अरेल…रेत में दर्ज है सांस्कृतिक विरासत, हुमायूं को मिली थी पनाह

संगम तट पर स्थित अरेल (वर्तमान में अरैल) सिर्फ तराई का मैदान ही नहीं, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का गवाह है। राजाओं, आध्यात्मिक गुरुओं और दार्शनिकों का यहां ठिकाना रहा। मुगल बादशाह हुमायूं जब शेरशाह सूरी की सेना से परास्त होकर भाग रहा था तो इसी तट पर उसे पनाह मिली थी। कुंभ मेला में आने वाले श्रद्धालु इस क्षेत्र में कल्पवास कर पूजा-पाठ तो करते हैं। लेकिन शायद उन्हें मालूम हो कि इस तट को आदि वेनीमाधव का आशीर्वाद प्राप्त है।
यह तीर्थ स्थल रहा है।इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में प्रोेफेसर रहे डॉ. डीपी दुबे ने इस क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व पर विशेष शोध कार्य किया है। उन्होंने बताया कि सोरांव तहसील के तरती गांव से 1117 ई. का एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ था। उसमें उल्लेख है कि गहडवाल (गहरवार) राजा गोविंदचंद्र ने अरेल में प्रवास कर त्रिवेणी स्नान किया था। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों को सिंगरौर क्षेत्र (वर्तमान में शृंग्वेरपुरधाम) में गांव दान किए थे।
इसका मूल नाम अरेल है। बाद में अरैल हो गया।अरेल में पहले बघेल राजाओं की गढ़ी हुआ करती थी। शांतिपूर्ण जीवन के लिए वह यहां आकर रुका करते थे। राजा वीरसिंह बघेल और वीरभानु बघेल ने अपना अंतिम समय यहीं व्यतीत किया। नियामतउल्लाह ने तारीख-ए-खान-ए-जहां में लिखा है कि सिकंदर लोदी के आदेश पर इस क्षेत्र में लूटपाट की गई थी। मुगलकाल में बघेल शासक वीरसिंह ने बाबर से मैत्री संबंध बनाकर इस क्षेत्र में अपना आधिपत्य बचाए रखा।प्रो. दुबे बताते हैं कि चौसा के युद्ध में शेरशाह की सेना से हार कर जब हुमायूं भाग रहा था तो वीरसिंह के पुत्र वीरभानु ने उसकी मदद की थी। वह कुछ दिन यहां रुका। फिर बघेल राजा ने उसे अपनी सेना के सुरक्षा घेरे में कड़ा मानिकपुर तक पहुंचाया, जहां से वह सुरक्षित निकल गया। शहजादी गुलबदन बेगम ने इसका जिक्र हुमायूंनामा में किया है। ब्रिटिश इतिहासकार फर्मिंगर लिखते हैं कि 1764 ई. में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को जीत लिया। तब यहां हिंदू राजा का कब्जा था। अब यहां फिर से धार्मिक-पर्यटन स्थल विकसित हो रहे हैं। इसमें बाजार की परिकल्पना भी है।

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