशभर के लाखों छात्रों, अभिभावकों और…

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वर्तमान समय में समस्याओं से जूझता देश का लोकतंत्र

लेखक : चंद्रकांत सी पूजारी गुजरात लोकतंत्र को विश्व की सबसे श्रेष्ठ शासन व्यवस्था माना जाता है। इसका मूल सिद्धांत है— “जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन।” लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता, न्याय, उत्तरदायित्व और सहभागिता पर आधारित एक जीवन-पद्धति भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ करोड़ों मतदाता नियमित रूप से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र को सफलतापूर्वक बनाए रखा है तथा अनेक कठिन परिस्थितियों…

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पुस्तक समीक्षा– न के बाद भी खड़ी रही “सम्पा”

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर संजीव पालीवाल सर और मीनाक्षी चौधरी जी द्वारा लिखित “सम्पा” किताब मुझे तीन दिन पहले ही मिली और तीन ही दिन में पढ़ भी डाली। ये पहली किताब है जिसे मैंने इतने कम समय में पढ़ डाली जिसका कारण शानदार लेखन के साथ-साथ विषय वस्तु भी आकर्षक है। दो मंझे हुए लेखकों के कर कमल से लिखी गई सच्ची कहानी पर आधारित ये किताब वो दस्तावेज है जो समाज और नेताओं की नियत पर सैंकड़ो सवाल खड़े करती है। ज़्यादातर मैं प्रेम कहानी या अपराध आधारित…

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नन्हे कदम

नन्हे-नन्हे पाँव से, छू लेगा आकाश। मेहनत, सच्चाई, प्रेम से, होगा जग में खास॥ मधुर वचन, निर्मल हृदय, रखे सदा मुस्कान। माता-पिता का मान कर, पाए सच्चा मान॥ ज्ञान-दीप मन में जले, बढ़े सदा विश्वास। संस्कारों की छाँव में, महके जीवन-श्वास॥ हँसता बचपन फूल-सा, मन निर्मल निष्काम। ऐसे बच्चों से सजे, भारत का हर धाम॥ — डॉ. प्रियंका सौरभ   (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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रील्स नहीं, रियल स्किल्स बनाती हैं भविष्य

– डॉ. सत्यवान सौरभ डिजिटल युग ने अवसरों की दुनिया को पहले से कहीं अधिक विस्तृत बना दिया है। आज एक साधारण स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा को लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। अनेक युवाओं ने अपनी मेहनत, रचनात्मकता और निरंतर प्रयास के बल पर इस माध्यम से पहचान, सम्मान और आर्थिक सफलता भी प्राप्त की है। यह परिवर्तन निश्चित रूप से तकनीकी क्रांति का सकारात्मक पक्ष है। किंतु इसी चमकदार…

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