मामला चकबंदी कार्यवाही के दौरान ग्राम सभा की बताई जा रही भूमि के निजी संस्थाओं के पक्ष में आवंटन से जुड़ा है। याचिका में 13 मई 2026 के आदेश के साथ 13 जून 1987 को असिस्टेंट कंसोलिडेशन ऑफिसर, कैंप इटहरा, तहसील ज्ञानपुर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जय राज सिंह तोमर, कविता तोमर और पारुल तोमर ने पक्ष रखा।
पुराने विवाद को आधार बनाने पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से यूपी कंसोलिडेशन ऑफ होल्डिंग्स एक्ट की धारा 48(3) के तहत भूमि आवंटन को चुनौती दी गई। याचिका में दावा किया गया कि वर्तमान विवादित भूखंड अभिलेखों में ग्राम सभा की भूमि के रूप में दर्ज हैं। वहीं पुराने विवाद में शामिल भूखंड अलग होने के बावजूद उसे आधार बनाकर आवेदन खारिज किए जाने पर भी सवाल उठाए गए।
विवादित भूमि में पुराने प्लॉट संख्या 347एम, 360, 343एम, 344/1एम और 362एम का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों पर निजी संस्थाओं के पक्ष में भूमि आवंटन के संबंध में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आरोप लगाते हुए अभिलेखों और पूर्व आदेशों की वैधानिकता की जांच की मांग की है।
अभी अंतिम फैसला नहीं, जवाब के बाद होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने फिलहाल मामले में किसी भूमि आवंटन को अवैध घोषित नहीं किया है और न ही उसे निरस्त करने का अंतिम आदेश दिया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को विचार योग्य मानते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। प्रतिवादियों को छह सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल करना होगा, जिसके बाद याचिकाकर्ता को दो सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर मिलेगा।
मामले की अगली सुनवाई में संबंधित भूमि के राजस्व एवं चकबंदी अभिलेख, पूर्व में पारित आदेश तथा आवंटन की वैधानिकता से जुड़े बिंदुओं पर सुनवाई होगी। इस स्तर पर किसी व्यक्ति को भू-माफिया या दोषी ठहराया जाना अदालत के अंतिम निर्णय के बिना उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट के अंतिम आदेश के बाद ही भूमि आवंटन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
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