कवयित्री, जौनपुर
आंकाक्षा सात भाइयों मे इकलौती बहन है उसकी शादी एक बड़े खानदान मे कर दी जाती है। आंकाक्षा का पति एक कपडों का व्यापारी था। शादी के कुछ समय के बाद व्यापार मे उतार चढाव आने लगा और देखते-देखते व्यापार बंद हो गया।
पहले के जैसी स्थिति अब नही रही। आंकाक्षा कभी मायके का सहारा तो कभी आस पास के पड़ोसियों से उधार लेकर काम करती थी। आंकाक्षा के दो बच्चे थे उनका भी दाखिला अब जानी मानी स्कूल मे ना होकर पास के गाँव के सरकारी स्कूल मे हो गया। जिंदगी अब बस वक़्त के साथ करवट ले रही थी।
“संकोच नहीं करता वक्त्त
लेता और देता बराबर है”
एक दिन आंकाक्षा के बच्चे जिद्द करने लगते है कि उन्हें मामा के यहा जाना है। आंकाक्षा बिना फोन किये अपने भाइयों के यहा आ जाती है। सातो भाइयों की पत्नियाँ उन्हें देखकर आपस मे ही बाते करना शुरू कर देती है। आंकाक्षा सब कुछ सुनकर भी अनसुना कर देती है। कुछ दिन बीतने के बाद आंकाक्षा ससुराल आ जाती है।
आंकाक्षा रात मे खिड़की के पास रो रहीं थीं। उनके पति आकर पूछते है तो आंकाक्षा अपने भाभियों के किये हुए बर्ताव को बताती है तो उनके पति उन्हें दिलासा देते हुए कहते है कि ये वक़्त है जो आज नहीं तो कल बीत जाएगा तुम बस मुझपर विश्वास रखो और दूसरे दिन वह परदेश चले जाते है वहा पर उन्हें नौकरी मिल जाता है।
इधर आंकाक्षा सबके घरों मे जाकर बर्तन झाडू पोछा का काम करने लगती है। धीरे-धीरे ही सही पर अब वक्त्त सही होने लगा था। देखते-देखते दो साल बीत गया। आकांक्षा के पति घर आये वो अपने साथ बहुत सारा समान तथा बच्चों के लिए कपड़े खिलौने लाए और अब उन्होंने निश्चय किया था कि अब वो कपडों का व्यापार ना करके बल्कि जो रोजमर्रा मे इस्तमाल होने वाले चीजों का व्यापार करेंगे तथा वह व्यापार करना शुरू कर दिए।
उन्हें पहले से अधिक लाभ तथा व्यापार भी पहले से अधिक बढ़ने लगा और देखते ही देखते वह दुकान के सेठ बन गए तथा अब वो लोगों को काम भी देने लगे। आंकाक्षा के मायके से उनकी भाभियाँ जोकि हसीं ठिठोली करती थी आज वही आकांक्षा की प्रशंसा करते नही थकती है।
“चंद आने लगे नोट हमारे पास
लोगों के बर्ताव बदल गए
जो कहते थे तुम हो कौन हमारे
आज उन्हीं के लिए खास हो गए”
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