प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे प्रसिद्ध निबन्धकार और आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की जयन्ती के अवसर पर ‘साहित्य-जगत् मे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सत्ता और महत्ता’ विषयक एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन उनकी जन्मभूमि बलिया और कर्मभूमि प्रयागराज से एक साथ किया गया, जिसमे देश के प्रतिष्ठित प्रबुद्धवृन्द की वैचारिक सहभागिता रही।
आगरा से केन्द्रीय हिन्दी-संस्थान मे सांध्यकालीन पाठ्यक्रम-विभाग के अध्यक्ष प्रो० उमापति दीक्षित ने बताया– आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की महत्ता इस तथ्य मे निहित है कि वे साहित्य को केवल सौन्दर्याभास न मानकर, उसे सांस्कृतिक चेतना का जीवन्त प्रवाह रूप मे प्रतिष्ठित भी करते हैँ। बलिया से श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय मे हिन्दी के आचार्य प्रो० जैनेद्रकुमार पाण्डेय ने कहा– द्विवेदी जी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचक से टकराते हुए, हिन्दी-आलोचना मे दूसरी परम्परा की नीवँ रखते हैँ। आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– काशी नागरी प्रचारिणी सभा मे उपाध्यक्ष और अन्वेषण-विभाग के निदेशक, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष तथा हिन्दीसाहित्य मे आदिकाल-निर्धारण करनेवाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक आलोचना और समीक्षा-साहित्य का अनुशीलन करने से ज्ञात होता है कि उनकी समीक्षा मे सद्भावना और काव्यालोचना मे देशहित और कालगत संस्कार का समावेश है। पुणे से हिन्दी-विदुषी डॉ० नीलम जैन ने कहा– हजारीप्रसाद द्विवेदी की महत्ता इस बात मे है कि उन्होँने साहित्य को केवल मनोरंजन वा सौन्दर्याभिव्यक्ति का साधन न मानकर, उसे समाज, संस्कृति और मानवता की उन्नति का उपकरण बनाया। बलिया से सतीशचन्द्र कॉलेज मे हिन्दी-विभागाध्यक्ष प्रो० श्रीपति यादव ने कहा– बलिया के होने के नाते द्विवेदी जी का सम्पूर्ण साहित्य ‘पुनर्नवा’ मे ‘लोरिकायन’ से प्रभावित है तो कहीँ कबीर के फक्कड़पन से; कालिदास के लालित्य से तो रबीन्द्रनाथ टैगोर के विचारोँ से। प्रयागराज से आर्यकन्या डिग्री कॉलेज की सेवानिवृत्त हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० कल्पना वर्मा ने कहा– द्विवेदी जी समस्याधर्मी विषयोँ को समकालीनता से जोड़कर, उनकी व्याख्या करने मे सिद्धहस्त दिखते हैँ। लखनऊ से राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज मे हिन्दी-प्रवक्ता डॉ० प्रतिभा मिश्र ने कहा– आचार्य द्विवेदी का महत्त्व इस बात मे है कि वे हमे अपनी जड़ोँ से जोड़कर आधुनिक चिन्तन की ओर प्रेरित करते हैँ। पुणे से स्वतन्त्र लेखिका, वक्ता और पत्रकार ममता जैन ने कहा– द्विवेदी जी के उपन्यासोँ मे निपुणिका, चन्द्रलेखा, चन्द्रा, महामाया इत्यादिक नारियाँ सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करती लक्षित होती हैँ। चटमाडीह (बिहार) से सुशिक्षिता-गृहिणी श्वेता राठौर ने कहा– द्विवेदी जी ने आधुनिक हिन्दी-आलोचना की प्रगतिशील परम्परा एवं हिन्दीसाहित्य-लेखन का सूत्रपात किया था। लखनऊ-विश्वविद्यालय मे हिन्दी-साहित्य के शोधार्थी अशोक अग्निपथी ने कहा– साहित्यजगत् मे द्विवेदी जी की सत्ता और महत्ता कालजयी ही है। दिल्ली से सेवानिवृत्त अध्यापिका कल्पना मनोरमा ने कहा– आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सघन-गहन विश्लेषण-क्षमता और ऐतिहासिक दृष्टि हिन्दी साहित्य के अध्ययन को नयी दिशा देती है।
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