रुचि परीक्षा: भूली बिसरी सीख

बिमला कुमारी गुप्ता
पूर्व प्रधानाचार्या, केंद्रीय विद्यालय, (हैदराबाद)

भारत की सनातन जीवन शैली में बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ छिपी थी। ऐसी ही एक अत्यंत सुंदर परंपरा थी — रुचि परीक्षा।

जब बच्चा लगभग एक वर्ष का होता था, तब उसके सामने एक कपड़े पर पुस्तक, शस्त्र, स्वर्ण, मिट्टी का ढेला और माला जैसी वस्तुएं रख दी जाती थीं। निश्छल बालक जिस वस्तु की ओर स्वतः आकर्षित होता, परिवार के बुजुर्ग उसी से उसकी प्राकृतिक रुचि और भावी जीवन की दिशा का अनुमान लगाते थे। यह कोई अंधविश्वास नहीं था, बल्कि निर्दोष बाल-मन की मौलिक इच्छा को पहचानने का एक सहज माध्यम था। एक वर्ष का बालक दिखावे और सामाजिक दबाव से परे होता है, इसलिए उसका चुनाव ही उसकी मूल प्रवृत्ति का सच्चा दर्पण होता था।

दुर्भाग्यवश, आज हमने इस सुंदर व्यवस्था को पूरी तरह उलट दिया है। पहले हम बालक को अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता देते थे, लेकिन आज जन्म लेते ही उसकी राह तय कर देते हैं। पड़ोसी या रिश्तेदार के बच्चे के अंक देखकर अपने बच्चे की क्षमता का आकलन किया जा रहा है। तीन वर्ष की आयु में बस्ते का भारी बोझ और दस वर्ष की आयु में प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग का मानसिक दबाव आ जाता है। मिट्टी का वह प्राकृतिक स्पर्श, संयुक्त परिवारों की गर्माहट और खुले मैदान का खेल अब मोबाइल स्क्रीन और चार दीवारों में सिमट गए हैं। नतीजतन, आज की पीढ़ी बचपन में ही अवसाद, चिड़चिड़ापन और अकेलेपन का शिकार हो रही है। हम बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर तो बना रहे हैं, लेकिन उनसे एक स्वस्थ और प्रसन्न मन छीन रहे हैं।

इस गंभीर समस्या का समाधान किसी महंगी पुस्तक या परामर्श में नहीं, बल्कि माता-पिता द्वारा दिए जाने वाले सार्थक समय में छिपा है। आज की रुचि परीक्षा महंगे गैजेट्स या खिलौनों से नहीं, बल्कि सहज साथ और संवाद से होती है। बच्चे के साथ लूडो खेलना, रसोई के छोटे-छोटे कार्यों में उसे शामिल करना, या गमले में पौधा रोपते हुए उसकी जिज्ञासा को शांत करना ही आज का सही अभ्यास है। जब बच्चा अपनी दिनभर की अनर्गल बातें भी सुनाए, तो उन्हें अनदेखा करने के बजाय ध्यान से सुनना चाहिए।

उदाहरण के लिए, यदि बच्चा खिलौने तोड़ने के बाद उन्हें वापस जोड़ने में लगा रहता है, तो उसमें तकनीकी और रचनात्मक सोच की नींव है। यदि वह कागज़ पर रंग बिखेरता है या कहानियों में खो जाता है, तो उसकी मौलिकता कला और साहित्य में है। जब वह मोबाइल या टीवी पर कोई नई चीज़ सेकंडों में सीख लेता है, तो उसकी रुचि आधुनिक तकनीक में है। आवश्यकता बस इस बात की है कि हम बच्चों पर अपनी इच्छा थोपने के बजाय उनकी इस नैसर्गिक प्रतिभा को पहचानें।

इस सुंदर परिवर्तन में दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बुजुर्गों के पास धैर्य, कहानियों का खजाना और जीवन का अमूल्य अनुभव है; जबकि बच्चों के पास नई सोच, ऊर्जा और आधुनिक तकनीक का ज्ञान है। आज शिक्षा एकमार्गी नहीं, बल्कि द्वि-मार्गी प्रक्रिया बन चुकी है।

जब मैं अपने नाती-पोतों से तकनीक सीखती हूँ और वे मुझसे जीवन के मूल्य सीखते हैं, तो सीखने की यह प्रक्रिया हम दोनों को समृद्ध करती है। मुझे कुछ सिखाते-सिखाते वे अपने विषय के ज्ञान को और गहरा कर लेते हैं, साथ ही वे यह भी जान पाते हैं कि उनके बुजुर्गों ने कैसा संघर्षपूर्ण और मूल्यवान जीवन जिया था। दूसरी ओर, हम बुजुर्ग उनकी क्षमताओं और आकांक्षाओं को करीब से समझ पाते हैं। इससे पीढ़ियों का अंतर बहुत कम हो जाता है और समाज अधिक संतुलित रूप से विकास करता है।

जब दादा-दादी का जीवन-दर्शन और बच्चों की आधुनिक दृष्टि आपस में मिलती है, तो परिवार में केवल ज्ञान का ही नहीं, बल्कि आपसी अपनत्व और सम्मान का वातावरण बनता है।

रुचि परीक्षा केवल एक लुप्त हो चुकी रस्म नहीं, बल्कि संपूर्ण बाल-विकास की एक दूरदर्शी सोच थी। यह परंपरा हमें स्मरण कराती है कि बच्चे रूपी गीली मिट्टी को ज़बरदस्ती अपनी इच्छानुसार आकार देने का प्रयास न करें, बल्कि उसके भीतर छिपे योग्यता के बीज को पहचानकर उसे अपनी गति से प्रस्फुटित होने दें। जब बुजुर्गों का सही मार्गदर्शन और बच्चों की अपनी पसंद का मार्ग एक साथ मिलेंगे, तभी एक सशक्त, संतुलित और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण संभव होगा।

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