रायबरेली से साहित्यकार डॉ० किरन शुक्ल ने कहा– ‘फ़ादर कामिल बुल्के ने सभी मंचोँ से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की आवाज़ बलन्द की थी। वे ईसाई-पुरोहित अवश्य थे; लेकिन उनका समूचा जीवन हिन्दीभाषा के लिए समर्पित रहा।
मुंगेर विश्वविद्यालय, बिहार से संस्कृत-विभाग मे सहायक आचार्य डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय ने बताया– वे पाश्चात्य विचारोँ को छोड़े बिना भारतीय संस्कृति और समाज के मूल्यपरक विचारोँ को भी अनुभूति के स्तर तक ले जाने का प्रयत्न करते रहे। उनके चरित्र का रूप उन्हेँ अन्य विद्वानो से पृथक् करता है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– इलाहाबाद के तत्कालीन कुलपति पं० अमरनाथ झा ने बुल्के के हिन्दी-अनुराग को लेकर उनकी हठधर्मिता के सम्मुख झुकते हुए, शोध-सम्बन्धित नियमावली मे वांछित संशोधन कराते हुए, कामिल बुल्के को हिन्दी-माध्यम मे शोध करने की अनुमति दे दी थी, परिणामस्वरूप देश के समस्त विश्वविद्यालयोँ मे ‘हिन्दी-माध्यम’ मे शोध करने का मार्ग प्रशस्त हो गया था। फ़ादर बुल्के ने ‘राम’ पर शोध करते समय रामायण के तीन सौ रूपोँ की खोज की थी। इस प्रकार हिन्दीशोध के इतिहास मे पहली बार ‘राम’ पर विधिवत् शोधकर्म करने का श्रेय फादर कामिल बुल्के को जाता है।
चौधरी महादेवप्रसाद महाविद्यालय, प्रयागराज मे हिन्दी-विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ० सरोज सिंह ने कहा– वे तुलसीदास की भक्ति, साधना, लोकमंगल तथा समन्वयवादी दृष्टिकोण से प्रभावित थे, इसीलिए उन्होँने ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ विषय पर शोध किया था, जिसे भारतविद्या (इण्डोलॉजी) की प्रमुख रचना माना गया है।
आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज मे हिन्दी की सहायक प्राध्यापक डॉ० मुदिता तिवारी ने कहा– बेल्जियम के रेम्सचैपल मे जन्मे और भारत को अपनी कर्मभूमि बनानेवाले संन्यासी फादर कामिल बुल्के ने रामकथा के अन्तरराष्ट्रीय प्रभाव और बेहतर मनुष्य बनने मे इसकी भूमिका को स्वीकार किया। उन्होँने राँची के सेण्ट जेवियर्स कॉलेज मे संस्कृत और हिन्दीविभाग के अध्यक्ष रहते हुए अँगरेजी-हिन्दीकोश के शब्द-संकलन और सम्पादन मे भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहण किया था।
सेवाभारती, दिल्ली मे शिक्षक रसराज डॉ० अवनेन्द्र पाण्डेय ने कहा– डाॅ० फादर कामिल बुल्के ने इलाहाबाद मे अपने प्रवास-काल को ‘दूसरा वसंत’ कहा था। वे तत्कालीन हिन्दीभाषा के विद्वानो से परिचित थे, जिनमे धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्ता, रामस्वरूप चतुर्वेदी, रघुवंश, महादेवी वर्मा तथा अन्य लोग थे। बुल्के डाॅ० धीरेन्द्र वर्मा को अपना प्रेरणास्रोत और महादेवी वर्मा को बड़ी बहन मानते थे।
हिन्दी-संग्रहालय, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के संग्रहालय-प्रभारी दुर्गानन्द शर्मा ने बताया, “उन्होँने तुलसी के संदर्भ मे न केवल हिन्दी मे लिखा, वरन् अँगरेज़ी, फ्लेमिश और फ्रेंच भाषाओँ मे भी लिखा। श्री रामचरितमानस की जिन चौपाइयोँ ने डॉ० बुल्के को हिन्दी पढ़ने की प्रेरणा दी, उन्हीँ चौपाइयोँ के रचयिता तुलसीदास का अनुसरण और गुणगान वे आजीवन करते रहे।
विद्यार्थी इण्टर कॉलेज, कुशीनगर मे हिन्दी की सहायक अध्यापक वृन्दा पाण्डेय ने कहा– फादर कामिल बुल्के के रामकथा-विषयक शोधकर्म की कोई तुलना नहीँ है; क्योँकि रामकथा पर जितने भी शोध हुए हैँ, उनमे कामिल बुल्के का शोधकर्म शीर्ष पर दिखता है।
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