अध्यापिका
बैंगलोर, कर्नाटक
शिक्षक शब्द सुनते ही हमारे मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उमड़ती है जो हाथ में पुस्तक लिए छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन करता है, उन्हें नई दिशा देता है और उनके व्यक्तित्व का निर्माण करता है। एक शिक्षक केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि विद्या और संस्कार का प्रतीक होता है। परंतु वर्तमान समय में देखा जाए तो आज की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता इससे काफी अलग नजर आती है। आज का शिक्षक इस प्रणाली का एक ऐसा मजदूर बनकर रह गया है, जिसके कंधों पर देश के भविष्य का बोझ तो है, लेकिन उसके अपने अधिकार और सम्मान का दायरा सिमट गया है।
आज के शिक्षक की स्थिति पर विचार करें तो पाते हैं कि न तो उसे उसकी योग्यता और प्रतिभा के अनुसार उचित वेतन मिलता है और न ही आवश्यकता पड़ने पर पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी छुट्टी का सामंजस्य मिलता है। चाहे शैक्षणिक संस्थान सरकारी हों या निजी, दोनों ही क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जहाँ उनका मानसिक और शारीरिक शोषण होता है।
यदि कोई शिक्षक अपने स्वास्थ्य या मानसिक आराम के लिए छुट्टी भी लेता है तो कई बार शिक्षा-इतर या प्रशासनिक स्तर पर ऐसा व्यवहार किया जाता है जिससे उसे अपराधबोध होने लगता है। इसके अलावा, कक्षाओं में अनुशासन बनाए रखना और विद्यार्थियों के बढ़ते हुए नकारात्मक व्यवहार या उपेक्षा का सामना करना आज के शिक्षक के नित्यकर्म का हिस्सा बन गया है। परंतु शिक्षक पर यह दबाव रहता है कि वह अपने छात्रों पर कोई भी अनुशासन संबंधी दंड भी नहीं दे सकता। वहीं जब कक्षा पर नियंत्रण कम होने लगता है तो इसका प्रभाव सामाजिक अशिष्टता और अहंकार के रूप में दिखाई देता है, जो कि एक गंभीर चिंतन का विषय है।
निजी शिक्षा क्षेत्रों की स्थिति तो और भी ज्यादा चिंताजनक है। बड़े महानगरों में, जहाँ संस्थाओं द्वारा विद्यार्थियों से भारी-भारी फीस वसूली जाती है, वहीं उन्हीं संस्थाओं में काम करने वाले योग्य और उच्च शिक्षित शिक्षकों को बेहद न्यून वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। कई स्थानों पर शिक्षकों के मूल शैक्षणिक प्रमाण-पत्र तक जमा करवा लिए जाते हैं, ताकि वे चाहकर भी स्वतंत्रता से दूसरे विकल्प न चुन सकें। इतना ही नहीं, त्यौहार या साप्ताहिक अवकाश के दिनों में भी आवश्यकता के नाम पर शिक्षकों से कार्य लिया जाता है, जो कि मानवीय दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।
यदि हम विश्वसनीयता और अनुभव की दृष्टि से देखें तो यह समस्या किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और व्यवस्थागत चुनौती है जो देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती है। यह स्थिति किसी पर व्यक्तिगत आक्रमण करने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर आत्मसमीक्षा करने के लिए है।
जिस देश में हम ‘गुरु पूर्णिमा’ और ‘शिक्षक दिवस’ पर गुरुओं की महानता के गीत गाते हैं, उस देश के वास्तविक शिक्षा जगत में शिक्षक की ऐसी दयनीय स्थिति पर हम सभी को गंभीरता से विचार करना होगा। यह समय आग्रह करने का है कि शिक्षा से जुड़े सभी पक्ष – प्रशासन, समाज और व्यवस्था – मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ शिक्षक केवल एक ‘कर्मचारी’ या ‘मजदूर’ न बनकर, देश के सच्चे निर्माता के रूप में सम्मान और सुकून की जिंदगी जी सकें।
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