बारिश में एक स्त्री…!

भीगती हुई शाम, वह चुपचाप खड़ी थी,
बादलों से नहीं, पुराने ख़त से बात करती।
बालों से टपकती बूँदें गालों पे ठहर जातीं,
आँखें-दूर आसमां में अनकहे उत्तर खोजतीं।
बारिश तो रोज़ होती है, मगर हर एक बूँद
एक जैसी कहीं भी न होती।
कुछ मिट्टी को भिगोती, कुछ यादों को।
उसके होंठों पर कोई शिकायत न थी,
बस, एक अधूरा-सा प्रश्न कोंध रहा था-
“क्या? लौटकर आएगा वह मौसम,
जो कभी मेरे हिस्से में था?”
पेड़ की छाँव उसे पूरा नहीं ढक पाई,
क्योंकि कुछ बारिशें बाहर नहीं, अंदर होती।
वह भीगती रही, आकाश को निहारती रही,
और बारिश उसके चेहरे से होकर
धीरे-धीरे उसकी ख़ामोशी में उतरती रही।
आज शायद वह उदास नहीं थी,
वह बस अपने भीतर बचे
एक छोटे-से सपने को बारिश से सींच रही थी।
क्योंकि कुछ स्त्रियाँ टूटकर भी नहीं बिखरतीं-
वे बारिश की तरह चुपचाप गिरती रहती हैं,
और किसी की सूनी ज़िंदगी में प्यारी
“हरियाली” लेकर आती हैं।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986
(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित)
संजय एम. तराणेकर,
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्यप्रदेश)
स्वरदूत : 98260-25986

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