उन अनुबंधों को सहेज कर क्या होगा
जिनको बांध नहीं पाया विरही मन
उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा
जो दुर्दिन में भी सदा बने रहे अनबन
सुख में साथ दिया सबने जैसे परछाई
दुख में उनको मेरी कुछ याद न आई
बहुत पुकारा उनको मैंने प्रति दिन
कष्ट भरी पाती भी भेजी मैंने अनगिन
उत्तर की बाट जोहता जाने कब आएगा
मन में शंका के बादल मंडराते रहते
जो होगा अच्छा अथवा और बुरा होगा
उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा
मैंने दिन बहुत बिताए उनकी ही चिंता में
कर्म हुआ परिभाषित जीवन की गीता में
पर वह मर्म नहीं समझे मेरे मन का
कभी नहीं रख पाए भाव अपने पन का
कैसे बतलाता मैं स्वार्थ रहित सेवा को
कुछ पाने की खातिर खोया है मेवा को
मेरे निर्लिप्त समर्पण का क्या होगा
उन संबंधों को बटोर कर क्या होगा ।
निवास : पत्रकार भवन
गंधियांव, करछना, प्रयागराज,
उत्तर प्रदेश पिनकोड 212301
![]()
