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हम जिसे ‘कल का कर्णधार’, ‘भारत का भविष्य’, ‘युवाशक्ति’ इत्यादिक विशेषणो से सम्बोधित करते हैँ, आज सर्वाधिक वही दुरवस्था को जी रहा है; हताश और कुण्ठा का शिकार हो रहा है। इसका मुख्य कारण है, दिशाहीन शिक्षा एवं परीक्षा-व्यवस्था। सरकार जब और जैसा चाहती है, शिक्षापद्धति मे बदलाव कर देती है। इसका सीधा असर उन पर पड़ता है, जो ‘अध्यापक’ कहलाता है। अध्यापक वैसी शिक्षापद्धति को स्वीकार करने के लिए तत्पर नहीँ रह पाता, कारण कि उसकी एक सामर्थ्य होती है। शिक्षापद्धति मे बदलाव बहुत सरल है; परन्तु उसे व्यावहारिक रूप देना सहज नहीँ होता। हमने हाल ही मे लगभग समस्त परीक्षाओँ के प्रश्नपत्रोँ को लीक होते देखा है; अवैध तरीक़े से नियुक्तियाँ भी देखी हैँ और उनका भण्डाफोड़ भी। इतना सब घटने के बाद भी केन्द्र और राज्य की सरकारेँ तथा न्यायालयोँ की उदासीनता भी सामने आयी हैँ। इन समस्त घटनाओँ से हमारा युवाभविष्य सशंकित है।
वस्तुत: हमारे देश की युवाशक्ति का इस स्तर तक विकेन्द्रीकरण कर दिया गया है कि वह अपने साथ किये जा रहे अन्याय को ‘भाग्यप्रदत्त’ मानकर ‘कुण्ठा’ की दशा को प्राप्त कर गयी है। केन्द्र और राज के शासक, विशेषत: राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन/भारतीय जनता पार्टी-समर्थित राज्य-शासकोँ ने अपना मायाजाल इस स्तर पर फैला दिया है कि युवावर्ग का मन-मस्तिष्क परजीवी हो चुका है। वह अपने भविष्य के विषय मे सोचने-समझने की सामर्थ्य लगभग खोता जा रहा है। यह परिवर्तन अकस्मात् नहीँ है, प्रत्युत इसके पीछे केन्द्र और उक्त राज्य-सरकारोँ की पूर्वनियोजित-सुनियोजित गहरी चाल है। सत्ता की राजनीति के पीछे राष्ट्रीयता की तिलांजलि देनेवाले उक्त शासक अब ‘मनबढ़’ हो चुके हैँ, जिसके पीछे कथित शासकोँ-द्वारा ‘हिन्दुत्व की अफ़ीम’ चटाकर देश की एक ख़ास प्रकार की जनता को निष्क्रिय बना दिया गया है। दूसरी ओर, देश का प्रतिपक्षी दल निहित स्वार्थपरता और चुनावी समीकरण के जाल मे देश को उलझाये हुए है। इसका मुख्य कारण है कि उसके पास कोई समेकित आधार नहीँ है। वह भी पीडीए-गठबन्धन के नाम पर युवावर्ग को जाति-वर्ग मे बाँटकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। उसके पास भी युवावर्ग के भविष्य उन्नत बनाने के लिए कोई ठोस योजना तक नहीँ है।
आज देश के केन्द्र और राज्यशासकोँ के उदासीन असहाय दशा-दिशा के कारण हमारा युवावर्ग हताशा, कुण्ठा, निराशा, सन्त्रास तथा अवसाद का जीवन जीने के लिए बाध्य है। ऐसा इसलिए भी कि राष्ट्रीय नेतृत्व की इच्छाशक्ति इतनी कुन्द हो चुकी है कि पुरुषार्थ रह ही नहीँ गया। देश को कई भागोँ और खण्डोँ मे बाँटकर ‘जाति-धर्म मे बाँटो और शासन करते रहो’ के अतिरिक्त उसका अन्य कोई उद्देश्य भी नहीँ है। भविष्य सुरक्षित करने की लालसा मे देश का युवावर्ग इधर-उधर भटकता फिर रहा है; उसके भविष्य को समुज्ज्वल बनाने के लिए अवसरजीवी और विश्वासघाती शासकोँ के पास कोई पारदर्शी योजना है ही नहीँ।
योजना समष्टिमूलक हो; पारदर्शी हो; भेद-भाव रहित हो तथा योग्यता के आधार पर उसका सत्यनिष्ठा के साथ क्रियान्वयन् हो। आज आजीविकावृत्ति (पेंशन) पा रहे सेवानिवृत्त कर्मीजन को पुन: सेवा मे न लेकर, युवा-वर्ग का भविष्य सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
देश के युवाओँ को चाहिए कि वे इन्हीं विन्दुओँ पर शासन चलानेवालोँ को नीचे से ऊपर और आगे से पीछे तक घेर लेँ।
अपनी दुर्दशा के लिए देश का युवा-वर्ग सर्वाधिक उत्तरदायी है, जो अपने भविष्य को दाँव पर लगा, तथाकथित हिन्दुत्व का माला जप रहा है। ऐसे लोग दुरवस्था को प्राप्त करेँगे, तब कहीँ उनकी आँखें खुलने की स्थिति मे आ पायेँगी।
युवावर्ग को ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’, ‘दलित, पिछड़ी’ जातियोँ का नारकीय चलचित्र दिखाकर उनकी मति हर ली जा रही है, ताकि सभी असन्तुष्ट शिक्षित बेरोज़गार बँटे रहेँ और आपस मे कटते रहेँ तथा दूसरी ओर, माननीयगण उल्लू सीधा करता रहे। युवाओँ को कारागार मे डालकर उनका भविष्य नष्ट करने का शासकीय उपक्रम विश्व-विदित है। ऐसा इसलिए कि अपना शोषण करवाते रहो और मुँह बन्द किये रहो।
वास्तव मे, इसी यथार्थ का प्रत्यक्षीकरण हो रहा है; किन्तु ऐसा कब तक चलता रहेगा? आज देश के प्राय: प्रत्येक युवा को उसका भविष्य धुँधला दिख रहा है। शिक्षा का स्तर बहुत गिर चुका है; चरित्र और नैतिक बल पुरुषार्थरहित हो चुका है, ‘सहित’ के प्रति किसी के मन मे आकुलता तक नहीँ है। यही कारण है कि आज हर ओर गह्वर है।
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