भगवान शंकर का श्रृंगार हो रहा हो, और उस पर हम यह कह दें, कि ‘बस अब श्रृंगार पूर्ण हुआ!’ तो निश्चित ही, ऐसा कहकर, हम प्रभु के दिव्य स्वरुप के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं। कारण कि सृष्टि का कण-कण इस इच्छा से सरोबार है, कि हमें जब प्रभु ने इतने प्यार से निर्मित किया है, हमारा गहन प्रीति से श्रृंगार किया है, तो ऐसा कैसे हो सकता है, कि प्रभु के श्रृंगार में सबका योगदान हो रहा हो, और हमें यह शुभअवसर प्राप्त ही न हो।…
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