विदेशी विद्वज्जन, जिन्होँने हिन्दी का मानवर्द्धन किया

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भारत से बाहर विदेशी मूल का एक वर्ग ऐसा था, जो ज्ञान-पिपासु था। उसे विधिवत् ज्ञात हो चुका था कि भारत की अध्यात्म, भूगोल, इतिहास, समाज, अर्थ, साहित्य, संस्कृति, कलादिक धरोहर अतीव समृद्ध हैँ, जिन्हेँ समझने के लिए ‘हिन्दी’ की समझ विकसित करनी होगी। उन प्रबुद्धजन का उद्देश्य था कि वे अपने-अपने देश से भारत आकर यहाँ के निवासियोँ के साथ संवाद स्थापित कर, यहाँ की आध्यात्मिक- साहित्यिक-सांस्कृतिक इत्यादिक गतिविधियोँ का बोध कर सकेँ। अँगरेज़ोँ के अतिरिक्त पुर्तगालियोँ, डचोँ तथा फ्रांसीसियोँ ने अन्य भारतीय भाषाएँ :– बांग्ला, गुजराती, मराठी इत्यादिक भी सीखी थीँ। अँगरेज़ोँ ने आरम्भ मे जिस मिली-जुली भाषा (हिन्दी-अरबी-फ़ारसी) के साथ हिन्दी सीखी थी, वह आगे चलकर ‘हिन्दुस्तानी’ कहलायी, जिसके समर्थक महात्मा गांधी थे। यूरोपीय देशोँ से जो अभारतीय भारत आये थे, उन्हेँ भारत के वातावरण से परिचित कराने के लिए भारत मे निवास करनेवाले तत्कालीन हिन्दी-ज्ञाता पादरियोँ तथा हिन्दी-विशेषज्ञ अँगरेज़ोँ ने हिन्दी सिखाने के उद्देश्य से हिन्दी-व्याकरण की पुस्तकोँ के प्रणयन किये थे। उन पुस्तकोँ के अनुवाद कई विदेशी भाषाओँ :– डच, लैटिन, फ्रेंच इत्यादिक मे कराये गये थे। सत्रहवीँ से अट्ठारहवीँ शताब्दी की अवधि हिन्दी-व्याकरण के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से अतीव महत्त्व की रही है। सत्रहवीँ शताब्दी का पूर्वार्द्ध हिन्दीभाषा-व्याकरण के विचार से अति महत्त्व का रहा है। एक-से-बढ़कर विद्वान् थे, जिन्होँने हिन्दी-भाषा को भारत की सीमाओँ से बाहर पहुँचाये थे। इस संदर्भ मे हम
हॉलैण्ड-निवासी जॉन जेशुआ केटलेर के योगदान को विस्मृत नहीँ कर सकते, जिन्होँने भारत मे आने के बाद हिन्दी का विधिवत् ज्ञानार्जन किया था। केटलेर हिन्दी के प्रभाव मे इतना अधिक आ चुके थे कि उन्हेँ अपने देश के निवासियोँ को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करना पड़ा था, जिसके लिए उन्होँने डच-भाषा मे हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण ही लिख डाला था। इतना ही नहीँ, १७४३ ई० में डेविड मिल ने उसका लैटिन-भाषा मे अनुवाद भी किया था। विदेशी भाषाओँ के शब्द और हिन्दी मे.उनके अर्थवाले कई शब्दकोश अब तक प्रकाश मे आ चुके हैं। १८०५ ई० मेंश ‘फ़ारसी-हिन्दुस्तानी-अँगरेज़ी शब्दकोश’ अस्तित्व मे आया था, जिसे फ्रांसिस ग्लैडविन ने लिखा था। उसके बाद तो विदेशी लेखकोँ मे हिन्दीशब्दकोश लिखने की होड़ लग चुकी थी। रेवरेण्ड विलियम येट्स का ‘हिन्दुस्तानी-अँगरेज़ीकोश, डंकन फ़ोर्ब्स की ‘ए डिक्शनरी ऑव़ हिन्दुस्तानी ऐण्ड इंगलिश’, जोसेफ़ टी० थॉमसन की ‘डिक्शनरी इन हिन्दी ऐण्ड इंगलिश’ इत्यादिक कोश हिन्दी का संवर्द्धन करते रहे। विलियम प्राइस ने तो हिन्दी के हित मे उल्लेखनीय कर्म किये थे। उसके बाद तो हिन्दीशब्द के कई कोश प्रकाश मे आये थे। १८०८ ई० मे कलकत्ता से प्रकाशित ‘हिन्दुस्तानी-अँगरेज़ी डिक्शनरी’ अस्तित्व मे आयी थी, जिसका विलियम हण्टर ने लेखन-सम्पादन किया था।
डेनिसभाषी डॉ० बेंजमिन शूल्ज़ ने भारत आकर अध्यवसाय करते हुए, मात्र दो माह मे हिन्दी-भाषा सीख ली थी। उसके बाद उन्होँने हिन्दी-व्याकरण को लैटिन-भाषा मे लिखा था। उसी पुस्तक मे देवनागरी लिपि मे ‘परिशिष्ट’ के अन्तर्गत बाइबिल की महत्त्वपूर्ण बातेँ बतायी गयी थीँ। इटली के हिन्दी-विद्वान् और कैथोलिक चर्च के पादरी कैसियानो बेलिगटी ने तो भारत मे आने के बाद एक ऐसी व्याकरणात्मक पाण्डुलिपि का प्रणयन किया था, जिसमे देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा मे वर्णमाला का सांगोपांग परिचय प्रस्तुत करते हुए, उसकी व्याख्या थी। उसका प्रकाशन १७७१ ई० मे किया गया था। ग्रेट ब्रिटेन के हिन्दी-विद्वान् जॉर्ज हेडले ने हिन्दीव्याकरण-परम्परा मे एक नवीन युग का सूत्रपात करते हुए, १७७३ ई० में ‘ग्रैमेटिकल रिमार्क्स ऑन् द प्रैक्टिकल ऐण्ड वल्गर डाइलेक्ट ऑव़ द हिन्दोस्तान लैंग्वेज़’ का लन्दन से प्रकाशन करवाया था।
जॉन बार्थविक गिलक्राइस्ट एडिनबरा के निवासी थे। वे फोर्ट विलियम कॉलेज मे हिन्दुस्तानी विभाग के प्रथम अध्यक्ष थे। उन्होँने ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा को प्रोत्साह किया था; किन्तु ‘हिन्दी’ भाषा को उसका मूल आधार माना था। उनके ‘इंगलिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी’ और ‘हिन्दुस्तानी ग्रामर’ अत्यन्त चर्चित रहे हैँ। हिन्दी मे पाठ्यक्रम तैयार कराने की दिशा मे उन्होँने ही प्रयास किया था। भारत मे सर्वाधिक व्यवहार की जा रही हिन्दी को उन्होँने ही ‘खड़ी बोली’ का नाम दिया था।
हेरासिम स्तोपनोविच लेबिदोव एक ऐसे रूसी विद्वान् थे, जिन्होँने हिन्दी के प्रति अपनी उत्कट् भक्ति को उजागर किया था। वे हिन्दी-भाषा सीखना चाहते थे, जिसके लिए वे स्वाध्याय का ही आश्रय लेना चाहते थे। उसके लिए उन्होँने हिन्दुस्तानी-अँगरेज़ी कोश का लेखन किया था, जिसका नाम था, ‘ग्रामर ऑव़ द प्योर ऐण्ड मिक्स्ड ईस्ट इण्डियन डाइलेक्ट्स’। टॉमस रोएबक ने ‘ऐन इंगलिश ऐण्ड हिन्दुस्तानी नेवल डिक्शनरी ऑव़ टेक्निकल ट्रम्स ऐण्ड सी फ़रेज़िज’ १८११ ई० मे कलकत्ता से प्रकाशित करायी थी, जिससे हिन्दी के आधुनिक पारिभाषिक कोश की परम्परा आरम्भ होती है। पादरी मैथ्यू थॉमसन एडम ने ‘ए ग्रामर ऑव़ हिन्दी लैंग्वेज़’ नामक कृति १८२७ ई० मे कलकत्ता से प्रकाशित करायी थी। उस पुस्तक मे देवनागरी लिपि मे आधुनिक पद्धति का वर्णक्रमानुसार संयोजन था। फ्रांस के हिन्दी-विद्वान् गार्सां डी (द) तासी ने आधुनिक विचार से हिन्दी-साहित्य का इतिहास लिखने की दृष्टि विकसित की थी। उन्होँने फ्रेंच-भाषा मे ‘इस्तवार द लित्रेत्यूर ऐन्दुई ए ऐन्दुस्तानी’ (हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास) का लेखन किया था, जिसे १८३९ ई० मे पेरिस से प्रकाशित किया गया था।
एलेक्सेई पेत्रोविच बरान्निकोव रूसी विद्वान् थे। उन्होँने रूसी भाषा मे तुलसीदास-कृत ‘श्री रामचरितमानस’ का अनुवाद कर, अपने हिन्दी-ज्ञान, विशेषत: ब्रजबोली के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की थी। यद्यपि वे सशरीर नहीँ हैँ तथापि उनके समाधिस्थल पर ‘श्री रामचरितमानस’ की यह अर्द्धाली आज भी अंकित है,”भलो भलाहिह पै लहै”, जो उनकी हिन्दीप्रियता को सिद्ध करती दिख रही है।
अब हम विचार करते हैँ, हंगरी के आइमरे बैंघ की। वे जब बुडापेस्ट युनिवर्सिटी मे ‘इण्डोलॉजी’ विषय का अध्ययन कर रहे थे तब उसी अवधि मे वे भारतीय कवि आनन्दघन की कविताओं की शब्दशक्ति से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि हिन्दीभाषा और साहित्य की विधिवत् शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाध्य हो गये थे। उन्होँने भारत-स्थित शान्तिनिकेतन से ‘हिन्दी-विषय’ मे पीएच्० डी० उपाधि अर्जित की थी। इतना ही नहीँ, उन्होँने देवनागरी लिपि और हिन्दीभाषा मे ‘सन्देह को मारग’ नामक काव्यकृति का प्रणयन भी किया था। आगे चलकर, वे ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी मे हिन्दी-साहित्य के प्राध्यापक नियुक्त किये गये थे। पेइचिंग युनिवर्सिटी, चीन मे हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक डॉ० च्यांग चिंगख्वेई जयशंकर प्रसाद की काव्यकृति ‘आँसू’ से अत्यन्त प्रभावित थे। उनमे हिन्दी- कहानीकार के सभी गुण विद्यमान थे।
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन डब्लिन (ऑयरलैण्ड) के निवासी थे; परन्तु जब वे भारतीय लोकसेवा के अधिकारी के रूप मे भारत आये थे तब उन्होँने ‘भाषाविज्ञान का सर्वेक्षण’ लिखकर अपने भीतर की भारतीयता को जाग्रत् किया था। उन्हेँ आधुनिक भारत मे भाषा-सर्वेक्षण करनेवाला प्रथम भाषाविज्ञानी का स्थान प्राप्त है। उन्होँने तुलसीदास और विद्यापति के साहित्य की महत्ता प्रतिपादित की थी। हिन्दीक्षेत्र की बोलियोँ और लोकसाहित्य की खोज करने मे उनकी महती भूमिका रही है। वे भारत की भाषा, बोली तथा साहित्य को समृद्ध करने मे आजीवन लगे रहे।
जापान देश का हिन्दी के प्रचार-प्रसार मे प्रथम स्थान रहा है। उसका कारण यह है कि भारत से बाहर यदि कहीँ सबसे पहले हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन आरम्भ हुआ था तो वह है, टोक्यो युनिवर्सिटी। वहीँ से हिन्दी की सबसे पहली कक्षा शुरू की गयी थी। उसी देश के हिन्दी-प्रचारक अकियो हागा के अवदान को अलक्षित नहीँ किया जा सकता। उन्होँने महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्द्धा मे हिन्दी का प्राध्यापन भी किया था। इटली के हिन्दी-अनुरागी डॉ० एल० पी० टेसीटरी ने ‘तुलसीदास’ और ‘श्री रामचरितमानस’ की कथावस्तु की तुलना ‘आदिकवि वाल्मीकि रामायण’ की कथावस्तु से की है, जो कि उनका शोधप्रबन्ध है।
फ़ादर कामिल बुल्के बेल्जियम के थे; किन्तु ज्ञानपिपासा का शमन करने के लिए उन्होँने अपना कर्मक्षेत्र भारत चुना था। उन्होँने ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘हिन्दी विशारद’ की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। मेधा तीव्र होने के कारण उन्होँने पाँच वर्ष मे ही हिन्दी, संस्कृत, अवधी, ब्रज, पालि, अपभ्रंश इत्यादिक के उपयोगी ज्ञान अर्जित कर लिये थे। उनकी हिन्दी के प्रति अनन्य भक्ति को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। उन्होँने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ में पीएच्० डी० की उपाधि अर्जित की थी। उन दिनो सभी शोधप्रबन्ध अँगरेज़ी मे लिखे जाते थे। कामिल बुल्के ने अपने शोध-निर्देशक प्रो० माताप्रसाद गुप्त से स्पष्टत: कह दिया था, “मैं अपना शोधप्रबन्ध ‘हिन्दीभाषा’ मे ही लिखूँगा”; अन्तत:, इलाहाबाद विश्वविद्यालय को उनकी अप्रतिम हिन्दीप्रियता के सम्मुख झुकना पड़ा था; उसे अपना नियम बदलना पड़ा था। कामिल बुल्के ने ‘हिन्दी-अँगरेज़ी लघुकोश’, ‘अँगरेज़ी-हिन्दी शब्दकोश’, ‘मुक्तिदाता’, ‘नया विधान’ तथा ‘नील पक्षी’ का सर्जन कर, हिन्दी की श्रीवृद्धि की थी।
हमने देखा कि विदेशी मूल के विद्वज्जन ने अपने सद्प्रयास से हिन्दी को देश-देशान्तर मे भली-भाँति गौरवान्वित किया था। हम सभी सारस्वत हस्ताक्षर के प्रति नमित हैँ।

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