निज भाषा का चाँद: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय स्तंभकार हर साल 9 सितंबर आते ही हिंदी साहित्य अपने पितामह के दरवाजे पर सिर झुकाता है। काशी की एक तंग गली, एक हवेली और उस हवेली में जन्मा एक बालक — जिसने कुल 34 साल और 4 महीने के जीवन में वह कर दिखाया, जिसे करने में सदियों लग जाती हैं। वह बालक था हरिश्चंद्र, जिसे दुनिया ने बाद में ‘भारतेन्दु’ कहा, यानी भारत का चंद्रमा। 1850 का भारत, गुलामी का अंधेरा, अंग्रेजी हुकूमत की धाक, और ऐसे में एक किशोर का यह संकल्प लेना कि…

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पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक चिंतन का सशक्त स्वर

डॉ. सत्यवान सौरभ डॉ. सत्यवान सौरभ समकालीन हिंदी पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में सक्रिय एक स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार, कवि, साहित्यकार एवं सामाजिक विचारक हैं। विगत दो दशकों से वे साहित्य, पत्रकारिता और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन एवं वैचारिक हस्तक्षेप करते रहे हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक संवेदना, समकालीन यथार्थ, तार्किक दृष्टि और वैचारिक गहराई का संतुलित समावेश दिखाई देता है। राजनीति विज्ञान में पीएच.डी. प्राप्त डॉ. सौरभ का शोध समकालीन भारतीय राजनीति और संगठनात्मक विमर्श से जुड़ा है। उनके शोध का विषय “Rashtriya Swayamsevak…

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उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा

डॉ भगवान प्रसाद उपाध्याय उन अनुबंधों को सहेज कर क्या होगा जिनको बांध नहीं पाया विरही मन उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा जो दुर्दिन में भी सदा बने रहे अनबन सुख में साथ दिया सबने जैसे परछाई दुख में उनको मेरी कुछ याद न आई बहुत पुकारा उनको मैंने प्रति दिन कष्ट भरी पाती भी भेजी मैंने अनगिन उत्तर की बाट जोहता जाने कब आएगा मन में शंका के बादल मंडराते रहते जो होगा अच्छा अथवा और बुरा होगा उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा मैंने दिन…

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रुचि परीक्षा: भूली बिसरी सीख

बिमला कुमारी गुप्ता पूर्व प्रधानाचार्या, केंद्रीय विद्यालय, (हैदराबाद) भारत की सनातन जीवन शैली में बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ छिपी थी। ऐसी ही एक अत्यंत सुंदर परंपरा थी — रुचि परीक्षा। जब बच्चा लगभग एक वर्ष का होता था, तब उसके सामने एक कपड़े पर पुस्तक, शस्त्र, स्वर्ण, मिट्टी का ढेला और माला जैसी वस्तुएं रख दी जाती थीं। निश्छल बालक जिस वस्तु की ओर स्वतः आकर्षित होता, परिवार के बुजुर्ग उसी से उसकी प्राकृतिक रुचि और भावी जीवन की दिशा का अनुमान लगाते थे। यह कोई अंधविश्वास नहीं था,…

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आज़ादी का दूसरा पिंजरा

लेखिका सलोनी विपुल कुमार ठाकर पालनपुर गुजरात एक सवाल है, जो शायद किसी ने पूछा नहीं। स्त्री ने घर से बाहर कदम रखा, नौकरी पाई, अपने फैसले खुद लेने शुरू किए फिर भी वह आज़ाद क्यों नहीं हुई? जवाब कहीं गहराई में छिपा है, ऐसी जगह जहाँ हम देखना नहीं चाहते। सदियों तक स्त्री से कहा गया है कि चुप रहो, सहन करो, त्याग करो, यही तुम्हारा धर्म है। वह मानती गई, क्योंकि इनकार करने की भाषा उसे सिखाई ही नहीं गई थी। फिर वक्त बदला। अब कहा जाने लगा…

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धर्मवीर भारती को ‘इलाहाबाद’ ने ही बनाया था, ‘गुनाहों का देवता’ ● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इलाहाबाद मे तंग गली-दर-गली मे साँस लेनेवाला मुहल्ला (‘मोहल्ला’ अशुद्ध है।) ‘अतरसुइया’ का जितना पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व है उतना ही साहित्यिक भी। चूँकि आज (४ सितम्बर) एक ऐसे हस्ताक्षर का निधन-दिनांक है, जो साहित्य और पत्रकारिता मे वह सब अर्जित कर चुका था, जो उसकी आकांक्षा रही; अन्तत:, वह अतरसुइया की एक गली मे किरायेदार के रूप मे रहते-रहते, जाने-अनजाने (‘अंजाने’ अशुद्ध है।) एक ऐसा गुनाह कर बैठा, जिसका उसे भान तक नहीँ था और जब भान हुआ तब एक काल्पनिक मन्दिर बनाकर उसमे ‘गुनाहों का देवता’ की मूर्ति…

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नारी शक्ति नहीं, नारी समानता की जरूरत

महेन्द्र तिवारी महिला समानता दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उस लंबे संघर्ष का प्रतीक है जिसने यह सिद्ध किया कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी महिलाओं की स्थिति से मापी जाती है। जब किसी बेटी को शिक्षा का अधिकार मिलता है, किसी महिला को समान काम के लिए समान वेतन मिलता है, किसी माँ को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिलता है और किसी युवती को अपने सपनों का चुनाव करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है, तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थों में जीवंत…

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अपनों की आड़ में

जब अपनों की आड़ में, मिले सदा संताप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप। बेहतर है चुपचाप, जहाँ सम्मान न मिलता, मीठे बोलों के पीछे, मन हर रोज़ है छलता। रिश्तों का क्या मोल वहाँ, जहाँ न कोई आप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप। हँसते चेहरे देख लिए, भीतर कितने घाव, अपने बनकर दे गए, अपनों जैसे दाँव। अपनों जैसे दाँव, हृदय को रोज़ जलाएँ, साथ खड़े दिखते मगर, पीठ पीछे मुस्काएँ। कैसा फिर अपनापन है, कैसा उनका ताप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप। जिस रिश्ते में प्रेम…

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भारत-अमेरिका दोस्ती की गर्माहट, एच-1बी का झटका

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत और अमेरिका के संबंधों की वर्तमान तस्वीर बेहद दिलचस्प और कई स्तरों पर विरोधाभासी दिखाई दे रही है।एक ओर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक,आर्थिक,रक्षा,तकनीकी और कूटनीतिक साझेदारी लगातार गहरी होती दिखाई दे रही है,वहीं दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियां भारतीय पेशेवरों के लिए नई चिंताएं पैदा कर रही हैं।हालिया घटनाक्रम में अमेरिका के भारत में राजदूत और राष्ट्रपति ट्रंप के दक्षिण एवं मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर का श्रीनगर दौरा विशेष रूप से…

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सरकारी स्कूल सोशल मीडिया के लिए मंच नहीं हैं।

डॉ. सत्यवान सौरभ आजकल सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का नज़रिया एक चलन बनता जा रहा है, और यह अच्छा नहीं है। फ़ोन, कैमरा और कैमरा-युक्त स्मार्टफोन होते ही लगभग कोई भी सरकारी स्कूल में जाकर शिक्षकों से सवाल पूछ सकता है, कक्षाओं की तस्वीरें खींच सकता है और कुछ ही मिनटों में पूरी शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी राय बना सकता है। कभी-कभी, यह इरादा नेक होता है। नागरिकों को शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक संस्थानों के कामकाज और बच्चों के भविष्य के बारे में चिंतित होने का पूरा…

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