बेंगलोर
प्रोटेस्ट पर दिखे जिन जेन जी की सोच, उनकी हरकत और उतावलेपन को लोग सराह रहै है वो भीतर से कितने कमज़ोर, अधिर और आत्मविश्वास की कमी वाले है ये किसीने सोचा है? पेपर लीक जैसे मुद्दे को लेकर, माँ-बाप द्वारा किसी चीज़ के लिए ना बोलने पर या कोई भी छोटी-मोटी बात पर सुसाइड कर लेते है ये ज़िन्दगी के संघर्ष को क्या ख़ाक़ झेल पाएंगे? जब तक साँस है तब तक संघर्ष भी है इतनी सी बात बच्चों को समझनी चाहिए। क्यों इतने डरपोक, कमज़ोर और ज़रा सी भी मुश्किल आई नहीं कि घबरा जाते है? यही बच्चें देश का भविष्य है कैसे हर क्षेत्र में अपने आपको स्थापित कर पाएंगे? हर क्षेत्र में प्रतियोगिता और आगे निकलने की दौड़ से सामना करना पड़ेगा इसलिए घबराहट नहीं हिम्मत को अपना साथी बनाना होगा।
आजकल कई माता-पिता बच्चों को हर मुश्किल से बचाकर रखते हैं। इससे बच्चे जीवन की छोटी-मोटी असफलताओं, जैसे पेपर लीक होना, कम नंबर आना या किसी प्रतियोगिता में मिली हार को बर्दाश्त नहीं कर पाते। या तो डिजिटल युग में बच्चों को हर चीज़ तुरंत एक क्लिक पर पाने की आदत हो गई है। जब असल जिंदगी में उन्हें किसी चीज़ के लिए इंतजार करना पड़ता है या संघर्ष करना पड़ता है, तो वे जल्दी धैर्य खो देते हैं। बच्चों को सिखाया जाता है कि जीतना ही सब कुछ है और जीतकर ही आना है। वे असफलता को जीवन का एक हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का अंत मान बैठते हैं। जीवन से बड़ी कोई चीज़ नहीं और ज़िन्दगी में नामुमकिन कुछ भी नहीं ये बात हर अभिभावकों को अपने बच्चों को समझानी चाहिए, साथ ही बच्चों को ये समझाने की ज़रूरत है कि, जद्दोजहद और असंभावनाओं का नाम ही तो ज़िन्दगी है उससे भागना नहीं सामना करना चाहिए। कदम-कदम पर दिवार ही मिलेगी तो क्या हारकर बैठ जाओगे? अरे हिम्मत और हौसलो की कुल्हाड़ी से हर दिवार गिराने का जोश होना चाहिए। दुनिया में कितने सारे बच्चें है जो कम सुख-सुविधाओं के बीच भी अपने दम पर आगे बढ़ते है। मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों, आपका हौसला उनसे बड़ा होना चाहिए। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने मूल्यों, सकारात्मक सोच और उद्देश्य के साथ खुलकर जीना सिखाएं अपने बच्चों को। हारना जिंदगी का एक हिस्सा है अंत नहीं।
जिन बच्चों ने हारे बिना नीट की रिएग्जाम दी आगे जाकर वो अपनी मंज़िल बड़ी आसानी से पा सकते है। क्या एक पेपर लीक होने से ज़िन्दगी समाप्त हो जाती है? पेपर लीक मामले पर genuine students लड़े भी और जीत भी हासिल की। जिन बच्चों ने हारकर खुदकुशी कर ली वो धैर्य से काम लेते तो आज वो भी इस धरती पर सीना तानकर साँस ले रहे होते। हाँ माना कि छात्रों और अभिभावकों के लिए ये सारी चीज़ें मुश्किल होती है वापस वही सारी तैयारी करना, फीस की व्यवस्था करना लेकिन क्या ये सारी चीज़ें अपने बच्चे के जीवन से ज़्यादा महत्व रखती है? शून्य में से सर्जन कर सकते है न? खुदकुशी किसी भी समस्या का समाधान नहीं। तुम तो पल भर में समस्या से भागकर ज़िन्दगी ख़त्म कर लेते हो लेकिन पीछे अपने माँ-बाप को पल-पल मरने के लिए छोड़ जाते हो।
क्यों बच्चें जल्दी ज़िन्दगी की जंग हार जाते है? सबसे पहले माँ-बाप को अपने बच्चों के साथ एक भावपूर्ण खुल्ला और आत्मीय रिश्ता होना चाहिए। बच्चों की मानसिक कमज़ोरी के बहुत से कारण हो सकते है जैसे कई बार बच्चे अपने दिल की बात या डर जैसे फेल होने का डर या किसी गलती का अहसास अपने माता-पिता से साझा नहीं कर पाते। उन्हें डर होता है कि उन्हें डांट पड़ेगी या समझा नहीं जाएगा उसी गड़मथल में गलत कदम उठा लेते है। या फिर अपने दोस्तों की ‘परफेक्ट’ जिन्दगी देखकर बच्चे अपनी वास्तविक जिंदगी से निराश हो जाते है।
अभिभावकों से निवेदन है कि अपने बच्चे की भावनाओं को समझें। जब बच्चे उदास या डरे हुए लगें, तो उन्हें बताएं कि आप उनकी उदासी या डर को समझ रहे हैं हर परिस्थिति में उनके साथ है। पेपर लीक हुआ कोई बात नहीं हार मत मानो उठो, फिर से तैयारी करो, आगे बढ़ो हम मिलकर इस परिस्थिति का सामना करेंगे। साथ ही उन्हें आश्वस्त करें कि आप समझ सकते हैं कि वे क्यों उदास या डरे हुए महसूस कर रहे हैं बच्चों में अपने प्रति विश्वास कायम करें। समस्याओं को खुद तक सीमित रखने से बच्चों के दिमाग में मानसिक तनाव बढ़ता है जो उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेलता है और यही अवसाद आत्महत्याका कारण बनता है। बच्चों को समझाए कि जिंदगी से लड़ना ही असली जीना है। हर मुश्किल एक नया सबक देती है, इसलिए हार मानने के बजाय डटकर उसका सामना करना सीखें, हारना या असफल होना जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने का एक हिस्सा है।
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