वरिष्ठ स्तंभकार (देवरिया)
दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत,
मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।
ये पंक्तियाँ किसी कवि की कल्पना नहीं, 23 साल के एक युवक के संकल्प का घोषणा-पत्र हैं। जिस उम्र में आज युवा करियर की चिंता में उलझा रहता है, उस उम्र में भगत सिंह ने मौत को प्रेमिका की तरह गले लगा लिया था। आज उनकी जयंती पर हम एक शहीद की याद में मौन रखने नहीं, एक रूपक को समझने बैठे हैं, और वह रूपक है एक किताब का।
भगत सिंह अगर एक रूपक हैं तो वह एक ऐसी किताब हैं जिसका कवर तो अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फाड़ कर फेंक दिया, पर जिसके पन्ने आज भी हर हिन्दुस्तानी के दिल में फड़फड़ा रहे हैं। यह पाठ्यपुस्तक नहीं, आत्मा की प्रयोगशाला की डायरी है।
इस किताब का पहला पन्ना है बचपन। 28 सितंबर 1907 को बंगा, लायलपुर में जन्मा वह बच्चा जिसने 12 साल की उम्र में जलियांवाला बाग की रक्त-रंजित मिट्टी को मुट्ठी में भर कर प्रण लिया था। वह मिट्टी उसके लिए होली का रंग नहीं, यज्ञ की भभूत थी।
दूसरा पन्ना है अध्ययन। भगत सिंह पिस्तौल वाले से ज्यादा किताब वाले क्रांतिकारी थे। लाहौर के नेशनल कॉलेज और द्वारकादास लाइब्रेरी में वे दिन में अठारह घंटे पढ़ते थे। लेनिन, मार्क्स, रूसो, गीता सब उनकी किताब में थे। फांसी से कुछ घंटे पहले तक वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और बोले थे – “एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।” वे समझ गए थे कि बम से अंग्रेज डरेंगे, पर हुकूमत किताबों से मरेगी।
तीसरा पन्ना है कर्म। सांडर्स वध हो या असेंबली में बम, उन्होंने बम किसी को मारने के लिए नहीं, बहरों को जगाने के लिए फेंका था। बम फेंक कर भागे नहीं, खुद गिरफ्तार हो गए और कहा – “बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है।”
और उस किताब का आखिरी पन्ना है फांसी। वह फांसी अंत नहीं, एक संपादकीय थी। अंग्रेजों ने सोचा स्याही खत्म हो जाएगी, पर उसी स्याही से आजादी का पूरा अखबार छप गया।
आज जब देश अमृतकाल में है, उनकी जयंती पर सिर्फ माला चढ़ाना काफी नहीं है। उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में लिखा था, वे नास्तिक थे पर सभी धर्मों का सम्मान करते थे। जेल में हिंदू, मुस्लिम, सिख कैदियों को एक साथ भूख हड़ताल पर बिठाया। आज जब धर्म के नाम पर नफरत फैलती है, उनका धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद ही इलाज है। उनका भारत मंदिर-मस्जिद का नहीं, रोटी और बराबरी का भारत था।
आज का युवा रील में क्रांति करता है, भगत सिंह कहते हैं इतिहास के पन्नों से प्यार करो। उन्होंने नौजवान भारत सभा बनाई और कहा शादी से पहले देश से शादी करो। उनका मानना था चरित्रहीन युवा कभी देश नहीं बना सकता।
उनकी माँ विद्यावती ने कहा था – “मेरा बेटा मरा नहीं, शहीदों की बारात में दूल्हा बन कर गया है।” वह दूल्हा आज भी हर जुलूस में सबसे आगे चलता है।
सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम उस किताब को पढ़ रहे हैं या सिर्फ पूज रहे हैं। पूजना आसान है, पढ़ना मुश्किल है, क्योंकि पढ़ने के बाद वैसा बनना पड़ता है। आज प्रण लें कि उस किताब का एक पन्ना भी जीवन में उतारेंगे, फिर देखिएगा खुशबू-ए-वतन आपकी मिट्टी से भी आएगी।
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