नवरात्रि, प्रसाद और पालन-पोषण: आस्था में विवेक का महत्व

नवरात्रि, प्रसाद और पालन-पोषण: आस्था में विवेक का महत्व” (नवरात्रियों का संदेश यही है कि आस्था, संयम और विवेक को एक साथ अपनाया जाए।) नवरात्रि में हलवा-पूरी जैसे पारंपरिक प्रसाद का महत्व है, लेकिन यह केवल इंसानों के लिए ही सुरक्षित है। गाय का पाचन तंत्र इंसानों से भिन्न होता है, इसलिए घी, चीनी और मैदे से बनी चीज़ें उन्हें हानिकारक हो सकती हैं। इस दौरान गायों को केवल हरी घास, भूसा, फल और चारा देना चाहिए। श्रद्धा और सुरक्षा एक साथ चल सकती है। नवरात्रि का उद्देश्य केवल भक्ति…

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रिश्ते में आ गई हैं दूरियां, कहां बिगड़ रही बात, कैसे होगा सुधार?

आज के तेज-रफ्तार दौर में, ज्यादातर लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उनके रिश्ते क्यों और कहां बिगड़ रहे हैं। रिश्ते में आई दरार के लिए लोग आमतौर पर छोटी-छोटी बातों, बिजी दिनचर्या और हालातों को दोष देते नजर आते हैं, लेकिन समस्या इससे कहीं ज्यादा गहराई में छिपी है। हर दिन जब हम अपने पार्टनर को समय नहीं दे पाते, जाने-अनजाने में उनकी बेइज्जती कर देते हैं और उनके रूठ जाने पर उनसे बात करने की बजाय उन्हें अकेला छोड़ देते हैं। इन सबका नतीजा…

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रसोई से संपादक तक : ‘आयरन लेडी’ संतोष वशिष्ठ की अमर गाथा

(सरलता और संघर्ष की आयरन लेडी, जहाँ माँ का स्नेह, समाज की चेतना और स्त्री-संकल्प की प्रतिमूर्ति साथ-साथ चलती रही।) संतोष वशिष्ठ जी का जीवन संघर्ष और सरलता की अनोखी मिसाल है। उन्होंने रसोई से अपनी यात्रा शुरू की और दैनिक चेतना की संपादक बनकर समाज को दिशा दी। मृदुभाषी, सौम्य और आत्मीय, फिर भी सिद्धांतों पर अडिग—यही उनकी असली पहचान थी। वशिष्ठ सदन को उन्होंने राजनीति और समाज का केंद्र बनाया और चेतना परिवार को माँ की तरह सँभाला। वे सचमुच हरियाणा की ‘आयरन लेडी’ थीं, जिनकी स्मृतियाँ और…

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पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण : भारत की बौद्धिक अस्मिता का संकल्प

“डिजिटलीकरण से सुरक्षित होगी धरोहर, रुकेगी बौद्धिक चोरी, और खुलेगा राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मार्ग” भारत की प्राचीन पांडुलिपियाँ केवल कागज़ पर लिखे शब्द नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा हैं। इनमें विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और कला का अनमोल खजाना है। उपेक्षा और उपनिवेशकाल की लूट ने इन्हें खतरे में डाल दिया। प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान कि पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण “बौद्धिक चोरी” को रोकेगा, समयानुकूल है। डिजिटलीकरण से संरक्षण, शोध और वैश्विक स्तर पर भारत की बौद्धिक अस्मिता सुनिश्चित होगी। यह केवल सांस्कृतिक परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अभियान है।…

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जनरेशन-जी से लेकर जनरेशन अल्फा तक : बदलती दुनिया, बदलते बच्चे

समय के साथ बदलती पीढ़ियाँ और उनका समाज पर असर” समय और समाज के बदलते माहौल के साथ हर पीढ़ी की सोच, जीवनशैली और चुनौतियाँ बदलती हैं। ग्रेटेस्ट जनरेशन और साइलेंट जनरेशन ने युद्ध और कठिनाई का सामना किया। बेबी बूमर्स ने औद्योगिकीकरण देखा, जेन-एक्स ने तकनीकी शुरुआत अनुभव की, और मिलेनियल्स ने इंटरनेट और वैश्वीकरण के साथ युवा जीवन जिया। जेन-ज़ी डिजिटल नेटिव हैं, आत्मनिर्भर और तेज़ सोच वाले, जबकि जेन अल्फा पूरी तरह डिजिटल माहौल में पले-बढ़ रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जुड़ाव और रोजगार की अनिश्चितता इनकी…

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पानी से नहीं, नीतियों से हारी ज़िंदगी

बार-बार दोहराई गई त्रासदी, बाढ़ प्रबंधन क्यों है अधूरा सपना? हरियाणा और उत्तर भारत के कई राज्य बार-बार बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं, लेकिन हर बार नुकसान झेलने के बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल नज़र नहीं आती। 2023 की बाढ़ के बाद भी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नदियों की सफाई, नालों की निकासी और जल प्रबंधन की योजनाएं अधूरी पड़ी रहीं। नतीजा यह कि 2025 में एक बार फिर लाखों किसान अपनी मेहनत की फसल डूबते देख मजबूर हुए। सवाल यह है कि जब बाढ़…

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सुनो नहरों की पुकार : जनजागरण अभियान

आस्था का सच्चा स्वरूप यही है कि हम प्रकृति का सम्मान करें, नहरों को निर्मल रखें और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल का उपहार दें।” “सुनो नहरों की पुकार” मिशन हमें यह सिखाता है कि असली पूजा नदियों और नहरों को स्वच्छ रखना है। पूजा सामग्री बहाना एक परंपरा नहीं, बल्कि एक भूल है। प्लास्टिक, कपड़े, मूर्तियाँ और कचरा नहरों को विषैला बना रहे हैं। इससे न केवल जल प्रदूषित होता है, बल्कि कृषि, पशु और मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ता है। यह मिशन आस्था और पर्यावरण…

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मनीषा हत्याकांड : हरियाणा की कानून-व्यवस्था पर सवाल

पुलिस की लापरवाही और समाज की बेपरवाही ने छीनी एक और बेटी की जान “मनीषा की हत्या ने हरियाणा की पुलिस और शासन व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। प्राथमिकी दर्ज करने में देरी, चित्रण देर से लेना और परिजनों की गुहार को नज़रअंदाज़ करना – ये सब पुलिस की लापरवाही के प्रमाण हैं। परिवार का शव न लेने का फैसला एक प्रतीक है कि अब जनता केवल आश्वासन से संतुष्ट नहीं होगी। सरकार को यह समझना होगा कि महज़ तबादले और निलंबन से हालात नहीं सुधरेंगे। जब…

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कार्यस्थल पर मर्यादा ही असली शिक्षा

सुरक्षित कैंपस, सम्मानजनक कार्यस्थल शिक्षण संस्थान ज्ञान देने के साथ-साथ आदर्श आचरण के केंद्र भी होते हैं। लेकिन जब यहां कार्यरत महिला शिक्षिकाएं असुरक्षा, अशोभनीय व्यवहार और अनुचित दबाव का सामना करती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरे माहौल की गरिमा को चोट पहुंचाता है। महिला सुरक्षा के लिए केवल कानून होना पर्याप्त नहीं, बल्कि संस्थानों में सख़्त नियम और रोकथाम के उपाय जरूरी हैं। महिला स्टाफ रूम और शौचालय अलग हों, परिसर में हर जगह सक्रिय कैमरे लगें, खाली पीरियड में महिला और पुरुष शिक्षक अपने-अपने स्टाफ…

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साझेदारी और बराबरी से ही टिकेगा आधुनिक विवाह

पति की जानबूझकर घरेलू कामों में अयोग्यता : बदलते रिश्तों का संकट “साझेदारी और बराबरी से ही टिकेगा आधुनिक विवाह” विवाह केवल साथ रहने का नाम नहीं, बराबरी की साझेदारी है। घरेलू काम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी नौकरी या व्यवसाय। जानबूझकर अयोग्यता दिखाना रिश्तों को खोखला कर देता है। बराबरी से जिम्मेदारी बाँटना ही खुशहाल परिवार की नींव है। आधुनिक विवाह तभी टिकाऊ होगा जब साझेदारी और सम्मान दोनों हों।  डॉ. प्रियंका सौरभ आधुनिक जीवनशैली ने जहाँ रिश्तों में नए अवसर खोले हैं, वहीं कई नई चुनौतियाँ भी…

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