बलिया और प्रयागराज से एक साथ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को उनकी जयन्ती (१९ अगस्त) पर याद किया गया

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक सत्ता भारतीय चिन्तन-परम्परा के आलोक मे एक दार्शनिक सम्प्रेषण है”– प्रो० उमापति दीक्षित
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‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे प्रसिद्ध निबन्धकार और आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की जयन्ती के अवसर पर ‘साहित्य-जगत् मे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सत्ता और महत्ता’ विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन उनकी जन्मभूमि बलिया और प्रयागराज से एक साथ किया गया, जिसमे देश के प्रतिष्ठित प्रबुद्धवृन्द की वैचारिक सहभागिता रही।

आगरा से केन्द्रीय हिन्दी-संस्थान मे सांध्यकालीन पाठ्यक्रम-विभाग के अध्यक्ष प्रो० उमापति दीक्षित ने बताया, “आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक सत्ता भारतीय चिन्तन-परम्परा के आलोक मे एक दार्शनिक सम्प्रेषण है, जहाँ शास्त्रगत गाम्भीर्य और लोकधर्मी संवेदना समन्वित होकर नवीनता का सर्जन करती है। उनकी महत्ता इस तथ्य मे निहित है कि वे साहित्य को केवल सौन्दर्याभास न मानकर, उसे सांस्कृतिक चेतना का जीवन्त प्रवाह रूप मे प्रतिष्ठित भी करते हैँ।”

बलिया से श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय मे हिन्दी के आचार्य प्रो० जैनेद्रकुमार पाण्डेय ने कहा,”आलोचना और सर्जना, दोनो मे समान दख़ल रखनेवाले साहित्यकार विरले होते हैँ; द्विवेदी जी उन्हीँ मे से एक हैँ। वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचक से टकराते हुए हिन्दी-आलोचना मे दूसरी परम्परा की नीवँ रखते हैँ। भक्ति-साहित्य की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करते हुए, कबीर को प्रतिष्ठित करते हैँ।”

पुणे से स्टेट युनिवर्सिटी ऑव़ अमेरिका मे हिन्दी की विजिटिंग स्कॉलर डॉ० नीलम जैन ने कहा,” हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दीसाहित्य और भारतीय संस्कृति के ऐसे महामनीषी थे, जिनकी सत्ता उनके लेखन की गहराई, विद्वत्ता और मानवीय दृष्टि मे निहित है। उनकी महत्ता इस बात मे है कि उन्होँने साहित्य को केवल मनोरंजन वा सौन्दर्याभिव्यक्ति का साधन न मानकर, उसे समाज, संस्कृति और मानवता की उन्नति का उपकरण बनाया।”

आयोजक, व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “काशी नागरी प्रचारिणी सभा मे उपाध्यक्ष और अन्वेषण-विभाग के निदेशक तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे हिन्दीविभागाध्यक्ष आचार्य द्विवेदी जी की साहित्यिक आलोचना और समीक्षा साहित्य का अनुशीलन करने से ज्ञात होता है कि उनकी समीक्षा मे सद्भावना और काव्यालोचना मे देशहित और कालगत संस्कार का समावेश है।”

प्रयागराज से आर्यकन्या डिग्री कॉलेज मे सेवानिवृत्त हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० कल्पना वर्मा का मत है, “साहित्य-जगत् में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक और सम्पादक रूप में उपस्थित हैँ। वे अपनी विषयानुकूल भाषा, विचारोत्तेजक शैली और मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैँ। अशोक के फूल, विचार और वितर्क और कुटज जैसे निबन्ध-संग्रहोँ के हवाले से देखेँ तो द्विवेदी जी समस्याधर्मी विषयोँ को समकालीनता से जोड़ कर, उनकी व्याख्या करने मे सिद्धहस्त दिखते हैँ।”

बलिया से सतीशचन्द्र कॉलेज मे हिन्दी के आचार्य और विभागाध्यक्ष प्रो० श्रीपति यादव ने कहा, “बलिया के होने के नाते द्विवेदी जी का सम्पूर्ण साहित्य ‘पुनर्नवा’ मे ‘लोरिकायन’ से प्रभावित है तो कहीँ कबीर के फक्कड़पन से; कालिदास के लालित्य से तो
रबीन्द्रनाथ टैगोर के विचारोँ से।”

लखनऊ से राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज मे हिन्दी-प्रवक्ता डॉ० प्रतिभा मिश्र ने कहा, “आचार्य द्विवेदी का महत्त्व इस बात मे है कि वे हमे अपनी जड़ोँ से जोड़े रखते हैँ, साथ ही आधुनिक चिन्तन की ओर प्रेरित भी करते हैँ।”

पुणे से स्वतन्त्र लेखिका, वक्ता और पत्रकार ममता जैन ने कहा, “द्विवेदी जी के उपन्यासोँ मे नारीमुक्ति का स्वर मुखर दिखायी पड़ता है। उनके उपन्यासोँ मे निपुणिका, चन्द्रलेखा, चन्द्रा, महामाया आदिक नारियाँ सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करती लक्षित होती हैँ।”

दिल्ली से सेवानिवृत्त अध्यापिका कल्पना मनोरमा ने कहा, “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्य और चिन्तन हमारे बौद्धिक जीवन के लिए अनमोल धरोहर है। उनकी सघन-गहन विश्लेषण क्षमता और ऐतिहासिक दृष्टि हिन्दी साहित्य के अध्ययन को नयी दिशा देती है।”

लखनऊ विश्वविद्यालय मे शोधार्थी अशोक अग्निपथी ने कहा, “साहित्यजगत् में आचार्य द्विवेदी जी की सत्ता और महत्ता कालजयी ही है। उनकी सत्ता पर आज तक न किसी ने अधिकार करने की चेष्टा की है और न ही कोई भविष्य मे इसकी चेष्टा करना चाहेगा।”

चटमाडीह (बिहार) से शिक्षिता-गृहिणी श्वेता राठौर ने कहा, “द्विवेदी जी ने आधुनिक हिन्दी-आलोचना की प्रगतिशील परम्परा और हिन्दी-साहित्य के इतिहास के लेखन का सूत्रपात किया तथा हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का एक सुदृढ़ और व्यवस्थित ढाँचा निर्मित किया।”

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