फूहड़ शब्दों का ग्लैमर और वर्चुअल समाज की विडंबना

फूहड़ शब्दों का ग्लैमर और वर्चुअल समाज की विडंबना सोशल मीडिया पर अब केवल तस्वीरें या वीडियो नहीं, शब्द भी बिकने लगे हैं। फूहड़ता और अपशब्दों ने अभिव्यक्ति की मर्यादा को पीछे छोड़ दिया है। लाइक, कमेंट और शेयर की भूख ने भाषा को बाजार में बदल दिया है। समाज का वही वर्ग जो संस्कारों की बातें करता है, वही इन पोस्टों पर तालियाँ बजाता है। यह प्रवृत्ति केवल भाषा का पतन नहीं, सोच की गिरावट भी है। सभ्यता की पहली पहचान भाषा होती है—जब भाषा गिरती है, तो समाज…

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माँ और प्रकृति

माँ हर सुबह निकलती है, आसमान के रंग संग। एक बोझा लकड़ी का सपना, एक विश्वास — जीवन का ढंग। पगडंडियाँ पहचानती हैं उसके पाँव, झरनों की भाषा समझती है। वो जंगल से माँगती नहीं कुछ, बस सूखी टहनी चुनती है। पहाड़ लाँघती है सहज भाव से, मानो धरती उसकी सहेली हो। थकान नहीं, करुणा चलती, उसके कदमों की रेली हो। मैं पूछता हूँ — “माँ, क्यों इतना श्रम?” वो मुस्कुराती, कहती नम्र स्वर में — “जंगल छानती हूँ, सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए। कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा…

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जब चाँद हासिल हो जाता है…

जब तक चाँद आसमान में था, वह सपना था — हर रात के सन्नाटे में आशा की एक उजली बूँद-सा टपकता था। उसकी ओर देख मन में एक मीठी अधूरी चाह उठती थी — कि बस एक बार उसे छू लूँ, अपने हिस्से की रौशनी पा लूँ। पर जब चाँद पास आया, जब उसकी ठंडक हथेलियों पर उतरी — तो लगा, वह भी साधारण है, थोड़ा रुखा, थोड़ा अधूरा। अब उसकी चमक में वो मोह नहीं, वो आकर्षण नहीं, जिसकी खातिर रातें जागी थीं। हर खूबसूरती, जब मिल जाती है,…

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शिक्षक नौकरी छोड़ रहे हैं – एक कड़वा सच

– क्योंकि शिक्षक को शिक्षण कार्य नहीं करवा कर एक बहुद्देशीय कर्मचारी बना दिया गया है। जब शिक्षक को शिक्षण कार्य छोड़कर काग़ज़ों, रिपोर्टों और आयोजनों का भार दे दिया जाता है, तो शिक्षा अपनी आत्मा खो देती है। – डॉ. प्रियंका सौरभ देश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ सबसे बुनियादी स्तंभ — शिक्षक — स्वयं डगमगाने लगा है। कभी यह पेशा समाज में सम्मान, स्थिरता और प्रेरणा का प्रतीक था, पर आज वही शिक्षक काग़ज़ी औपचारिकताओं, तकनीकी दबाव और प्रशासनिक आदेशों के बीच…

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ऑस्ट्रेलिया को हराकर वर्ल्ड कप 2025 के फ़ाइनल में पहुँची भारतीय महिला टीम!

मेहनत, संघर्ष और नारी शक्ति का स्वर्णिम संगम। भारत की बेटियों ने इतिहास रच दिया! महिला क्रिकेट विश्वकप 2025 के सेमीफाइनल में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। यह जीत केवल खेल की नहीं, बल्कि नारी शक्ति, संघर्ष और आत्मविश्वास की प्रतीक है। स्मृति मंधाना, हरमनप्रीत कौर और दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन ने दिखा दिया कि भारतीय महिलाएँ अब विश्व क्रिकेट की नई पहचान हैं। यह जीत हर उस बेटी के सपने का प्रमाण है जो सीमित साधनों में भी ऊँचा उड़ने का हौसला…

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फिक्र से पहचान

ज़िक्र करने वाले तो हज़ार मिल जाएँ, मगर फिक्र करने वाले कहाँ नज़र आएँ। जो हाल पूछे बिना समझ ले दिल की बात, वो ही अपना है, बाकी सब परछाईं जाएँ। बोलों से नहीं, एहसास से जो जुड़ते हैं, मौन में भी जो साथ खड़े दिखते हैं। वक़्त की आँधी में भी जो ना डगमगाएँ, वो रिश्ते ही सच्चे, बाकी सब मिट जाएँ। ज़िक्र तो दुनिया रोज़ करती रहेगी, फिक्र वही करेगा जो सच में स्नेही। अपनों की पहचान यही तो निशानी है, फिक्र में बसी हर सच्ची कहानी है।…

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छठ महापर्व 25-28 अक्टूबर 2025- आस्था,श्रद्धा और आत्मसंयम का अलौकिक उत्सव

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर छठ पर्व भारत की उन प्राचीनतम और शुद्धतम परंपराओं में से एक है,जोआस्था श्रद्धा और आत्मसंयम की पराकाष्ठा को दर्शाती है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जीवन की पवित्रता, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारिवारिक सुख-समृद्धि का अद्भुत संगम है। छठ महापर्व को सूर्य उपासना का सबसे पवित्र पर्व माना गया है। हिंदू धर्म में सूर्य देवता को जीवनदाता, स्वास्थ्य और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। छठ पूजा में सूर्य भगवान और उनकी पत्नी उषा…

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बच्चों से भीख मंगवाना एक सामाजिक अपराध

“मासूम बच्चों का शोषण सिर्फ गरीबी का परिणाम नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की बड़ी विफलता है।” मासूम बच्चों का शोषण समाज की गंभीर समस्या बन चुका है। भीख मंगवाना केवल गरीबी का नतीजा नहीं, बल्कि बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाने वाला व्यवस्थित व्यवसाय है। लोग दया के भाव में पैसा देते हैं, जबकि बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रभावित होते हैं। समाज, सरकार और नागरिकों को मिलकर जागरूकता फैलानी चाहिए, चाइल्डलाइन (1098) और एनजीओ के माध्यम से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, और उन्हें शिक्षा व…

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गाँव पेटवाड़ से चीफ जस्टिस तक : जस्टिस सूर्यकांत की प्रेरक यात्रा

मेरे साहित्यिक गुरु पंडित मदन गोपाल जी अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे सैकड़ों पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वे पत्र जिनमें केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का ज्ञान, संवेदना और आत्मा की आवाज़ बसी हुई थी। हर सप्ताह वे मुझे प्रेमपूर्वक पत्र लिखते, साहित्य की बारीकियाँ सिखाते और जीवन में ईमानदारी व कर्म की महत्ता समझाते थे। उनके प्रत्येक पत्र में चरित्र की गहराई, भाषा की सादगी और विचार की ऊँचाई होती थी। आज जब उनके छोटे पुत्र सूर्यकांत जी देश के 53वें…

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भारत वर्ष का हर्ष

तुम नमक नहीं, चंदन हो, वीर, हर चौके, छक्के में दिखा दिया धीर। देशभर में फैल गया अद्भुत हर्ष, सदा चमकते रहो हमारे भारत वर्ष। साहस तुम्हारा निखरा यूँ हर पल, चुनौती भी थमी, सूरज गया ढल। दर्शकों के दिलों में बसा भारत वर्ष, गूँजा गगन में तब भारत का हर्ष। खिलाड़ी नहीं केवल, प्रेरणा हो तुम, विश्व ने देखा विजय का तिलक हो तुम। हर रन और कैच में बरसा हर्ष, सारे दिलों में गूँजा अद्भुत भारत वर्ष। नमन है तुम्हें, आज रणवीरों की तरह, विकट परिस्थितियों में शूरवीरों…

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