– डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय समाज में माता-पिता को सर्वोच्च नैतिक स्थान प्राप्त है। उन्हें त्याग, तपस्या और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि माँ-बाप कभी गलत नहीं हो सकते। उनकी हर बात आदेश है, हर निर्णय अंतिम सत्य। लेकिन बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह धारणा अब कई सवालों के घेरे में है। आज जब पारिवारिक विघटन, तलाक, अलगाव और घरेलू तनाव की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब यह जरूरी हो गया है कि हम ईमानदारी से यह स्वीकार करें—माँ-बाप भी…
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