पंजाब मॉडल युद्ध नशेआं विरुद्ध का राष्ट्रीय विस्तार समय की मांग

एडवोकेट किशन सनमुखदास  वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी में नशा और मादक पदार्थों का अवैध व्यापार केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है,बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य,पारिवारिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण,युवा भविष्य,आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बहु आयामी चुनौती बन चुका है। नशीले पदार्थों का जाल किसी एक व्यक्ति को प्रभावित करके नहीं रुकता, बल्कि धीरे-धीरे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिरता, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करता है। जब किसी घर का युवा,पति,पिता, भाई या अन्य सदस्य नशे की गिरफ्त में आता है,तब उसका सबसे गहरा और दीर्घकालिक…

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अश्लीलता का महिमामंडन

डॉ. प्रियंका सौरभ जंतर-मंतर लोकतांत्रिक भारत का वह सार्वजनिक मंच है जहाँ नागरिक अपनी बात सरकार और समाज तक पहुँचाने के लिए एकत्र होते हैं। यह स्थान संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक है। लेकिन जब किसी विरोध प्रदर्शन में भाषा की मर्यादा टूट जाती है, गाली-गलौज को प्रतिरोध का औजार बना दिया जाता है और अश्लीलता को साहस का पर्याय बताकर उसका उत्सव मनाया जाने लगता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है? क्या लोकतंत्र में विरोध का अर्थ…

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पीतांबरा माई के धाम दतिया में मुख्यमंत्री मोहन यादव की परीक्षा

पवन वर्मा दतिया मध्य प्रदेश का ऐसा शहर है जिसकी पहचान राजनीति से नहीं बल्कि आस्था से होती है। मां पीतांबरा पीठ के कारण यह नगर देशभर में प्रसिद्ध है। वर्षों से यह मान्यता रही है कि यहां आने वाला श्रद्धालु शक्ति और सिद्धि की कामना लेकर आता है। देश के अनेक राजनेता, उद्योगपति, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियां समय-समय पर मां पीतांबरा के दर्शन के लिए पहुंचती रही हैं। इन दिनों यही दतिया विधानसभा उपचुनाव के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना…

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फेसबुक (मेटा) से पीएम का पोस्ट हटना

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में वर्ष 2026 का नीट पेपर लीक विवाद केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता का प्रश्न नहीं रहा,बल्कि यह युवाओं के विश्वास, लोकतांत्रिक अधिकारों, न्यायपालिका की भूमिका, सरकार की जवाबदेही तथा वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की शक्ति से जुड़ा बहुआयामी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषय बन गया।जंतर-मंतर पर हुआ व्यापक छात्र आंदोलन, उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, न्यायपालिका की सक्रियता तथा भारतीय प्रधानमंत्री  की फेसबुक पोस्ट हटाए जाने को लेकर मेटा और भारत सरकार के बीच उत्पन्न विवाद,मैं एडवोकेट किशन…

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कॉकरोच आंदोलन: गांधीवाद की छाया या डिजिटल युग का नया प्रतिरोध?

– डॉ. प्रियंका सौरभ भारत में जब भी कोई नया जन-आंदोलन उभरता है, उसे पुराने वैचारिक फ्रेमों में समझने की कोशिश होती है। कॉकरोच आंदोलन के साथ भी यही हुआ है। कुछ लोग इसे युवाओं के असंतोष की नई अभिव्यक्ति मानते हैं, तो कुछ इसे गांधीवादी परंपरा की छाया में पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में इस आंदोलन को महात्मा गांधी की प्रसंगिकता से जोड़ा जा सकता है, या यह केवल एक आकर्षक किंतु सतही तुलना है? इस प्रश्न का उत्तर न…

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जवाबदेही केवल सत्ता की नहीं, समाज की भी होनी चाहिए

डॉ. सत्यवान सौरभ लोकतंत्र में जवाबदेही का सबसे अधिक आग्रह सत्ता और पद पर बैठे लोगों से किया जाता है। किसी मंत्री के विभाग में भ्रष्टाचार हो जाए, किसी अधिकारी के क्षेत्र में अपराध बढ़ जाए, किसी शिक्षक के विद्यालय का परिणाम खराब आ जाए या किसी पुलिस अधिकारी के क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बिगड़ जाए, तो सबसे पहले उसी पदाधिकारी से जवाब मांगा जाता है। यह उचित भी है, क्योंकि अधिकार के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या समाज स्वयं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो…

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आरक्षण पर पुनर्विचार का समय: समाज को जोड़ना होगा, तोड़ना नहीं

सुधाकर आशावादी देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश राजनीतिक दल आरक्षण जैसी विकलांगता को समाप्त करने का जोखिम उठाने से डरते हैं, जिसका दुष्परिणाम यह है,कि समाज का जातीय आधार पर विघटन हो रहा है। सामाजिक समरसता और सौहार्द जैसे मूल्य सामाजिक व्यवस्था से दूर हो चुके हैं। यदि ऐसा न होता तो विभिन्न राजनीतिक दल जातीय गठबंधन की बात न करते और न ही जातियों का अगड़ी, पिछड़ी, दलित जातियों के रूप में वर्गीकरण किया जाता। यही नहीं धर्म आधारित राजनीति बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक में विभाजित न होती। इस…

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खुदकुशी किसी भी समस्या का समाधान नहीं

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर प्रोटेस्ट पर दिखे जिन जेन जी की सोच, उनकी हरकत और उतावलेपन को लोग सराह रहै है वो भीतर से कितने कमज़ोर, अधिर और आत्मविश्वास की कमी वाले है ये किसीने सोचा है? पेपर लीक जैसे मुद्दे को लेकर, माँ-बाप द्वारा किसी चीज़ के लिए ना बोलने पर या कोई भी छोटी-मोटी बात पर सुसाइड कर लेते है ये ज़िन्दगी के संघर्ष को क्या ख़ाक़ झेल पाएंगे? जब तक साँस है तब तक संघर्ष भी है इतनी सी बात बच्चों को समझनी चाहिए। क्यों इतने डरपोक,…

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संत रविदास की समरसता और समकालीन समाज का नैतिक दायित्व

युगल किशोर प्रधानाचार्य सरस्वती शिशु मंदिर इंटरमीडिएट कॉलेज, सिरवारा मार्ग, सुलतानपुर — “ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सभ सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न॥” सदियों पहले मध्यकाल के घने सामाजिक अंधकार के बीच जब संत शिरोमणि रविदास जी ने इस अमर चौपाई की रचना की होगी, तो उनके अंतस में एक ऐसे कल्याणकारी समाज का स्वप्न रहा होगा जहाँ जन्म, जाति या वर्ग के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन न हो। आज जब हम इस महान मार्गदर्शक के 650वें प्रकाश वर्ष की पावन बेला के…

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कॉकरोच आंदोलन: गांधीवाद की छाया या डिजिटल युग का नया प्रतिरोध?

डॉ. प्रियंका सौरभ भारत में जब भी कोई नया जन-आंदोलन उभरता है, उसे पुराने वैचारिक फ्रेमों में समझने की कोशिश होती है। कॉकरोच आंदोलन के साथ भी यही हुआ है। कुछ लोग इसे युवाओं के असंतोष की नई अभिव्यक्ति मानते हैं, तो कुछ इसे गांधीवादी परंपरा की छाया में पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में इस आंदोलन को महात्मा गांधी की प्रसंगिकता से जोड़ा जा सकता है, या यह केवल एक आकर्षक किंतु सतही तुलना है? इस प्रश्न का उत्तर न तो…

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