2018 में ट्रायल कोर्ट ने यूएपीए के तहत इस व्यक्ति को दोषी ठहराया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने उसकी जेल की अवधि दस साल से घटाकर सात साल कर दी और उसे जेल की अवधि पूरी होते ही देश छोड़ने को कहा। तीन साल से शरणार्थी शिविर में बंद इस व्यक्ति ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि अगर वह श्रीलंका लौटता है तो उसकी जान को खतरा है। उसने कहा कि वह उचित वीजा पर भारत आया था, उसने बताया कि उसकी पत्नी और बच्चे अब भारत में बस गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने अपने निर्वासन की प्रक्रिया में कथित देरी का भी हवाला दिया और शीर्ष अदालत से इस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी याचिका पर जवाब देते हुए न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, “क्या भारत को दुनिया भर से शरणार्थियों की मेजबानी करनी है? हम 140 करोड़ लोगों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। यह कोई धर्मशाला नहीं है कि हम हर जगह से विदेशी नागरिकों का स्वागत कर सकें।
सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों के दावे को भी खारिज कर दिया और कहा कि उसे कानून के अनुसार हिरासत में लिया गया था। पीठ ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 19 (भाषण, अभिव्यक्ति और आवागमन की स्वतंत्रता सहित) केवल भारतीय नागरिकों के लिए उपलब्ध है। भारतीय नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।
![]()
