दुर्गम पहाड़ियों में बन रही यह विशाल परियोजना केवल बिजली या पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेना के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार कर रही है। निर्माण कार्य के लिए बनने वाली मजबूत सड़कें, भारी पुल और ट्रांजिट कॉरिडोर आगे चलकर सेना के लिए ‘दोहरे उपयोग’ वाली रणनीतिक संपत्ति साबित होंगे। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना और BRO की गाड़ियों की रफ्तार कई गुना बढ़ जाएगी और घाटियों के बीच मूवमेंट का समय भी घटेगा। यह पूरा ढांचा ‘प्रोजेक्ट अरुणांक’ और रणनीतिक ‘अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे’ (NH-913) से जुड़कर सीमा पर भारत की लॉजिस्टिक्स सप्लाई लाइन को अभेद्य बना देगा। परिवहन सुविधाओं के अलावा, बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन पूर्वी LAC के पास स्थित अग्रिम सुरक्षा चौकियों (forward security posts) के सामने आने वाली एक बड़ी परिचालन बाधा को सीधे तौर पर दूर करता है। भारतीय सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और अन्य रक्षा इकाइयों द्वारा संचालित इन अग्रिम चौकियों को वर्तमान में बिजली की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। एक बड़ा बिजली उत्पादन केंद्र और उससे जुड़ा ट्रांसमिशन नेटवर्क एक मजबूत पावर बैकबोन (ऊर्जा आधार) तैयार करता है। इससे मैदानी इलाकों से आने वाली लंबी और असुरक्षित बिजली लाइनों पर निर्भर रहे बिना, इन क्षेत्रों में सेना की निरंतर उपस्थिति बनाए रखना आसान हो जाता है।लन, ज़मीनी स्तर पर भारत के वास्तविक प्रशासनिक और परिचालन नियंत्रण को और मज़बूत करता है। बड़े बिजली संयंत्रों, सड़कों के नेटवर्क, प्रशासनिक केंद्रों और सक्रिय आर्थिक क्षेत्रों की मौजूदगी, बाहरी ताकतों द्वारा किए जाने वाले एकतरफा दावों को समय के साथ बनाए रखना बहुत मुश्किल बना देती है। अधिक ऊंचाई वाले ऐसे दुर्गम इलाकों में, जहाँ खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ आवाजाही को बहुत सीमित कर देती हैं, एक अच्छी तरह से जुड़े हुए बहु-उपयोगी केंद्र की स्थापना भारत की उस क्षमता को काफी बढ़ा देती है, जिससे वह सीमा पर लंबे समय तक चलने वाले गतिरोध के दौरान अपनी सेनाओं को ज़रूरी सामग्री पहुँचाने, तैनात करने और वहाँ बनाए रखने में सक्षम हो सके।
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