डॉ. सत्यवान सौरभ
हरियाणा के एक छोटे-से कोने में बसा था छतरपुर गाँव। गाँव छोटा था, लेकिन उसके रिश्तों की दुनिया बहुत बड़ी थी। वहाँ आज भी सुबह मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ होती थी और शामें चौपाल की बतकही में ढलती थीं। पीपल के पुराने पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ जैसे हर घर का हाल जानती थीं। सूरज की पहली किरण जब कच्ची गलियों पर उतरती, तो स्कूल की पोशाक पहने बच्चे किताबों का बस्ता कंधे पर लटकाए दौड़ पड़ते और औरतें सिर पर परात या घड़ा रखे कुएँ की ओर निकल जातीं।
इसी गाँव के एक छोटे-से कच्चे घर में उस सुबह सुजाता अपनी उँगलियों के बीच एक रंगीन धागा उलझाए बैठी थी। रक्षाबंधन आने वाला था। आँगन में माँ काम में व्यस्त थीं। उन्होंने सहज ही कहा, “इस बार राखी पर भैया शायद नहीं आ पाएगा। शहर में नौकरी करता है, बहुत व्यस्त रहता है।”
सुजाता ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके हाथ धागे को बुनते रहे, लेकिन उसकी आँखें जैसे कहीं दूर चली गई थीं। उनमें ऊपर से झील जैसी शांति थी, मगर भीतर एक बेचैन नदी बह रही थी। उसे विश्वास था—मनोज आएगा। जरूर आएगा। इस बार वह राखी भेजेगी ही नहीं। शायद इसी बहाने उसका भाई समझ पाए कि कुछ रिश्ते संदेशों, फोन कॉलों और ऑनलाइन शुभकामनाओं से नहीं निभते।
मनोज उससे तीन साल बड़ा था। दोनों जुड़वाँ नहीं थे, लेकिन बचपन ने उनके बीच ऐसा रिश्ता बुना था, जिसमें उम्र का अंतर कभी महसूस नहीं हुआ। सुजाता के रोने पर मनोज अपनी पतंग छोड़ देता था। वह साइकिल से गिरती तो पहले उसे उठाता, फिर अपनी चोट देखता। स्कूल जाते समय अगर उसका बैग भारी लगता तो बिना कुछ कहे उसे अपने कंधे पर टाँग लेता।
रक्षाबंधन उनके बचपन का सबसे प्रिय त्योहार था। सुजाता हर साल अपने हाथों से राखी बनाती। कभी रंगीन मोतियों से, कभी चमकीले सितारों से, तो कभी लाल-पीले धागों को जोड़कर। माँ उसकी मदद करतीं और मनोज दूर बैठा मुस्कराता रहता।
राखी बाँधते समय सुजाता हमेशा एक ही बात कहती, “आज से तू मेरी रक्षा करेगा और मैं तेरे सपनों की।”
मनोज हँसते हुए अपनी कलाई आगे कर देता, “तो तू कलेक्टर बनेगी और मैं तेरा बॉडीगार्ड।”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते।
बचपन के वे छोटे-छोटे वादे कब जिंदगी के बड़े सवाल बन गए, पता ही नहीं चला।
समय ने करवट ली। मनोज पढ़ाई के लिए दिल्ली चला गया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। उसके जीवन में सुविधाएँ बढ़ीं, वेतन बढ़ा, पहचान बढ़ी और शहर की चमक भी। लेकिन इसी चमक में कुछ पुराने रिश्तों की रोशनी धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगी।
शुरुआत में मनोज रोज फोन करता था। फिर फोन सप्ताह में एक बार आने लगा। उसके बाद त्योहारों तक सीमित रह गया। हर बार उसके पास एक ही जवाब होता—“बहुत काम है”, “मीटिंग चल रही है”, “अभी समय नहीं है”, “अगली बार जरूर आऊँगा।”
सुजाता अब कॉलेज में थी। हिंदी साहित्य में उसने विश्वविद्यालय स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया था। उसके भीतर शब्दों की दुनिया बसती थी। वह लिखना चाहती थी, पढ़ना चाहती थी, आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन गाँव की परिस्थितियाँ उसके सपनों के सामने बार-बार दीवार बनकर खड़ी हो जाती थीं।
एक दिन माँ ने मनोज को फोन किया।
“बेटा, इस बार राखी पर आ जाना। सुजाता कई दिनों से तेरी राह देख रही है।”
दूसरी ओर कुछ क्षण खामोशी रही। फिर मनोज हँस पड़ा।
“अरे माँ! अब क्या राखी-शाखी? हम बच्चे थोड़े ही रहे। ऑनलाइन राखी भेज देना। मैं वीडियो कॉल पर हाथ जोड़ दूँगा।”
माँ ने शायद उस बात को हँसी में टाल दिया, लेकिन पास खड़ी सुजाता के भीतर कुछ टूट गया।
उसने सोचा—जिस भाई के लिए राखी कभी बचपन का सबसे बड़ा उत्सव हुआ करती थी, उसके लिए अब वह एक ऑनलाइन औपचारिकता भर रह गई है।
उस रात उसने अपनी अलमारी खोली। रंग-बिरंगी राखियों के बीच एक खाली जगह थी। उसने राखी बनाने के लिए धागे निकाले, फिर उन्हें वापस रख दिया।
उस वर्ष उसने मनोज को राखी नहीं भेजी।
माँ ने पूछा, “क्या हुआ? राखी क्यों नहीं बनाई?”
सुजाता ने धीमे स्वर में कहा, “माँ, जब धागे की कीमत समझने वाला हाथ ही दूर हो जाए, तो धागा भेजने से क्या फायदा?”
माँ ने उसे डाँटा, “भाई है तेरा। नाराजगी अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह।”
सुजाता की आँखें भर आईं।
“माँ, रिश्ता तो मैंने कभी छोड़ा ही नहीं। लेकिन हर रिश्ता सिर्फ एक तरफ से तो नहीं निभता।”
उसने फोन भी नहीं उठाया। मनोज ने कई बार संपर्क करने की कोशिश की। शायद पहली बार उसे महसूस हुआ कि राखी का न आना केवल एक भूली हुई रस्म नहीं, बल्कि उसकी बहन की चुप नाराजगी है।
रक्षाबंधन से एक दिन पहले सुबह गाँव की गलियों में सजावट होने लगी थी। बच्चे उत्साह में इधर-उधर दौड़ रहे थे। तभी पीपल के पेड़ के नीचे एक टैक्सी आकर रुकी।
मनोज उतरा।
कंधे पर बैग था। चेहरे पर शहर की थकान थी, लेकिन आँखों में एक पुरानी तलाश।
घर का दरवाजा खुला तो माँ उसे देखकर कुछ क्षणों तक विश्वास ही नहीं कर पाईं।
“मनोज! तू… अचानक?”
मनोज मुस्कराया।
“हाँ माँ। इस बार राखी बाँधने आया हूँ।”
माँ कुछ कह पातीं, उससे पहले मनोज ने धीमे से कहा, “सुजाता ने राखी नहीं भेजी, इसलिए आया हूँ। उसे बताना है कि मैं अब भी उसका वही मोटू भैया हूँ, जिसे वह बचपन में चिढ़ाती थी।”
माँ की आँखों में नमी आ गई।
“ऊपर छत पर है,” उन्होंने बस इतना कहा।
सुजाता छत पर खड़ी दूर खेतों की ओर देख रही थी। उसे मनोज के आने की आहट सुनाई दी, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मनोज उसके पास जाकर खड़ा हो गया।
कुछ क्षण दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर मनोज ने पूछा, “राखी नहीं भेजी क्यों?”
सुजाता ने धीरे से उसकी ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं।
“क्योंकि मैं थक गई हूँ, भैया।”
मनोज चुप रहा।
“हर साल तुम्हें याद दिलाते हुए कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती। तुम्हें याद है, जब मेरी साइकिल टूटी थी तो तुमने अपनी बचत से उसे ठीक करवाया था? जब मुझे कॉलेज का फॉर्म भरना नहीं आता था, तो तुमने रात भर बैठकर मेरी मदद की थी? और जब मैं रोते हुए कहती थी कि मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ, तब तुमने कहा था—‘मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।’”
उसकी आवाज भर्रा गई।
“कहाँ गया वो साथ, भैया?”
मनोज के पास कोई उत्तर नहीं था।
उसने जेब में हाथ डाला और एक पुरानी, थोड़ी फीकी पड़ी राखी निकालकर सुजाता की हथेली पर रख दी।
“याद है?”
सुजाता ने राखी को देखा। उसकी आँखें फैल गईं।
“पाँचवीं कक्षा में तूने बाँधी थी,” मनोज बोला। “इतने साल हो गए, लेकिन मैं इसे अपने वॉलेट में लेकर घूमता रहा।”
सुजाता की पलकों पर आँसू ठहर गए।
“तो फिर इतना दूर क्यों हो गए?”
मनोज ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि बड़ा होने की कोशिश में मैं शायद बहुत कुछ भूल गया। मुझे लगा जिम्मेदारियाँ सिर्फ पैसे कमाने से पूरी होती हैं। मैं यह भूल गया कि भाई होना किसी बैंक खाते की तरह नहीं होता, जिसमें पैसे भेजकर हिसाब पूरा कर दिया जाए।”
उसने बहन की ओर देखा।
“तू सही थी, सुजाता। मैं देर से समझा, लेकिन अब समझ गया हूँ।”
अगली सुबह घर में फिर वही चहल-पहल थी, जो बचपन के रक्षाबंधन की याद दिलाती थी। माँ ने थाली सजाई। रोली, अक्षत, मिठाई और दीपक के बीच एक राखी रखी थी।
सुजाता ने मनोज की कलाई अपनी ओर खींची। कुछ पल वह राखी को देखती रही, फिर सावधानी से उसकी कलाई पर बाँध दी।
मिठाई खिलाते हुए उसने धीमे से कहा, “एक वादा कर।”
“बोल।”
“अगले साल फिर आना। और सिर्फ राखी पर नहीं। मेरे हर सपने के साथ खड़ा होना।”
मनोज की आँखें नम थीं।
“वादा है। अब मैं सिर्फ तेरी कलाई की रक्षा नहीं करूँगा, तेरे सपनों की भी रक्षा करूँगा।”
कुछ महीनों बाद सुजाता का चयन दिल्ली की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में हो गया। इस बार मनोज ने केवल बधाई नहीं दी। उसने उसका दाखिला करवाया, हॉस्टल की व्यवस्था की और उसे शहर में नए जीवन की शुरुआत के लिए तैयार किया।
जब माँ ने चिंता से पूछा, “बेटा, बहन को इतनी दूर अकेले भेज रहा है?”
मनोज मुस्कराया।
“माँ, अब मेरी बहन अकेली नहीं है। उसकी रक्षा सिर्फ मैं नहीं करूँगा। उसका आत्मविश्वास करेगा। और जिस दिन लड़की अपने सपनों की रक्षा खुद करना सीख जाती है, उस दिन दुनिया की कोई दूरी उसे रोक नहीं सकती।”
बस चलने लगी।
खिड़की के पास बैठी सुजाता ने हाथ बाहर निकाला। उसकी कलाई पर वही राखी बंधी थी। हवा के झोंके से उसका धागा धीरे-धीरे लहरा रहा था।
उसने राखी को देखा। उस पर छोटे-से अक्षरों में लिखा था—
“सपनों की रक्षा सबसे बड़ी रक्षा होती है।”
सुजाता मुस्कराई।
बस गाँव की सीमा पार कर रही थी। पीछे छूटते खेत, पीपल का पेड़ और मिट्टी का वह घर धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो रहे थे। लेकिन उसके भीतर कुछ नया जन्म ले रहा था—एक विश्वास, एक संकल्प और एक ऐसी उड़ान, जिसकी डोर अब किसी दूसरे के हाथ में नहीं थी।
वह समझ चुकी थी कि रिश्तों की असली ताकत दूरी में नहीं, संवेदना में होती है। राखी का धागा कलाई पर बंधकर केवल रक्षा का वचन नहीं देता; वह उन सपनों को भी जोड़ता है, जिन्हें प्रेम, विश्वास और साथ की जरूरत होती है।
और उस दिन एक भाई ने अपनी बहन की कलाई पर बंधे धागे का अर्थ फिर से समझा था—रक्षा केवल शरीर की नहीं, सपनों की भी करनी होती है।
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