हमारे बचपन के वो दिन और आज का दिन बहुत बदल गया है । स्मृति के झरोखों में जब हम सन् साठ और सत्तर के दशक में झांकते हैं तो एक अलग भारत दिखाई देता है। दशहरे की रामलीला में मुस्लिम परिवारों की भीड़, मोहर्रम के जुलूस में हिंदू भाइयों का नगाड़ा बजाना, ईद पर सेवइयां और होली पर गुझिया का आदान-प्रदान। बाजार, मेले और त्योहार धर्म से ऊपर उठकर “उत्सव” बन जाते थे।
खेल-संसार और शिक्षा जगत में कही कोई दुराव नहीं था ।
गांव का चौपाल और शहर का मोहल्ला एक परिवार जैसा था। दरवाजे खुले रहते थे, और मन भी। पर आज वही दरवाजे बंद हैं, और मन में दूरियां। यह बदलाव क्यों और कैसे आया? और इसे कैसे सुधारा जाए – यही इस लेख का विषय है।
हमारी मिलीजुली विरासत हमें पुनः पुराने दिनों से जोड़ सकती है ।
भारत की संस्कृति का सबसे बड़ा बल उसकी सह-अस्तित्व की परंपरा रही है।
भारतीय त्योहारों में सामूहिक सहभागिता समाज की जीवन रेखा हुआ करती थी ।रामलीला में राम की बारात का मुस्लिम मोहल्ले से निकलना, मोहर्रम में हिंदुओं द्वारा ताजिया को कंधा देना – ये सिर्फ परंपरा नहीं, आपसी भरोसे का प्रतीक थे। शादी विवाह में भी गांव में जो एकता और परस्पर सहयोग दिखाई पड़ता था वह गायब हो गया है ।
आर्थिक सहभागिता कभी हमारे समाज को मजबूत बनाने में मददगार थी । मेले और बाजार सभी जाति-धर्म से परे थे। एक कुम्हार, एक जुलाहा, एक हलवाई – सबकी दुकान एक ही पंक्ति में। खरीद-बिक्री से रिश्ते बनते थे।
सामाजिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला पड़ोसी पहले का सिद्धांत अब तिरोहित हो गया है । सुख-दुख में सब एक साथ जहां खड़े रहते थे अब वही सब आत्मकेंद्रित हो गए हैं ।
यह सद्भाव किसी सरकारी योजना से नहीं आया था। यह रोजमर्रा के जीवन, आपसी जरूरत और मानवीय संवेदना से उपजा था।
सद्भाव में कमी आई है तो इसके कारणों का विश्लेषण भी जरूरी है । जो कभी भारतीय संस्कृति और समाज का आदर्श हुआ करता था
आज वही ताना-बाना कमजोर क्यों हुआ? इसके कई आयाम हैं ।
राजनीति का ध्रुवीकरण देश को खोखला कर रहा है । जब राजनीति विकास और मुद्दों के बजाय जाति, धर्म और पहचान के आधार पर होने लगे, तो समाज स्वाभाविक रूप से खेमों में बंट जाता है। “वोट बैंक” की सोच ने “सामाजिक बैंक” को तोड़ दिया।
संचार क्रांति का दुष्प्रभाव भी समाज पर पड़ता ही है ।सोशल मीडिया ने सूचना तो प्रदान दी, परंतु अफवाह और नफरत को भी कई गुना तेज कर दिया । एक छोटी घटना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर वैमनस्य बोया जाता है।
शहरों में पड़ोसी से पहचान नहीं है जहां मेरा घर, मेरी दुनिया की सोच ने सामुदायिक जीवन को कमजोर किया। अब आवश्यक है कि हमारी दुनिया हमारी नैतिक जिम्मेदारी का भाव जगाया जाए ।
ऐतिहासिक भूलों का राजनीतिकरण न करके अतीत की गलतियों को वर्तमान में घसीटकर बदले की भावना भड़काना, इससे न कोई समाज आगे बढ़ा है, न बढ़ेगा।
सद्भाव की पुनर्स्थापना के सभी कारगर उपाय किए जाएं
निराशावादी विचार से इसका समाधान नहीं है। हमें बीते हुए पल को कोसने के बजाय, भविष्य को गढ़ने वाले विचारों को प्राथमिकता देनी है।
शिक्षा और संस्कार को अपनी मूल संस्कृति से विलग न किया जाए ।
स्कूल की किताबों में भारत के संतों और सूफियों को साथ पढ़ाया जाए। कबीर, नानक, रहीम, तुलसी – ये सब हमें जोड़ते हैं। नैतिक शिक्षा को प्राथमिकता से पाठ्यक्रम शामिल किया जाए और समाज में इसके लिए सार्थक प्रयास जरूरी है ।
स्थानीय स्तर पर संवाद का आदान-प्रदान होता रहे तो कई समाधान स्वयं संभव है ।
हर गांव और मोहल्ले में सद्भाव विकास समिति बनाई जाए जिसमें सभी समुदायों के बुजुर्ग और युवा हों।हम अपने सभी त्योहार मिलकर मनाएं, जनसाधारण की समस्या मिलकर सुलझाएं।
मीडिया और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सकारात्मक सोच से भरी हुई हो और यह
नकारात्मक विचार के बजाय सद्भाव की प्रबल भावना को बढ़ावा दें । जनप्रतिनिधि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ें, विभाजन पर नहीं।
युवाओं को जोड़ना और उनके सहयोग से मिलजुलकर
खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण – ऐसे मंच बनाएं जहां युवा धर्म से पहले “भारतीय” के रूप में मिलें।
हम की वापसी मैं के त्याग में ही अपना कुछ कल्याण हो सकता है ।
एक कवि ने कहा है – “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”। भारत कभी “टुकड़ों” में नहीं जी सकता। हमारी ताकत हमारी विविधता में है, और एकता में है।
हम सन् साठ या सत्तर के दशक वाला वो गांव वापस नहीं ला सकते, पर उस वाली सोच को वापस ला सकते हैं। जहां राम की बारात और मोहर्रम का जुलूस एक दूसरे का सम्मान करें। जहां दरवाजे फिर से खुलें।
राष्ट्र निर्माण का पहला ईंट “पड़ोसी से हाथ मिलाना” है। अगर हम अपने घर, गली और गांव से शुरुआत करें, तो “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” – यही नया भारत होगा। जिस दिन हम ‘तुम’ और ‘हम’ की दीवार गिरा देंगे, उस दिन भारत फिर से विश्वगुरु बनेगा।
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