काल समय वक़्त अपनी गति रफ्तार से चलता रहता है प्रत्येक दिन लाखो जातक जन्म लेते है एवं मरते है लेकिन कभी कभार ऐसा भी पल प्रहर आता है जो साधारण मे असाधारण क़ो अंकुरित कर जाता है और जो भविष्य का बट बृक्ष समय काल युग कि दृष्टि दृष्टिकोण बन भय भ्रम के अंधकार मे भर्मित काल समय क़ो नई परिभाषा एवं ऊँचाई देकर चमत्कार का सर्व सत्कार बनकर अपने समय काल भाग्य भगवान क़ो प्रस्तावित कर सर्व ग्राह सर्वस्वीकार्य स्वरूप मे प्रतिष्ठापित करता है!
ऐसे बहुत से जातको ने सृष्टि मे जन्म लिया है जिनके कर्म धर्म मर्यादाए नैतिक मूल्य उच्च आदर्शो के माप दंड थे किन्तु स्वंय के लिए किसी ऊँचाई कि परछाई बनने के लिए कोई श्रम परिश्रम प्रयास नहीं किया जीवन विश्वाश के साथ जिया और जन आकांक्षाओं के सकारात्मक पूर्णता के समर्थन सहयोग मे जीवन क़ो निष्ठां ईमानदारी के साथ सम्पर्पित कर दिया ऐसे ही व्यक्ति, व्यक्तित्वों मे एक नाम है डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जिसने जीवन क़ो स्वंय कि धरोहर पूंजी नहीं,समय काल के अनुरूप ईश्वर द्वारा प्रदत्त जन कल्याण सेवा के कर्तव्य दायित्व के लिए प्रदान समझ कर जिया और निर्विकार अस्तित्व क़ो सधना साध्य का पथ स्वीकार कर नित्य निःस्वार्थ भाव से जीवन मूल्यों के ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य,दायित्व संकल्प कि सधना कि!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव का जन्म बीस जुलाई सन उन्नीस सौ छियालिस क़ो गोरखपुर जनपद पथरदेवा मे बाजार के निकट ग्राम रामपुर अवस्थी के सूर्यनाथ लाल श्रीवास्तव एवं श्रीमती गिरिजा देवी कि तीन पुत्रीयो
1-स्वर्गीय श्रीमती ललिता श्रीवास्तवा 2-श्रीमती राधिका श्रीवास्तवा 3- श्रीमती सुशीला श्रीवास्तवा एवं छोटे भाई सुरेंद्र लाल श्रीवास्तव के जेष्ठ पुत्र के रूप मे हुआ था!
ग्रामीण परिवेश सामान्य ग्रामीण परिवार बचपन कि स्थिति परिस्थिति वातावरण जिसका जिक्र अक्सर डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी किया करते थे ग्रमीण परिवेश एवं जन्म परतंत्र भारत मे एक समझ बौद्धिक विकास स्वतंत्र भारत मे ज़ब शीघ्र स्वतंत्रत हुआ राष्ट्र स्वयं क़ो दृढ़ आधार देने मे ख़डी चुनौतीयों शिक्षा, स्वस्थ, क़ृषि, रोजगार, अद्योगिक विकास आंतरिक एवं बाहय सुरक्षा जैसे समस्याओ से जूझ रहा था जहाँ समाजबाद, पूंजीबाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था एवं का दौर था नव स्वतंत्रत राष्ट्र क़ो अपने पथ संकल्प का निर्धारण करना था इस दौर मे जन्मे बचपन के सामने भावी जीवन के व्यवहारिक विचारों के चयन क़ो लेकर द्वन्द कि स्थिति मे था जिससे अछूते डॉ सच्चिदानंद का बचपन भी नहीं रहा और भावी जीवन के व्यवहारिक स्वीकृति के लिए उन्हें उस दौर मे वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावी कम्युनिस्ट विचार धारा से प्रभावित समाजवाद क़ो डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव के कोमल मन ने स्वीकार कर आत्म साथ किया जिसका प्रभाव उनके अंतिम साँसो तक उनके व्यक्तित्व मे परिलक्षित होता रहा!
शिक्षा दीक्षा —
सच्चिदानंद नन्द श्रीवास्तव जी कि शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से शुरू हुई प्राथमिक शिक्षा के उपरांत पथरदेवा हाई स्कूल देवरिया से एवं इंटरमिडीएट एस एस डी एन कॉलेज देवरिया शिक्षा ग्रहण किया!
स्नातक,स्नात्तकोत्तर कि शिक्षा गोरखपुर विश्वविद्यालय से ग्रहण करने क़े उपरांत पी एच डी गोरखपुर विश्वविद्यालय से पूर्ण किया आपने जवार क्षेत्र मे डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव उच्च शिक्षित गिने चुने व्यक्तियों मे शुमार थे!
शिक्षक के रूप मे राष्ट्र सेवा करने कि प्राथमिकता —
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी ने नव स्वतंत्र राष्ट्र एवं अपनी मातृभूमि भारत कि सेवा के लिए शिक्षण कार्य क़ो अपना माध्यम चुना और गोरखपुर विश्वविद्यालय से पी एच डी करने के उपरांत
ईरविंग क्रिस्चियन कॉलेज इलाहाबाद मे सहायक प्रवक्ता के रूप मे एक वर्ष तक अपनी बहुमूल्य सेवाये देने के उपरांत गोरखपुर विश्वविद्यालय मे असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए और विभागध्यक्ष प्राचीन इतिहास विभाग से सेवा निवृत्त हुए!
डॉ सच्चिदानंदनन्द जी गोरखपुर विश्वविद्यालय के उन गिने चुने प्रोफ़ेसर्स मे थे जिन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त किया और वहीं शिक्षण कार्य के कर्तव्य दायित्व का निर्वहन करते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया!!
दाम्पत्य एवं पारिवारिक जीवन मे पादार्पण—-
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव क़ो जीवन मे लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का वरदाहस्त एवं आशीर्वाद प्राप्त था उनकी जीवन संगिनी, अर्धांगिनी,पत्नी डॉ विद्या श्रीवास्तवा साक्षात् लक्ष्मी एवं सरस्वती का संयुक्त समन्वय थी से उनका विवाह बीस नवंबर सन-1971 क़ो सम्पन्न हुआ!
डॉ विद्या श्रीवास्तव जी गोरखपुर निवासी प्रतिष्ठित कायस्थ कुल के तेजश्वी पिता डॉ पटेश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव एवं श्रीमती मंगला श्रीवास्तवा कि कि चार संतानो स्वर्गीय ठाकुर विज्य कुमार श्रीवास्तव, बहन शशि श्रीवास्तव, किरण श्रीवास्तव मे एक विद्या श्रीवास्तवा जी थी ज़ब बालिका शिक्षा नए स्वतंत्र देश भारत मे बहुत बड़ी बात हुआ करती थी उस कठिन दौर मे स्नात्तकोत्तर एवं पी एच डी तक कि शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत बाबा राघव दास स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय मे सहायक प्रोफेसर से विभागध्यक्ष तक सेवाएं देते हुए नारी जगत मे देवरिया जैसे जनपद मे दिशा, दृष्टि, दृष्टिकोण प्रदान करने एवं बलिका शिक्षा के प्रोत्साहन मे अपनी अतिमहत्व पूर्ण भूमिका कर्तव्य दायित्व का निर्बहन किया जो वास्तव मे वर्तमान पीढ़ी के लिए अनुकरणीय एवं प्रेरक है!!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी कि दो खूबसूरत, ओजश्वी बेटियां है डॉ ऋचा श्रीवास्तवा जिनका विवाह उच्च सैन्य अधिकारी प्रशांत गौड़ से हुआ है और जिन्होंने बहुत दिनों तक प्रदेश के ख्याति लब्ध एवं शिक्षा के क्षेत्र मे गौरवशाली संस्थान सिटी
मांटेसरी स्कूल मे शिक्षण कार्य किया जिसे पारिवारिक जिम्मेदारीयों के कारण कुछ दिनों पूर्व ही छोड़ना पड़ा
दूसरी पुत्री प्रियदर्शिका जो भारतीय प्रशासनिक सेवा से आई आर एस है एवं जिनका विवाह डी आई जी श्वेताम्बर भद्रा से हुआ है!
सच्चिदानंद श्रीवास्तवा दोनों बेटियां बड़ी प्यारी,दुलारी एवं माता पिता समय समाज परिवार परम्परा कि प्रतिष्ठा क़ो उत्कर्ष पर स्थापित करने मे सबल सक्षम बेटियां है दोनों उच्च शिक्षित एवं अपने परिवार के लिए आदर्श अस्तित्व अवयव बेटियां है जिन पर किसी भी समाज मॉ बाप क़ो अभिमान होना स्वभाविक है!
मै या कोई भी ज़ब डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से पुत्र के सन्दर्भ मे बात करता या जिक्र करता सदैव डॉ श्रीवास्तव यही कहते लड़की लडके मे कोई फर्क नहीं होता और यह समय आने पर मेरी बेटियां साबित कर देंगी और साथ ही साथ अपने वरिष्ठ एवं विभागध्यक्ष देश के जाने माने विद्वान डॉ विश्वम्भर शरण पाठक जी का जिक्र करना नहीं भूलते और गर्व से कहते हमारे पाठक जी कि छः कन्या रत्न है!
वर्तमान समय मे डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी के सोच, विचार, विश्वास का साक्षात् सत्यार्थ है उनकी दोनों सुपुत्रीया!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से
मेरी मुलाकात के कारण—
विवाह के उपरांत मेरी पत्नी को मैंने पी एच डी मे रजिस्ट्रेशन कराने के लिए गोरखपुर विद्यालय
मे किसी अच्छे प्रोफेसर कि तलाश कर ही रहा था कि
मेरे मित्र संजय मिश्र के पिता बेनीमाधव मिश्र ने मेरी मुलाक़ात प्राचीन विभाग के प्रोफेसर डॉ सच्चिदानंद से कराते हुए परिचय कराया!
मेरी पत्नी गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास विभाग से ही स्नात्तकोत्तर थी अतः डॉ सच्चिदानंद ने उसे अपने अधीनस्थ जैनिज्म के कल्पसूत्र शोध विषय देकर शोध के लिए औचारिकता पूर्ण करने का सुझाव दिया!
पत्नी के शोध के सन्दर्भ मे मिलते जुलते डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से निकटता घानिष्टता मित्रवत हो गई और लगभग प्रति दिन उनसे मिलना होता!
सच्चिदानंद जी के सानिध्य एवं
मुलाक़ातो के कुछ संस्मरण मैं यहां साझा करना अवश्य चाहूंगा!!
संस्मरण-(1)
उन दिनों प्रदेश मे कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री गोरखपुर के ही स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह जी थे और उनके मन्त्रीमंडल मे ऊर्जा मंत्री गोरखपुर नगर विधायक
स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री के सपूत सुनील शास्त्री जी हुआ करते थे जिनकी कैबिनेट मे खासी मजबूत स्थिति थी कारण था लालबहादुर जी का पुत्र होना एवं गोरखपुर शहर का विधायक होना,साथ ही साथ सरकार के महत्वपूर्ण विभाग का कैबिनेट मंत्री होना!
स्वर्गीय वीरबहादुर सिंह जी गोरखपुर के रहने वाले थे एवं उनकी राजनीतीक़ संघर्षो एवं शिखर की भूमि गोरखपुर ही था जिसके कारण ऊर्जा मंत्री सुनील शास्त्री जी की हनक अलग थी!
सुनील शास्त्री जी के गोरखपुर मे राजनीतक प्रबंधक थे जीवन प्रकाश जो अब इस दुनियां मे नहीं है!
जीवन प्रकाश डॉ सच्चिदानंद जी के बहुत करीबी या यूँ कहें दाँत काटी रोटी थे एक दूसरे के राजदार कहा जा सकता है!
दोनों का दिन मे दो चार बार मिलना आवश्य होता एवं शाम से देर रात बैठना नियमित दिन चर्या मे सम्मिलित था!
डॉ सच्चिदानंद उच्च कुलीन कायस्थ परिवार के संस्कारो से परिपूर्ण ओत प्रोत थे नफासत, नजाकत एवं रहन शहन की शैली हिन्दू समाज मे कायस्थ समाज की अलग होती है कहावत है कायस्थ के कपड़े की क्रिच नहीं टूटती और उनके खान पान का स्तर चाहे जो भी स्थिति परिस्थिति हो नहीं गिरता जो बहुत उच्च स्तरीय होता है!
संक्षिप्त मे कहा जाए तो
कायस्थ अपने नफ़सात,नजाकत एवं रहन सहन के उच्च स्तर से किसी स्थिति परिस्थिति मे समझौता नहीं करता!
यही वास्तविक व्यवहारिक संस्कार थे डॉ सच्चिदानंद नन्द श्रीवास्तव जी के!
जीवन प्रकश से निकटता के कारण डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव का सामाजिक राजनितिक रसूक बहुत ऊँचा था!
ऊर्जा मंत्री के खासम खास उनके राजनितिक सलाहकार एवं प्रबंधक जीवन प्रकाश के कारण मै भी उसी समूह का विश्वसनीय हिस्सा था!
प्रदेश सरकार की पल प्रहर की गतिविधियों मे परोक्ष सहभागिता समूह की किसी न किसी रूप मे अवश्य रहती!
विद्युत् विभाग के सहायक से लेकर अधीक्षण एवं एरिया
चीफ तक ऐसे प्रतीत होते जैसे गिरमिटिया जो भाषा शब्द उनके कार्य क़ो सिद्ध करने मे सहायक होती एवं मंत्री जी एवं जीवन प्रकाश क़ो पसंद होती बोलते
एवं व्यवहारिक आचरण मे उतारते कभी कभी मुझे भी लगता की मै भी सरकार का अहम हिस्सा किस्सा हूँ!
उस दौर मे एक सहायक अभियंता चौधरी साहब हुआ करते थे जो चौबीसों घंटे भागम भाग मे रहते थे अक्सर कहते रहते अगर कुछ हासिल करना है तो जोखिम तो उठाना ही होगा काम करो व्यस्त रहो कमाओ कमवाओ मिल बाँट कर रहो रहने दो, जिओ और जीने दो बहुत गजब का सेवा दर्शन था चौधरी साहब का जो बिल्कुल भरतीय राजनीती मे फिट बैठता था!
लेकिन वह यह भी कहते सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय राजनीती ऐसा दलों का दल दल है जहाँ दलाली ही श्रेष्ठ कर्तव्य एवं दायित्व बोध है!
यह उस योग्य तेज तर्रार स्मार्ट सौम्य विनम्र इंजीनियर चौधरी साहब के विचार थे जिसे पल प्रहर वह स्वंय जीते थे किन्तु उनके चेहरे पर अंतरमन की वेदना स्पष्ट परिलक्षित होती!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी
अक्सर कहते अपनी भावी पीढ़ी क़ो कुछ भी करने क़ो प्रेरित करे किन्तु कम से कम भारतीय राजनीती करने की बात उसके ख्वाब से दूर रखे!
भारतीय राजनीती मे सभी एक तरह से है पकड़ा गया बदनाम नहीं पकड़ा गाया महाराजा हरिशंचंद्र!
वर्तमान राजनीती पीना जनता का लहू ही है कुछ दिख जाते है कुछ दीखते नहीं लेकिन सभी राजनीतीग्यो मे इस मामले मे समानता है!
जुमला ईमानदारी का चलना चाहिए दिखना चाहिए लेकिन दल दल मे जितना धसते जायेंगे आनंद उतना आएगा!
चौधरी साहब के विचारों ने मुझे सजग सतर्क कर दिया क्योंकि वह तब भी सत्य थे वर्तमान मे भी सत्य है!
भारतीय राजनीती मे उनकी बात अभी सैंकड़ो वर्षो तक प्रासंगिक रहने वाली है मै!
डॉ सच्चिदानंद एवं जीवन प्रकश के समूह का महत्वपूर्ण अंग होने के कारण राजनितिक शासकीय प्रशासनिक गतिविधियों से
भिज्ञ था!
चपरासी से लेकर सभी छोटी बड़ी पोस्टिंग एवं जन समस्याओं आवश्यकताओ का शासकीय स्तर पर निपटान की प्रक्रिया बेहद शर्मनाक थी और है क्योंकि कोई भी राजनीतिज्ञ प्रत्याशी बनने से लेकर चुनाव जितने तक पैसा, बाहुबल, शाम,दाम, दंड,भेद सब करता है और सत्ता मे आने के बाद वहीं आशा प्रत्याशा रखता है!
सुनील शास्त्री जी के साथ विश्व के सबसे ईमानदार पिता राजनीतिज्ञ स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम था जिसे उन्हें अपने आचरण एवं व्यवहारिकता मे निभाना था जिसके लिए सुनील जी स्वंय सतर्क एवं संवेदनशील रहते थे!
लेकिन भारतीय राजनितिक परम्पराओ क़ो तोड़ सकने की क्षमता उनमे अपने पिता कि तरह नहीं थी उनकी व्यवहारिकता मे भारतीय राजनीतिज्ञ पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के राजनितिक शिष्य विश्वनाथ प्रताप सिंह का द्वन्द युक्त व्यक्तित्व झलकता था!
डॉ सच्चिदानंद जी के साथ मेरी बहुत सी महत्वपूर्ण संस्मरण है जो मुझे दिशा दृष्टि एवं दृष्टिकोण प्रदान करते हुए अजीब अंतरशक्ति का निर्माण करते है!
डॉ सच्चिदानंद जी वैचारिक
रूप से कम्युनिस्ट विचार धारा मार्क वाद से बहुत प्रभावित थे किन्तु सामाजिक ममालो मे भारतीय सनातन परम्परा एवं मान्यताओं क़ो आचरित करते थे किसी क़ो जो डॉ सच्चिदानंद जी क़ो व्यक्तिगत रूप से जनता पहचानता होगा उसे इस सच्चाई का एहसास अवश्य होगा!!
डॉ सच्चिदानंद जी से करीबी मित्रता के कारण गोरखपुर
विश्वविद्यालय के बहुत से कर्मचारियों आदरणीय प्रोफेसर से मेरी अच्छी खासी मित्रता हो गई थी जिसमे तत्कालीन प्राचीन विभाग के प्रमुख डॉ विश्वम्भर शरण पाठक, शैल नाथ चतुर्वेदी, डॉ सच्चिदानंद मिश्र जी, आदि अनादि सभी सम्मानित विद्वत मेरी बहुत इज्जत करते डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव के मित्र होने के कारण !
जिसमे विशेष रूप से डॉ विश्वाम्भर शरण पाठक जी गोरखपुर विश्वविद्यालय के उप कुलपति भी रहे मुझे भी विद्वत वर्ग के बीच मे सम्मान के साथ उठने बैठने का गौरवपूर्ण अवसर अक्सर मिलता रहता!
संस्मरण—(2)
डॉ सच्चिदानंद जी उन्ही दिनों अपना मकान देवरिया मे बनवा रहे थे बातो घर बनवाने मे दरवाज़े खिड़की के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है!
उन्होंने मुझसे कहा पंडित जी मकान के दरवाज़े खिड़की के लिए लकड़ी कि व्यवस्था हो जाती तो कुछ राहत कि सांस लेता ज्यो डॉ सच्चिदानंद जी ने मकान के खिड़की दरवाजो के लिए लकड़ी कि बात कहीं मैंने उन्हें देने का आश्वासन देते हुए विश्वास दिलाया!
कुछ दिन डॉ साहब कुछ नहीं बोले लेकिन कुछ दिन बाद
लगभग रोज लकड़ी के बाबत पूछते मै कुछ इधर उधर जबाब देता सच्चाई कहने कि हिम्मत नहीं जूटा पता क्योंकि मेरे गाँव सिसम एवं शाखु कि बहुत पुरानी लकड़ी बहुत दिनों से रखी थी जिसके आधार पर डॉ साहब के मकान के लिए लकड़ी देने का जुबान देकर आश्वास्त किया था गाँव गया तो पता लगा कि विवाद मे गांव वालो ने लकड़ी बेच दिया है या कहीं और उपयोग कर लिया है!
मेरे डॉ साहब क़ो जुबान देने के सप्ताह भर के अंदर ही बेच दी गई!
डॉ साहब क़ो इस सच्चाई का पता कही से लग गया तब
उन्होंने मुझसे कहा पंडित जी मुझे मालूम है सच्चाई आप बेवजह शर्मिंदा मत हो!
डॉ सच्चिदानंद जी जीवन
मूल्यों मे यथार्थ एवं वास्तविकता के पोषक थे झूठ, फरेब, धोखा, छल, प्रपंच, कपट से उनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं रहता विशुद्ध व्यवहारिक विद्वत आचरण था जो पारदर्शी प्रेरक एवं दिशा दृष्टिकोण प्रदान करता था!
संस्मरण–(3 )
भारत मे कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रमुख कर्णधारो मे मानवेन्द्र राय कि जन्म के शताब्दी वर्ष मे देवरिया के जिला परिषद हाल मे त्रिदिवसीय विचार गोष्टि का आयोजन किया गया था जिसमे एक से बढ़कर एक विद्वान वक्ताओ क़ो आमंत्रित किया गया था जिसमे प्रमुख थे गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन विभाग के प्रमुख डॉ विश्वाम्भर शरण पाठक जी मै भी आमंत्रित था कार्यक्रम आयोजको मे डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी प्रमुख थे!
कार्यक्रम के समापन दिवस डॉ विश्वाम्भर शरण पाठक जी का समापन व्यख्यान होना था डॉ पाठक देवरिया जिला परिषद हाल के मुख्य द्वार पर ज्यो ही पहुंचे देवरिया जनपद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अजित सिंह जी आए डॉ पाठक का पैर छूकर आशीर्वाद लिया ज़ब उनके साथ चल रहे स्कवार्ड अपने अधीक्षक अजित सिंह क़ो घेरा बनाकर कवर करना चाहा तभी अजित सिंह जी ने कहा हम अपने गुरु के सानिध्य मे है यहाँ हमें कोई खतरा नहीं है आप लोग दूर हट जाओ!
पुलिस अधीक्षक अजित सिंह जी ने अपने उदगार व्यक्त कहा गुरु अपने शिष्य क़ो शिष्य जो भी बनना चाहता है बना देता है लेकिन शिष्य गुरु क़ो कुछ दे सके संभव नहीं है जैसे कि मै गुरु कि कृपा आशीष से जो बनना चाहा बना आज भी इनका आशीर्वाद मेरी शक्ति संबल है!
डॉ सच्चिदानंद जी ने अजित सिंह जी का भावपूर्ण स्वागत किया मेरे लिए डॉ सच्चिदानंद के सम्बन्ध काल समय युग कि सर्वोच्च प्रेरक प्रेरणा प्रसंग है!
मै चाहूंगा आने वाली पीढ़ी का प्रत्येक युवा युग समाज राष्ट्र निर्माण मे अजित सिंह जी क़ो आत्म साथ करे एवं ईश्वर से श्रेष्ठ
विश्वम्भर शरण पाठक जैसे गुरुओ का अनुसरण करे!!
संस्मरण-(4)
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव अधीनस्थ मेरी पत्नी के अतिरिक्त दो अन्य मधु गुप्ता एवं सुमिता चटार्जी नाम कि लड़कियां शोध छात्रा थी डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव कि विशेषताओ मे खास बात यह थी कि वह अपने आस पास चाहे छात्र हो सहकर्मी या इष्ट मित्र सबके विषय मे बहुत संवेदनशील रहते थे उनके अधीनस्थ शोध कर रही छात्राओं मे सुमिता चटार्जी के पिता का स्वास्थ्य उन दिनों ठीक नहीं रहता था पिता के अतिरिक्त
आय का कोई श्रोत नहीं था
बेटा संजय और बेटी सुमिता
मै इन दो ही भाई बहन के विषय मे भिज्ञ हूँ दोनों ही समझदार एवं पढ़ने मे अपने समय के उत्कृष्ट, सर्वोत्तम छात्र थे!
डॉ सच्चिदानंद जी सुमिता के आर्थिक हालात से वाकिफ थे एक दिन उन्होंने कहा कि त्रिपाठी जी सुमिता ने भारतीय जीवन बीमा निगम मे सहायक पद के लिए आवेदन दिया था और लिखित परीक्षा मे चयनित है साक्षात्कार मे यदि कुछ मदद हो जाए तो शायद चयन हो जाए मै डॉ सच्चिदानंद जी के मित्रवत आदेश क़ो शिरोधार्य कर प्रयास करने लगा!
मै स्वंय जीवन बीमा निगम का अधिकारी था और निगम कि प्रत्येक गतिविधियों से भिज्ञ था मैंने भारतीय जीवन बीमा निगम के तत्कालीन मंडल इकाई के कर्मचारी संगठन के प्रभावी नेता दिलीप कुमार चटर्जी के माध्यम चयन के लिए अंतिम सक्षम अधिकारी के समक्ष सुमिता के चयन कि पुरजोर वकालत कराई
मैंने इस कार्य क़े लिए दिलीप कुमार चटर्जी क़ो इसलिए माध्यम बनने के लिए निवेदन किया क्योंकि तत्कालीन दौर मे सरकारी अर्ध सरकारी संस्थाओ
मे कर्मचारी संगठनों कि प्रभावी
एवं महत्वपूर्ण भूमिका लगभग प्रबंधन के प्रत्येक निर्णय मे हुआ करती थी!
सक्षम अधिकारी पूरी तरह संतुष्ट भी थे क्योंकि सुमिता कि मेरिट लिखित परीक्षा मे बहुत उच्च थी हम भी आश्वस्त थे कि सुमिता कि नियुक्ति हो जाएगी!
दूसरे दिन सक्षम अधिकारी ने पुनः दिलीप कुमार चटर्जी क़ो बुलाया और कड़े लहजे मे कहा चटर्जी जी सिफारिश करने या कोई बात करने से पूर्व अपनी बातो पर विचार कर लेते क्या कह रहे है? क्यों कह रहे है? किसके लिए कह रहे है?
कल आप जिस लड़की कि सिफारिस करने आए थे उसके भाई संजय चटर्जी कि बात
आप पहले ही कर चुके है!
संजय मेरिट मे भी बहन से ऊपर है अब आप ही निर्धारण करे एक परिवार से दो सदस्यों क़ो एक साथ नौकरी दिया जाना उचित है? या दो परिवारों के दो सदस्यों क़ो दिलीप कुमार चटर्जी निरुत्तर हो सक्षम अधिकारी गुप्ता जी के समक्ष नतमस्तक हो गए!
लौटकर दिलीप कुमार चटर्जी ने मुझे गुस्से मे खूब खरी खोटी सुनाई मैने दिलीप दा से किसी तरह यह कहकर सिफारिस के लिए माफ़ी मांगी कि दादा मुझे मालूम नहीं था कि आप सुमिता के भाई संजय कि पैरवी पहले ही कर चुके है और यह भी नहीं मालूम था कि सुमिता के भाई ने भी सहायक भर्ती परीक्षा दी है सुमिता क़ो भी बताना चाहिए था कि बहन भाई दोनों ने सहायक कि लिखित परीक्षा मे मेरिट मे उच्च स्थान प्राप्त किया है!
साक्षात्कार का परिणाम घोषित हुआ सक्षम अधिकारी निहायत ईमानदार और जिम्मेदार व्यक्ति गुप्त जी ने दिलीप कुमार चटर्जी क़ो बुलाया और संजय चटर्जी के चयन कि बधाई देते हुए कहा मेरा निर्णय सार्वजनिक प्रसंसनीय है मुझे बहुत लोगो ने संजय चटार्जी के चयन के लिए कृतज्ञता व्यक्र किया है!
मुझे भी संजय चटार्जी का चयन करके ख़ुशी है क्योंकि मेधावी छात्र के साथ साथ अनुशासित आज्ञाकारी संतान भी है मेरी जानकारी के अनुसार जो गलत नहीं है!
दिलीप कुमार मुख़र्जी जी अपने अंतिम दिनों अक्कसर ई डी एम एस सेंटर आते घंटो बैठते जल्दी जाने क़ो कहते तो मै अनुरोध कर बैठा लेता और स्मृतियों क़ो साझा करते!
दिलीप कुमार मुखर्जी के भाई वाराणसी मे बसे है उनका एक बेटा अनिर्माण मुख़र्जी उनका नाम लेकर मुझसे मिला मुझे बहुत ख़ुशी हुई मै जो भी अपने पद कद से अनिर्माण के लिए सहयोग कर सकता था किया अनिर्माण भदोही मे विकास अधिकारी नियुक्त था एक बार गोरखपुर मेरे घर भी आया है
गोरखपुर उसका आना जाना
होता रहता है!!
संस्मरण–(5)
भारतीय जीवन बीमा निगम मे सुमिता का चयन सहायक पद पर न होने के बाद डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी ने मुझसे फिर कहा कि सुमिता के लिए कही कोई जॉब मिल जाए तो बहुत अच्छा होगा!
डॉ साहब का आदेश सिरोधार्य कर मैंने पुनः प्रयास किया उस दौर मे भारतीय प्रशासनिक सेवा के कुछ नौजवान अधिकारियो कि नियुक्ति गोरखपुर मे थी जिसमे नव निर्मित विभाग अधिक थे!
जिसमे प्रमुख था गोरखपुर विकास प्रधिकरण एवं मंडल विकास निगम भारतीय प्रशासनिक सेवा के युवा अधिकारी दिलप कोटिया गोरखपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं मनोज कुमार जी मंडल विकास निगम के प्रमुख थे!
उस दौर मे गोरखपुर के सभी युवा अधिकारी शाम सुबह बैडमिंटन खेला करते थे मेरी पहुंच किसी तरह से वहाँ थी मैंने एक स्लिप पर हस्ताक्षर कर मंडल विकास निगम कार्यालय स्लिप देकर सुमिता चटार्जी क़ो भेजा सुमिता मेरा हस्ताक्षरित
स्लिप लेकर गोरखपुर मंडल विकास निगम कार्यालय गई वहाँ उसे तुरन्त रिसेप्सनिस्ट कि सेवा हेतु नियुक्ति किया गया ऐसा सुमिता ने ही बताया मुझे बाद मे सुमिता ने बताया कि घर वालों ने रिसेप्सनिष्ठ कि नौकरी करने से मना कर दिया!
कुछ दिनों तक सुमिता चटर्जी ने
गोरखपुर दूरदर्शन से महिलाओ के कार्यक्रम कि एंकर थी!!
संस्मरण–(6)
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी कि पदोन्नति रीडर पद पर होनी थी पदोन्नति समिति के अध्यक्ष प्राचीन इतिहास विभाग के प्रख्यात विद्वान डॉ लल्लन जी गोपाल विभागध्यक्ष प्राचीन इतिहास विभाग बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय थे उनकी धर्मपत्नी भी मैडम कृष्णा गोपाल भी बनारस हिन्दू विविद्यालय मे प्रोफेसर थी!
डॉ सच्चिदानंद जी का साक्षात्कार होना था डॉ सच्चिदानंद जी के साक्षात्कार कि सभी जिम्मेदारियों क़ो स्वयं जीवन प्रकाश ने बखूबी बड़ी जिम्मेदारी से निर्वहन किया वह स्वंय वाराणसी गए डॉ लल्लन जी गोपाल जी क़ो वाराणसी से गोरखपुर लेकर आए उनका पूरा ख्याल रखा और डॉ सच्चिदानंद जी का चयन रीडर पद पर हुआ जिसके लिए योग्यतम प्रत्याशी भी थे!
डॉ लल्लन जी गोपाल ज़ब डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी के रीडर पद के चयन समिति के अध्यक्ष बन कर आए थे वह 1987 का वर्ष था सम्भवतः
तब तक डॉ लल्लन जी गोपाल के चार पुत्रो मे कोई आत्म निर्भर नहीं था जिसकी पीड़ा उनके आभा मंडल पर स्पष्ट परिलक्षित होती थी!
संयोग कहें या सौभाग्य ज़ब मै स्वंय बलिया मे नियुक्त था मेरे तत्कालीन अधिकारी पंकज गोपाल जी लल्लन गोपाल जी होनहार सुपुत्र थे जिनमे लल्लन गोपाल जी के सद्गुण एवं मानवीय मूल्य विद्यमान है!
पंकज गोपाल जी भारतीय जीवन बीमा के सर्वोच्च पद अधिशासी निदेशक पद से जुलाई -2025 मे सेवा निवृत्त होकर लखनऊ जानकी नगर मे निवास करते है!
लल्लन जी गोपाल जी का मूल निवास इलाहबाद था बाद मे गुरुबाग वाराणसी मे उन्होंने अपना आवास बना लिया उनके चारो बेटे ईश्वर कि कृपा उनके पुण्य प्रताप से सुखी सवृद्ध, सक्षम,सबल एवं समाज मे सम्मानित होकर पिता कि आत्मा क़ो गौरवान्वित करने का अवसर प्रदान कर रहे है!!
लल्लन जी गोपाल जी का निधन वर्ष 1998 मे सेवानिवृत होने के एक वर्ष बाद ही हो गया मुझे डॉ लल्लन जी गोपाल के अंतिम विदाई मे सम्मिलित होने का अवसर मिला ऐसे मूर्धन्य विद्वान का सानिध्य आभा मंडल के किरणों का प्राप्त होना सदकर्मो का ही फल हो सकता है यह सच्चिदानंद जी के सानिध्य मित्रता से ही सम्भव हो सका!!
स्वर्गीय डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी के साथ मेरे महत्वपूर्ण संस्मरणों पर कई खंडो कि पुस्तक लिखी जा सकती है किन्तु कुछ संस्मरण ही प्रस्तुत है!!
सम्बन्ध एवं भावनाओं का सत्यार्थ —-
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव से मेरी मुलाकात मात्र एक संयोग नही था हम दोनों की मुलाकात संबंधों में संवेदनशीलता ,गुरुता ,गंभीरता प्रारब्ध भी था एव काल समय की निरन्तरता में सामाजिक, सांसारिक सम्बन्धो विशेष कर मित्रता का अविस्मरणीय पड़ाव था जिसे किसी के लिए भी विस्मृत कर पाना सर्वथा असंभव रहा एव था!
व्यक्तिगत, पारिवारिक , सामाजिक ,काल ,समय परिस्थिति के कारण सम्भव है कुछ दूरी या विस्मृति दृष्टव्य हुआ हो किंतु एक दूसरे ने कभी एक दूसरे को विस्मृत नही किया जब भी मैं डॉ सच्चिदानंद जी बैठते एक बात कभी नही भूलते वह डॉ ही स्वंय कहते !
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी सदैव कहते त्रिपाठी जी मेरे नाम के मध्य में #नंद #आता है सच्चिदा नंद आपके नाम का शुभारंभ ही #नंद #से होता है !
नंद लाल और भी आगे बढ़ते हुए कहते मैं कायस्थ कुल श्रीवास्तव लाल या लाला भी वंशीय समाज मे अक्सर सम्बोधित किए जाते सम्मानित विभूषित किए जाते और आपके नाम के अंत मे नंद लाल है अर्थात नंद भगवान कृष्ण के गोप वातशल्य का गुणगान है# लाल# दुलार ,प्यार ,लाड़ का संबंध संबोधन है!
हम दोनों ही नंद है हम अंत मे त्रिपाठी जी आप आरम्भ में हम दोनों ही लाल है हम कायस्थ कुल के कारण आप नामकरण के कारण ठहाके गूंज जाते !
मै भी डॉ के नहले पर दहला रखता मैं भी डॉ साहब को विश्लेषित करता कहता डॉ साहब (श्री )अर्थात यश, कीर्ति ,प्रतिष्ठा या लक्ष्मी वास्तव का स्पष्ट अर्थ है कि वास्तविकता सच्चाई मतलब श्रीवास्तव अर्थात लक्ष्मी, यश, कीर्ति ,प्रतिष्ठा दोनों आपके पास है!
डॉ विद्या के रूप में साक्षात लक्ष्मी एव शिक्षक के रूप में दोनों की सामाजिक उच्च ग्रहता ही श्रीवास्तव का सत्यार्थ एव डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी की सच्चाई ,यथार्थ ,वास्तविकता है ठहाकों का क्रम ही नही टूटता!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव अक्सर कहते त्रिपाठी जी आप कीसी विभाग ,समाज ,समय परिवेश में रहे डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव को कभी विलग नही कर पाएंगे सदैव आप मुझे मेरी छाया के रूप में महशूस करेंगे पाएंगे!
डॉ साहब के कहे ये शब्द उनकी अन्तरात्मा की आवाज थी जिसकी सच्चाई सम्पूर्ण जीवन मे मैंने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अनुभव किया !
विल्कुल सत्य है जीवन मे कुछ मूल्य संबंध ऐसे ही होते हैं चाहे उनमें कितने उतार ,चढ़ाव खटास, मिठास आवे समय समाज परिस्थिति ,स्थिति आवे दुराव या दूरी संबंध की संवेदना का आकर्षण प्रभाव कभी कम नही करता या कर सकता है बल्कि बढ़ता ही और विखराव और दूरी की वेदना से व्यथित ही करता है यही सच है मेरी डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव से प्रथम मुलाकात एव काल समय पल प्रहर के संस्मरण में!
अति महत्वपूर्ण तथ्य तत्व की अभिव्यक्त करना डॉ साहब कभी नही भूलते वह अक्सर कहते त्रिपाठी जी मैं स्वंय पुर्वांचल के अति महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण विभाग मैं आचार्य हूँ मेरे पढ़ाए हुए छात्र देश के विभिन्न कोनो के विभिन्न विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर सर्व शक्ति एव अधिकार सम्पन्न है साथ ही साथ गोरखपुर एव पूर्वांचल की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में भी मेरी एव मेरे छात्रों की प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सभागिता है फिर भी जब भी कोई मुझसे किसी कार्य के लिए जैसे नौकरी आदि के लिए कहता है मैं आपको ही कहता हूँ मैं ना तो अपने राजनैतिक सम्बन्धो को ना ही पढ़ाए छात्रों से कुछ भी कहता हूँ जानते हैं क्यों?
मैं उनके इस प्रश्न पर जिज्ञाशु होकर उनसे ही प्रश्न कर बैठता क्यो डॉ साहब ?
तब डॉ साहब बहुत साफ शब्दों में कहते त्रिपाठी जी मैं चाहता हूँ कि समाज एव दुनिया जाने की आप एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व क्षमता, शक्ति सत्ता के केंद्र है यह बात सत्यापित होनी चाहिए कि आप किसी भी सक्षम शक्ति सत्ता सम्प्पन्न बाहु बली हो या राजनीतिक रसूख का व्यक्ति से कम नही है और आपने मेरे कहने पर प्रमाणित भी किया है!
आपने शक्ति सत्ता राजनीति के शिखर के अभिमान को धूल धुसित किया है यह बात कम से कम लोगो के सज्ञान में आई आपने अहंकारी प्रवृति के बाहुबली को भी ना जाने कैसे नतमस्तक किया है जब कि लोग मानते हैं कि ऐसे समाज व्यक्ति के समानांतर कोई सत्यार्थ प्रमाणित करना जान को जोखिम में डालना है!
आपने वह भी सार्वजनिक रूप से बड़े सौम्यता से प्रमाणित किया बहुत स्पष्ठ है त्रिपाठी जी आपके पीठ में ना तो कोई धूल लगा सकता है ना पराजित या अपमानित करने का दुस्साहस कर सकता है और यदि आपके जीवन मे ऐसा कभी भी
होता है तो मेरी बात ध्यान से सुनिए मैं ज्योतिषी नही हूँ ज्योतिष के गहन जानकर भी आप ही है आप अपमानित पराजित तभी हो सकते हैं जब आपका ही कोई अपना विभीषण ,जयचंद की भूमिका का निर्वहन करे डॉ सच्चिदानंद जी की यह भी बात मेरे पूरे जीवन मे सत्य सावित होती रही !
डॉ साहब कि सलाह पर मैंने किसी को भी अपना राजदार नही बनाया कोई बेमतलब कुछ इधर उधर कर दे वह अलग बात है न्यूनतम सामाजिकता का निर्वहन करने के बाद मैं उस पल प्रहर को अतीत के पन्नो में साक्ष्य के रूप में संजो लेता जिसका कारण डॉ साहब द्वारा दिया गया मित्रवत मूल मंत्र था एक सच्चे सम्बंध का शाश्वत जीवन मे पल प्रहर प्रवाह !!
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से मेरी मुलाकात एक बहुत ही अच्छा अनुभव था वह एक बहुत ही सरल और सज्जन व्यक्ति थे !
उनकी पत्नी डॉ विद्या श्रीवास्तव भी एक बहुत ही सरल और विनम्र भरतीय महिला है।
डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से मेरी मुलाकात एक ऐसा अनुभव था जिसने मेरे जीवन को एक नए दिशा की ओर प्रेरित किया।
उनकी सरलता, सज्जनता और
ज्ञान की गहराई ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।
काल,समय, वक़्त बढ़ा निष्ठुर होता है वह अपनी गति से चलता रहता है और अपनी गति के प्रत्येक लम्हें पल प्रहर मे शक्ति सत्ता शिखर क़ो बनते विखरते देखता अपने अतीत स्मृति याद स्मरण मे पर्त दर पर्त आने वाले अगले पथ पढ़ाव के लिए प्रेरणा कि पूंजी दौलत भविष्य के पीढ़ी परिवार समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है!
अतीत कि सीखो के आधार पर वर्तमान मे नए इतिहास कि रचना करने कि चुनौती के रूप मे प्रस्तुत कर भविष्य का इतिहास निर्माण करता है!
काल,समय, वक़्त, अपने दामन मे ऐसे जाने कितने बनते विगड़ते शक्ति सत्ता के अतीत इतिहास क़ो समेटे आने वाले अपने प्रत्येक पल प्रहर लम्हें के लिए नई ऊर्जा उत्साह कि दौलत पूंजी वर्तमान के समक्ष प्रस्तुत करता हुआ नित्य नए उन्नयन,उन्नति अवनयन, अवनती के सापेक्ष नए
सत्ता शासक क़ो बनते एवं मजबूत एवं बहुत गहरे शक्ति सत्ता क़ो उखड़ते देखता, समझता, गुण,अवगुणो का विश्लेषण करता अपनी
गति से आगे निकल जाता है छोड़ जाता है अपने अतीत के पग पथ के निशान जो आने वालो क़ो दिशा,दृष्टि, दृष्टिकोण प्रदान करता है जिसके आधार पर अपनी क्षमता सोच समझ के अनुसार पीढ़ी समाज निष्कर्ष निकाल उसे आत्मसाथ या परित्याग करती है!
परिवार,परम्परा, समय, समाज, राष्ट्र मे काल,समय, वक़्त के सच का सानिध्य तूफान, हादसा, तूफान, हादसा इसलिए क्योंकि तूफान हादसा शांत होने के बाद वह शक्ति पुनः स्थापित नहीं हो पाती जो तूफान या हदसे के समय रहती है!
यही सत्यार्थ था जीवन प्रकाश के साथ का जो तत्कालीन ऊर्जा मंत्री सुनील शास्त्री कि शक्ति सत्ता एवं राजनितिक सत्ता के आधार पर स्थापित था एवं जिसके एक केंद्र डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी थे एवं मै श्रीवास्तव जी के कारण जाना जाने वाला था !
मुझे ठीक याद है एवं मेरी यादास्त दुरुस्त है तो मुझे 2 अगस्त -1988 का वह दिन जिस दिन सुबह सुबह ही खबर आई सुनील शास्त्री जी ने
तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बीरबहादुर सिंह
जी के कैबिनेट से त्याग पत्र दे दिया त्याग पत्र मे सिर्फ इतना ही लिखा ( आदरणीय भाई साहब मै अपने व्यक्तिगत कारणों से अपनी जिम्मेदारी क़ो निभाने मे सक्षम नहीं हूँ अतः मन्त्रीमंडल से
त्याग पत्र दे रहा हूँ ) सम्भव है शब्दों मे कुछ हेर फेर हो लेकिन शब्दार्थ यही स्पष्ट थे!
सुनील शास्त्री के मन्त्रीमंडल से त्यागपत्र का स्पष्ट संकेत था कि
वीर बहादुर सिंह का भी मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र जो सुनील शास्त्री के त्याग पत्र के ठीक तीन महीने बाद हुआ!
प्रदेश का नेतृत्व कांग्रेस के पुराने ध्रुव एवं सत्ता शक्ति नारायण
दत्त तिवारी जी के हाथ चली
गई बीर बहादुर सिंह जी केंद्र मे संचार मंत्री बने और ठीक छः महीने बाद इटली से जहाँ किसी अंतराष्ट्रीय सम्मेलन मे भाग लेने गए थे अचानक उनके निधन कि
खबर ने पूरे पूर्वांचल क़ो स्तब्ध कर दिया!
मुझे बहुत अच्छी तरह याद है गोलघर का स्वर्गीय बीर बहादुर सिंह जी का आवास चील चीलाती धुप भयंकर ज्वाला आग उगलती गर्मी एवं तिरंगे मे लिपटा स्वर्गीय बीरबहादुर सिंह जी का शव साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी एवं जनता कि भीड़ मै भी कुछ दूर खड़ा इस दुःखद पल का साक्षी रहा!
निश्चित रूप से बीरबहादुर सिंह जी का आकस्मिक निधन पूर्वांचल कि राजनीती मे अपूर्णीय क्षति था तो विकास का अवरुद्ध होना जिसकी क़ीमत बहुत दिनों तक पूर्वांचल उत्तर प्रदेश भुगतता रहा!
उस दौर मे पूर्वांचल मे दो विकास पुरुष के नाम से भ्रष्ट होते राजनीती के दौर मे भी प्रसंगिग महत्वपूर्ण एवं आशा विश्वास के जन केंद्र थे!
पहला स्वर्गीय बीरबहादुर सिंह जी गोरखपुर दूसरा कल्पनाथ राय मऊ जिन्हे आज भी जनता बड़े आदर से अपने स्मृति मे संजोये हुए है!!
सुनील शास्त्री जी के प्रदेश मन्त्रीमंडल से ऊर्जा मंत्री पद से त्याग पत्र देने के अगले दिन 3 अगस्त -1988 क़ो जीवन प्रकाश के साथ नियमित रहने वाले अधीक्षण अभियंता खान साहब जीवन प्रकाश क़ो अपनी फियेट कार से गोरखपुर रेलवे स्टेशन छोड़ने गए मै भी साथ था जीवन प्रकाश मन्त्रीमंडल से सुनील शास्त्री जी के त्यागपत्र के बाद कि राजनीती एवं भविष्य पर विचार विमर्श हेतु जा रहे थे स्टेशन से लौटते समय खान साहब ने कहा त्रिपाठी जी सत्ता गई सब समाप्त!
देखिएगा जीवन प्रकाश ज़ब लौट कर आएंगे तब उनसे बात करने वाला कोई नहीं मिलेगा जो भीड़ मजमा रसूक आय दिन दीखता था वह सत्ता कि चमक थी हुआ भी ठीक वैसा जीवन प्रकाश लखनऊ से लौट कर आए उदास उनकी हनक समाप्त हो चुकी थी विद्युत् विभाग जो जीवन के इशारे कि इंतज़ार करता था वह पहचनता तक नहीं था!
धीरे धीरे डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव एवं जीवन प्रकाश कि मुलाकातों का दौर कम होते होते लगभग समाप्त हो गया डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी क़ो प्रोफेसर कॉलोनी मे आवास मिल चुका था और उन्होंने अपना बक्शीपुर आवास छोड़ दिया था मेरा भी आना जाना बहुत सीमित हो गया था और डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से मुलाक़ात के अरसा बीत गए थे एका एक एक दिन मेरी मुलाक़ात हुई विश्वविद्यालय मे तब उन्होंने बताया कि उन्हें मुँह मे कुछ समस्या थी जिसका इलाज चल रहा है बायोप्सी आ गयी है कैसर नहीं है!
मुझे मालूम था कि डॉ साहब का साथ बहुत दिनों का है अभी मैंने डॉ साहब से बताया कि मेरा भी स्थानांतरण होने वाला है!
उन्होंने बहुत शानदार लहजे मे कहा त्रिपाठी जी जहाँ जायेंगे सच्चिदानंद चिंगम कि तरह चिपका मिलेगा!
सुनील शास्त्री जी कि राजनीती समाप्त हो चुकी थी इस सच्चाई के बावजूद कि गोरखपुर एवं इलहाबाद से कोई सकारात्मक सोच का कायस्थ विधानसभा मे
स्थाई रूप से रह सकता है!
सुनील शास्त्री जी ने ना गोरखपुर से जहाँ उनकी हनक थी ना इलहाबाद से जहाँ उनके पिता के राजनितिक शिष्य राजा मंडा का गढ़ था से राजनीती किया या कहीं भी किसी भी राजनितिक दल के प्रभावी नेता हो सम्भव नहीं हुआ!
इसका कारण बहुत स्पष्ट था सुनील शास्त्री जी पिता कि तरह ना तो जमीनी व्यक्ति थे ना ही पिता जैसे ईमानदार यही कारण था कि लाल बहादुर शास्त्री के सापेक्ष ज़ब भी कोई सुनील शास्त्री क़ो देखता भरोसा करना
सम्भव नहीं हो पता यही कारण था कि दोबारा सुनील शास्त्री क़ो कांग्रेस ने कोई अवसर दिया हो मुझे याद नहीं!
मैं निरंतर एक जगह से दूसरे जगह स्थानांतरित होता रहा मेरे इतने स्थानांतरण हुए कि प्रशासन प्रबंधन के वर्ष 2022 तक के सम्पूर्ण भारत के सभी विभागों के उपलब्द आंकड़ों मे मे अब्बल था!
मुझे कभी कोई चिंता नहीं रही जहाँ भेजो चला जाता सिर्फ मिर्ज़ापुर से शाह गंज स्थानांतरण अपवाद इसलिए है कि वहाँ तैदुओ के आतंक कि खबरे आय दिन आती थी मेरे बच्चे छोटे थे जिसके कारण वहाँ से बदतर स्थान मैंने स्वंय चुना जहाँ कोई जाना नहीं चाहता कोई चला गया तो पहले दिन से भगना चाहता इसी भाग दौड़ मे कभी कभार मै गोरखपुर आता अवकाश मे विश्वविद्यालय जाना नहीं हो पता अतः डॉ सच्चिदानंद जैसे पुराने मित्र बहुत दूर नेपथ्य मे खो गए!
वर्ष 2007 मे दस माह के लिए मेरी नियुक्ति गोरखपुर मे थी वह दस माह मेरे लिए बहुत कठिन दौर था भय,भ्रम, संसय का वातावरण कुछ भी निश्चित नहीं इस दौरान डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई किन्तु स्वर्गीय जीवन प्रकाश जी डी आई जी आवास के पास आमना सामना हुआ!
वर्ष 2011 मे मेरी नियुक्ति पुनः गोरखपुर हुई तब तक डॉ सच्चिदानंद जी सेवानिवृत हो कर देवरिया जा चुके थे इसी दौरान मुझे डॉ शैल नाथ चतुर्वेदी जी पूर्व विभागा ध्यक्ष प्राचीन इतिहास विभाग के निधन कि सूचना
मिली मैंने अपनी संवेदनाए उनके सुपत्र अरविन्द चतुर्वेदी क़ो
सोसल मिडिया द्वारा प्रेषित किया जबकि अरविन्द चतुर्वेदी जी से मेरी आज तक मुलाक़ात नहीं है!
मै सेवा निवृत्त होकर गोरखपुर रहने लगा अगस्त 2023 मे समाचार पत्रों के माध्यम से डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी के महाप्रायाण कि सूचना मिली
मैंने श्रद्धांजलि मे गोरखपुर विश्वविद्यालय के सोसल मिडिया पर अपने संस्मरण जो डॉ सच्चिदानंद के साथ बिताए थे साझा किया!
स्वयं मै उनके आवास देवरिया गया जहाँ डॉ विद्या श्रीवास्तव जी
एवं उनकी दोनों पुत्रीया एवं दामाद प्रशांत से मुलाक़ात हुई यह जानकार किसी क़ो भी आश्चर्य हो सकता है कि डॉ सच्चिदानंद श्रीवास्तव जी से मेरी इतनी निकटता होने के वावजूद उनके परिवार से प्रथम मुलाक़ात उनके निधन के बाद हुई!
कुछ देर रुकने के बाद ज़ब मै लौटने लगा तो ऐसा लगा जैसे डॉ सच्चिदानंद जी स्वंय कह रहे हो त्रिपाठी जी आपने आते आते बहुत देर कर दी मेरी आंखे भर गयी किसी तरह अपनी वेदना छिपाते हुए लौटा!
नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश!!
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