मध्य प्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा भी था, जब मुख्यमंत्री निवास सत्ता के केंद्र के साथ आम जनता की उम्मीदों का दरवाजा भी हुआ करता था। स्वर्गीय अर्जुन सिंह, स्वर्गीय मोतीलाल वोरा, स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा, दिग्विजय सिंह, उमा भारती और स्वर्गीय बाबूलाल गौर जैसे मुख्यमंत्री सप्ताह में एक दिन कुछ घंटे आम नागरिकों से मिलने के लिए तय रखते थे। कोई किसान अपनी जमीन का विवाद लेकर पहुंचता था, कोई कर्मचारी अपनी सेवा संबंधी समस्या तो कोई गरीब अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री के सामने खड़ा हो जाता था। कई मामलों में मुख्यमंत्री मौके पर ही अधिकारियों को बुलाकर निर्देश देते थे। यह व्यवस्था पूर्ण नहीं थी, लेकिन इसमें एक बात जरूर थी, जनता को यह भरोसा रहता था कि उसकी बात सीधे प्रदेश के मुखिया तक पहुंच सकती है। मुख्यमंत्री और उनके स्टाफ को पता नहीं होता था कि शिकायतकर्ता क्या शिकायत करने मुख्यमंत्री के सामने खड़ा है। समय बदला और यह परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के करीब ढाई वर्ष के कार्यकाल के बाद अब सरकार ने मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान-2026 के जरिए जनता के बीच जाने का फैसला किया है।
विचार अच्छा है, लेकिन अभियान शुरू होने से पहले ही मुख्यमंत्री कार्यालय से आए सरकारी निर्देशों ने इसके स्वरूप पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस अभियान का उद्देश्य जनता की शिकायतें सीधे सुनना बताया जा रहा है, उसकी प्रक्रिया बताती है कि मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाली शिकायतें पहले से चुनी जाएंगी, उनका परीक्षण पहले होगा, उनका निराकरण पहले दर्ज होगा और उसके बाद ही मुख्यमंत्री उनसे संवाद करेंगे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह जन विश्वास अभियान है या पहले से तय ‘सब चंगा है जी’ इवेंट?
सरकार का कहना है कि प्रत्येक शुक्रवार मुख्यमंत्री, मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी किसी जिले में जाकर योजनाओं की समीक्षा करेंगे, अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे और शिकायतों का समाधान सुनिश्चित करेंगे। यदि यह व्यवस्था पूरी तरह खुली और पारदर्शी हो तो निश्चित रूप से इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के छिंदवाड़ा में होने वाले पहले कार्यक्रम के लिए जारी निर्देश इस दावे से अलग तस्वीर पेश करते हैं।
लोक सेवा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी पत्र के अनुसार जिले के विभिन्न विभागों से पहले 20 से 25 शिकायतों का चयन किया जाएगा। इन शिकायतों की समीक्षा होगी और 5 अगस्त तक उनका निराकरण सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर दर्ज करना अनिवार्य होगा। इसके बाद इन्हीं शिकायतों में से पांच मामलों का चयन किया जाएगा, जिन पर मुख्यमंत्री कार्यक्रम के दौरान शिकायतकर्ताओं से चर्चा करेंगे। संबंधित अधिकारी भी पहले से मौजूद रहेंगे ताकि वे मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रख सकें।
यहीं से इस अभियान पर सवाल शुरू होते हैं। यदि शिकायतों का चयन पहले ही हो जाएगा, उनका समाधान पहले ही पोर्टल पर दर्ज कर दिया जाएगा और फिर उन्हीं मामलों को मुख्यमंत्री के सामने रखा जाएगा, तो मुख्यमंत्री आखिर किस बात की समीक्षा करेंगे? क्या वे प्रशासन की वास्तविक स्थिति देखेंगे या पहले से तैयार की गई फाइलें?
यह भी सवाल है कि जिन हजारों लोगों की शिकायतें सीएम हेल्पलाइन में लंबित हैं, उन्हें इस अभियान में अपनी बात रखने का अवसर कैसे मिलेगा? क्या वे मुख्यमंत्री तक पहुंच पाएंगे या केवल वही शिकायतकर्ता सामने आएंगे, जिनके मामलों की तैयारी पहले से मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जिलों के अफसरों से पूरी करवा ली गई है?
सरकारी पत्र का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्यमंत्री के सामने केवल चुनिंदा शिकायतें ही लाई जाएंगी। यानी जनता और मुख्यमंत्री के बीच एक पूरी प्रशासनिक छननी काम करेगी। लोकतंत्र में जनता की आवाज जितनी सीधी सपाट सत्ता तक पहुंचे, उतना ही बेहतर माना जाता है लेकिन यहां व्यवस्था ठीक उलटी दिखाई देती है।
दरअसल, किसी भी जनसुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी स्वाभाविकता होती है। मुख्यमंत्री यदि अचानक किसी शिकायतकर्ता से बात करें, किसी भी लंबित मामले की फाइल मांग लें या बिना पूर्व सूचना के अधिकारियों से जवाब मांगें, तभी प्रशासन की वास्तविक स्थिति सामने आती है। लेकिन यदि पूरी पटकथा पहले से लिख दी जाए या लिखवा दी जाए तो स्वाभाविकता समाप्त हो जाती है और कार्यक्रम एक प्रबंधन अभ्यास बनकर रह जाता है।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि मुख्यमंत्री सीमित समय में सभी शिकायतें नहीं सुन सकते। यह बात सही भी है। लेकिन इसका समाधान शिकायतों को पहले से सुलझा हुआ दिखाना नहीं हो सकता। बेहतर होता कि चयन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती, कुछ शिकायतें मौके पर भी ली जातीं और मुख्यमंत्री बिना पूर्व निर्धारित सूची के भी नागरिकों से संवाद करते। इससे अभियान की विश्वसनीयता कहीं अधिक बढ़ती।
राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है। मुख्यमंत्री का किसी जिले में जाना, जनता से मिलना और अधिकारियों को जवाबदेह बनाना सकारात्मक संदेश देता है। लेकिन यदि उस संदेश की पृष्ठभूमि पहले से तैयार कर दी जाए तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। जनता केवल भाषण नहीं देखती, वह प्रक्रिया भी देखती है और जब प्रक्रिया ही यह संकेत देने लगे कि सब कुछ पहले से तय है, तो फिर अभियान का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
यह अभियान वास्तव में सरकार के लिए एक अवसर है। अवसर इस बात का कि मुख्यमंत्री प्रशासन की वास्तविक तस्वीर देखें, न कि केवल वही तस्वीर जो उन्हें देखना है और प्रदेश के साथ देश में दिखाना है। यह अवसर तो इस बात का होना चाहिए था कि वर्षों से लंबित शिकायतों वाले लोग भी महसूस करें कि सरकार उनकी बात सुनने के लिए तैयार है और अवसर इस बात का भी कि प्रशासन यह समझे कि जवाबदेही केवल फाइलों पर नहीं, बल्कि जनता के सामने भी तय होगी।
जन विश्वास का निर्माण मंच, पंडाल, प्रस्तुतियों और सरकारी तैयारियों से नहीं होता। ये सब तो किसी इवेंट के हिस्से माने जाते हैं। विश्वास तब बनता है, जब नागरिक को लगे कि उसकी आवाज बिना किसी चयन, बिना किसी सिफारिश और बिना किसी पूर्व निर्धारित पटकथा के सीधे सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच सकती है।
मुख्यमंत्री के कार्यालय से जारी पत्र के बाद डॉ. मोहन यादव के सामने अब चुनौती इस नए अभियान को विश्वसनीय बनाने की भी है। यदि पहला ही कार्यक्रम पूर्व चयनित शिकायतों, पूर्व दर्ज निराकरण और पूर्व निर्धारित संवाद तक सीमित रहेगा, तो विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिक भी यह सवाल पूछेंगे कि क्या यह वास्तव में जन विश्वास अभियान है या फिर ‘सब चंगा है जी’ इवेंट, जिसमें मुख्यमंत्री वही देखना चाहते है, जो उनके कार्यालय से जारी पत्र का आशय है।
किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होता है, और भरोसा तभी बनता है, जब सत्ता के सामने सच्चाई बिना मेकअप के पहुंचने दी जाए। यदि सच्चाई को पहले ही संवार दिया जाए, तो तालियां भले मिल जाएं, लेकिन जन विश्वास नहीं।
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