ग्रामीणों का कहना है कि यदि वन विभाग नियमित गश्त और निगरानी करता, तो इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों का कटान संभव नहीं था। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पूरे मामले में विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
घटना के बाद ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि लगातार हो रहे हरे पेड़ों के कटान से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है और यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो वन माफियाओं के हौसले और बढ़ेंगे। ग्रामीणों ने मांग की है कि अवैध कटान में शामिल लोगों के साथ-साथ यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो उसके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई की जाए।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत व्यापक स्तर पर पौधरोपण और हरियाली बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे समय में प्रतिबंधित हरे पेड़ों के कथित अवैध कटान की घटना प्रशासन और वन विभाग के लिए गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है।
फिलहाल वन विभाग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कटान किन परिस्थितियों में हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। अब पूरे जिले की निगाहें प्रशासनिक जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।
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