मानवता की वारिस: पूजा शर्मा

बिमला कुमारी गुप्ता
वरिष्ठ लेखिका, हैदराबाद

आजकल जब भी हम मोबाइल फोन उठाते हैं, तो सोशल मीडिया पर मदद की गुहार लगाते अनगिनत वीडियो और QR कोड दिखाई देते हैं। हाल ही में मेरे सामने भी एक ऐसा ही वीडियो आया, जिसमें लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए आर्थिक सहायता और दान की अपील की गई थी। आज के दौर में ऑनलाइन फ्रॉड और धोखाधड़ी इतनी बढ़ चुकी है कि किसी पर भी आँख मूँदकर भरोसा करना मुश्किल है। एक जागरूक नागरिक होने के नाते, मैंने तुरंत गूगल पर जाकर इस जानकारी की सत्यता जाँची।

सत्यता जाँचते हुए मेरे सामने दिल्ली की एक साधारण-सी लड़की ‘पूजा शर्मा’ की जो कहानी आई, उसने 80 वर्ष की उम्र में मेरे हृदय को गहराई तक झकझोर दिया।

यह कहानी मार्च 2022 से शुरू होती है, जब पूजा के हँसते-खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके सगे बड़े भाई की बेरहमी से गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस असहनीय सदमे को पूजा के पिता बर्दाश्त नहीं कर पाए और वे कोमा में चले गए। माँ का साया सिर पर पहले ही नहीं था, भाई दुनिया से चला गया और पिता अस्पताल के बिस्तर पर बेसुध पड़े थे। घर में अंतिम संस्कार के लिए कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा था। ऐसे कठिन समय में समाज की परवाह न करते हुए, पूजा ने खुद अपने सिर पर पगड़ी बाँधी और रूढ़ियों को तोड़कर अपने भाई को मुखाग्नि दी।

जब वे अपने भाई की विदाई के लिए श्मशान घाट पर थीं, तब उन्होंने वहाँ कुछ लावारिस और बेसहारा शवों को देखा। उन अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार जिस निंदनीय, उपेक्षित और गरिमाहीन तरीके से किया जा रहा था, उसने पूजा की आत्मा को कँपा दिया। शवों की उस दुर्दशा को देखकर पूजा के जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल गई। उन्होंने रोते हुए संकल्प लिया कि वे अब से हर लावारिस शव की “वारिस” बनेंगी।

जब एक युवा लड़की ने श्मशान घाट को अपनी कर्मभूमि बनाया, तो हमारे समाज की संकीर्ण और रूढ़िवादी सोच उसके आड़े आ गई। समाज ने उसकी सराहना करने के बजाय उसे दुत्कारा। लोगों ने उसके लिए “चांडाल”, “अशुभ”, “अपशकुन” और “भूतों की साथी” जैसे बेहद कड़वे और बुरे शब्दों का इस्तेमाल किया। इस सामाजिक क्रूरता की सबसे भारी कीमत पूजा को अपनी निजी जिंदगी से चुकानी पड़ी। उनके मंगेतर और उनके परिवार ने इस काम का विरोध किया, जिसके कारण पूजा की सगाई टूट गई और हँसती-खेलती शादी का रिश्ता हमेशा के लिए बिखर गया।

इतना सब कुछ खोने के बाद भी पूजा समाज की उस संकीर्ण सोच के आगे झुकी नहीं। अपने पवित्र लक्ष्य पर निरंतर एकाग्र रहते हुए उन्होंने अब तक 6,000 से अधिक लावारिस शवों का पूरे विधि-विधान से सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया है। आज उनकी इस निस्वार्थ सेवा को वैश्विक स्तर पर बड़ी ख्याति मिली है और वे दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिलाओं की ‘BBC 100 Women’ सूची में शामिल हो चुकी हैं।

मैं अपने इस लेख के माध्यम से समाज में त्याग और सद्भावना के इसी संदेश को फैलाना चाहती हूँ। आज जहाँ कुछ लोग निरंतर नफरत फैलाने और समाज को धर्म, जाति या स्वार्थ में तोड़ने में लगे रहते हैं, वहीं पूजा शर्मा जैसे लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं, जो बिना किसी लालच के इंसानी रिश्तों को जोड़ने में अपना पूरा जीवन न्योछावर कर देते हैं।

उम्र के इस पड़ाव पर, घर में सीमित रहते हुए भी, मैं इस बेटी की सच्ची मानवता को नमन करती हूँ और सभी को प्रेरित करना चाहती हूँ कि आइए, हम सब मिलकर समाज को तोड़ने वाली ताकतों को हराएँ और मानवता को जोड़ने वाले ऐसे सच्चे हीरोज का साथ दें।

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