वरिष्ठ स्तंभकार, (देवरिया)

आज के दौर में जब कहानियों में चमत्कार और सनसनी ज्यादा बिकती है, तब ‘एकांत’ जैसी किताब सुकून देती है। यह किताब शोर नहीं करती, धीरे से कंधे पर हाथ रखती है। डॉ. मधुछंदा चक्रवर्ती का यह संग्रह उसी भीड़ में अकेले पड़ गए इंसान की कहानी कहता है, जिसे हम रोज देखते हैं पर पहचान नहीं पाते।
डॉ. मधुछंदा चक्रवर्ती की किताब ‘एकांत’ आज के हिंदी साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और समाज की सच्चाई को बहुत करीब से दिखाती है। यह सिर्फ कहानियों का संकलन नहीं है, बल्कि जीवन के हर रंग – गम, संघर्ष, उम्मीद और रिश्तों के बनने-बिगड़ने की कहानी है। लेखिका ने आम जीवन की विशेष बातों को इतने सरल तरीके से लिखा है कि पढ़ते-पढ़ते लगता है जैसे हम स्वयं उस कहानी का हिस्सा हैं।
इन कहानियों में सबसे गहरी बात है मनुष्य के मन के भीतर चलने वाली हलचल और समाज का वास्तविक चेहरा। विशेषकर स्त्रियों की पीड़ा, उनकी हिम्मत और अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद इन कहानियों का प्राण है। ऊपर से देखने पर जीवन सीधा-सादा लगता है, पर अंदर कितने प्रश्न और उलझनें छिपी होती हैं, लेखिका ने उसे बखूबी पकड़ा है।
शीर्षक कहानी ‘एकांत’ में उस अकेलेपन की बात है जो भीड़ में रहकर भी मनुष्य को भीतर से तोड़ देता है। आज की भागदौड़ और लोगों के बीच बढ़ती दूरी को बड़ी खूबसूरती से दिखाया गया है। ‘प्रतिदान’ में एक गरीब पिता की विवशता और उसका त्याग है, जहाँ मजबूरी में लिया गया निर्णय अंत में संतोष बन जाता है। ‘एक माँ का दर्द’ में एक माँ की ममता और समाज द्वारा उसे अकेला छोड़ देने की पीड़ा बहुत गहराई से महसूस होती है। ‘लीला’ में एक सामान्य लड़की के जीवन के माध्यम से रिश्तों की वास्तविकता और समाज की सोच पर प्रहार किया गया है। अन्य कहानियाँ ‘समालोचना’, ‘शीतल पाटी’, ‘एक वीरान जिंदगी’, ‘भाई-दूज’ जैसी रचनाएँ भी घर-परिवार और बदलते समय के प्रभाव को अलग-अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं।
इस किताब की भाषा सबसे बड़ी शक्ति है। बिलकुल साफ-सुथरी, प्रवाहमयी और संवाद जैसी। लेखिका ने असम और बंगाल के परिवेश को अपनी बोली में ऐसे घोला है कि कहानियाँ और भी सजीव लगती हैं। छोटे वाक्य, यथार्थ जैसे संवाद और मन की बारीक पकड़ पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।
कहानी कहने का ढंग भी काबिल-ए-तारीफ है। कोई भारी-भरकम घटना नहीं, रोज की जिंदगी से उठाई गई बातें हैं, लेकिन कहने का अंदाज इतना प्रभावशाली है कि दिल पर छाप छोड़ जाता है। लेखिका घुमा-फिराकर बात नहीं करती, सीधे दिल की बात कहती हैं।
हालांकि हर अच्छी किताब की तरह इसमें भी सुधार की गुंजाइश है। लगभग सभी कहानियों में उदासी और अकेलेपन का एक ही भाव थोड़ा दोहराव पैदा करता है, यदि विषयों में थोड़ी और विविधता और हँसी-खुशी या विद्रोह का रंग होता तो संग्रह और संतुलित लगता। साथ ही शिल्प के स्तर पर कोई बड़ा नया प्रयोग नहीं दिखता और कुछ कहानियों के अंत अनुमानित लगते हैं, और प्रकाशकीय प्रूफ पर थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था।
इन छोटी कमियों के बावजूद ‘एकांत’ एक ऐसी किताब है जो आपको अधिक संवेदनशील बनाती है। यह सोचने पर विवश करती है कि रिश्ते आखिर हैं क्या, स्त्रियों को समाज में किस दृष्टि से देखा जाता है और कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य कैसे जीने का कारण ढूँढ़ लेता है। सादगी और सच्चाई के कारण हिंदी साहित्य में इस संग्रह का अपना अलग स्थान बनता है।
पुस्तक : एकांत (कहानी संग्रह)
लेखिका : डॉ. मधुछंदा चक्रवर्ती
प्रकाशक : श्री नर्मदा प्रकाशन, लखनऊ
वर्ष – 2025
मूल्य – 250
पृष्ठ – 200
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