प्रधानाचार्य
सरस्वती शिशु मंदिर इंटरमीडिएट कॉलेज, सिरवारा मार्ग, सुलतानपुर
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“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सभ सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न॥”
सदियों पहले मध्यकाल के घने सामाजिक अंधकार के बीच जब संत शिरोमणि रविदास जी ने इस अमर चौपाई की रचना की होगी, तो उनके अंतस में एक ऐसे कल्याणकारी समाज का स्वप्न रहा होगा जहाँ जन्म, जाति या वर्ग के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन न हो। आज जब हम इस महान मार्गदर्शक के 650वें प्रकाश वर्ष की पावन बेला के मुहाने पर खड़े हैं, तो यह संपूर्ण प्रदेश और समाज के लिए आत्मनिरीक्षण का एक ऐतिहासिक अवसर है। एक शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता के नाते, जब मैं समाज के ताने-बाने को देखता हूँ, तो मुझे संत रैदास के विचार आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक, और भी अधिक अनिवार्य प्रतीत होते हैं।
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि एक शिक्षण संस्थान का सामाजिक चेतना से क्या संबंध है? मेरा स्पष्ट मानना है कि विद्यालय समाज की सबसे छोटी और सबसे पवित्र इकाई है। एक प्रधानाचार्य के रूप में, मैं प्रतिदिन अपनी आँखों के सामने सामाजिक समरसता का एक अद्भुत जीवंत दृश्य देखता हूँ। जब सुबह की प्रार्थना सभा में अलग-अलग जातियों, भिन्न-भिन्न आर्थिक स्तरों और विविध पृष्ठभूमियों से आए बच्चे एक सुर में सुर मिलाकर राष्ट्रगान गाते हैं, या दोपहर के भोजन में एक साथ बैठकर अपनी टिफिन साझा करते हैं, तब वे किसी रूढ़िवादी सामाजिक बंधन को नहीं जानते। उनके भीतर केवल एक ही भाव होता है— सहपाठी होने का, मित्र होने का और मनुष्य होने का।
विद्यालय की इसी पवित्र और भेदभाव-रहित छवि को आज हमें समाज के भीतर भी स्थापित करना होगा। यदि हमारा समाज कक्षाओं जैसी यह सहज समरसता अपने भीतर विकसित कर ले, तो आधी से ज्यादा सामाजिक विकृतियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँ। शिक्षा जब तक व्यक्ति को संवेदनशील और सहिष्णु नहीं बनाती, तब तक वह केवल अक्षरों का बोझ है, ज्ञान नहीं।
हमें इस सत्य को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि 21वीं सदी के तकनीकी और भौतिक विकास के दावों के बावजूद, हमारे समाज के भीतर अभी भी संकीर्णता, जातिगत दूरी और ऊंच-नीच की भावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आधुनिकता ने हमें साधन तो दिए हैं, लेकिन कई बार हम मानवीय मूल्यों के मोर्चे पर पीछे छूट जाते हैं। संत रविदास जी ने अपने जीवन के आचरण से सिखाया था कि आंतरिक शुद्धि ही सबसे बड़ी शुद्धि है। उनका प्रसिद्ध कथन “मन चंगा तो कठौती में गंगा” केवल एक मुहावरा नहीं है, बल्कि वह समाज के पाखंड और आडंबर पर सबसे करारा प्रहार है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मेरी चिंता यह है कि हम संतों के चित्रों की पूजा तो बड़े चाव से करते हैं, लेकिन उनके चरित्र को अपने जीवन में उतारने से बचते हैं। संत रैदास ने श्रम को ईश्वर की साधना माना था। उन्होंने जूते बनाने के अपने पैतृक कार्य को कभी हीन नहीं समझा, बल्कि उसे सेवा और समर्पण का माध्यम बनाया। आज समाज में श्रम के प्रति जो हीनभावना आ गई है, उसे दूर करना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
संत रविदास जी के विचारों की व्यापकता इतनी विशाल है कि इसे किसी एक दिन के समारोह या गोष्ठी में नहीं समेटा जा सकता। यही कारण है कि इस ऐतिहासिक वर्ष को पूरे प्रदेश में ‘वर्ष पर्यंत चेतना अनुष्ठान’ के रूप में मनाने की आवश्यकता है। हमारे संगठन और शिक्षण संस्थान ने यह बीड़ा उठाया है कि हम इस पूरे वर्ष को केवल उत्सव की तरह नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभियान की तरह जिएंगे।
इस वर्ष भर चलने वाले महा-अभियान के तहत, हमारा संकल्प है कि हम समाज के हर वर्ग तक पहुँचें। युवाओं और विद्यार्थियों के माध्यम से प्रदेश की विभिन्न बस्तियों में शिक्षा की अलख जगाई जाएगी, श्रम की महत्ता को पुनर्स्थापित करने के लिए स्वच्छता और सेवा के जमीनी कार्य किए जाएंगे, और निरंतर वैचारिक संगोष्ठियों के जरिए जातिगत दीवारों को ढहाने का प्रयास होगा। यह आयोजन एक ऐसा मंच बनेगा जहाँ समाज का अंतिम व्यक्ति भी अग्रिम पंक्ति में बैठकर मुख्यधारा का हिस्सा महसूस करेगा।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सब अपने-अपने स्तर पर यह प्रतिज्ञा करें कि हम एक ऐसे समाज के निर्माण में अपनी आहुति देंगे, जहाँ कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के कारण उपेक्षित न हो और न ही अपनी पृष्ठभूमि के कारण खुद को कमजोर समझे। जब हमारे भीतर का यह भेद मिटेगा, तभी राष्ट्र की एकता अक्षुण्ण होगी। आइए, संत रविदास जी के विचारों के आलोक में एक समरस, सशक्त और वैभवशाली समाज के निर्माण के लिए कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ें।
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