अमेरिका ने भारत पर जवाबी शुल्क लगाये तो घरेलू राजनीति का पारा आसमान पर पहुँच गया। विपक्ष कह रहा है कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होगा। विपक्ष यह भी कह रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना परम मित्र बताते हैं लेकिन ट्रंप दोस्ती नहीं बल्कि दुश्मनी निभा रहे हैं। खास बात यह है कि अमेरिका के जवाबी शुल्क पर ना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई सीधी टिप्पणी की है ना ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस संबंध में कोई बयान दिया है। हालांकि भारत सरकार के सूत्रों का यह कहना है कि देश वैश्विक व्यापार पर अमेरिका द्वारा अतिरिक्त आयात शुल्क लगाए जाने से उत्पन्न स्थिति पर नजर रखेगा तथा जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाएगा। दरअसल इसकी वजह यह है कि ट्रंप के फैसलों से अमेरिका को खुद अपने घरेलू उद्योग से समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सरकारी सूत्रों का यह भी कहना है कि इसमें भारत के लिए चुनौतियां और अवसर, दोनों हैं, क्योंकि निर्यात में उसके कई प्रतिस्पर्धी देश जैसे चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, कंबोडिया और थाइलैंड उच्च शुल्क का सामना कर रहे हैं। इसलिए भारत का मानना है कि एक देश के तौर पर हमें स्थिति पर नजर रखने की ज़रूरत है और जल्दबाज़ी करने की जरूरत नहीं है। सूत्रों का कहना है कि ट्रंप के फैसले से अमेरिकी उद्योग भी नाराज होंगे और इससे चुनौतियां भी होंगी। हमें इंतजार करने, निरीक्षण करने और देखने की जरूरत है और हमें कोई निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
भारत पर 27 प्रतिशत शुल्क के बारे में सूत्रों का यह भी कहना है कि केवल छह-सात क्षेत्रों जैसे झींगा और कालीन को भारी करों से चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अधिकांश अन्य क्षेत्रों को निर्यात बढ़ाने का अवसर मिलेगा, क्योंकि प्रतिस्पर्धी देशों को भारत की तुलना में अधिक शुल्क का सामना करना पड़ेगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार, भारत के लगभग 25 प्रतिशत निर्यात को कर से छूट मिली हुई है तथा शेष के लिए ‘मिश्रित परिदृश्य’ है। इसके अलावा सोने के आभूषण और कालीन जैसी मूल्य-संवेदनशील वस्तुओं पर शुल्क लगाया जाएगा। व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि चीन को 54 प्रतिशत शुल्क का सामना करना पड़ेगा, इसलिए भारत में वस्तुओं की डंपिंग की संभावना है।