(प्रेम, साधना और गुरु–शिष्य संबंध पर सुव्यवस्थित विवेचन)** पूज्य गुरुदेव स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपने अमृतमय आशीर्वचनों में कहा कि यदि साधक स्वयं पर नियंत्रण करना सीख ले, तो साधना सहज और स्वाभाविक हो जाती है। आत्मसंयम ही आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है। जब मन, वाणी और कर्म अनुशासित होते हैं, तब साधक अंतर्मुखी होकर परम सत्य की अनुभूति करता है। गुरुदेव ने श्वास पर हर पल ध्यान को साधना का सरल और प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि श्वास पर सजगता आने से मन की चंचलता शांत होती…
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