असिस्टेंट प्रोफेसर, देवरिया, उत्तर प्रदेश
सितंबर आते ही हिंदी के आँगन में एक जानी-पहचानी हलचल लौट आती है। विद्यालयों की दीवारों पर निबंधों के पोस्टर सज जाते हैं, प्रार्थना-सभाओं में कविताएँ गूँजने लगती हैं, कार्यालयों में ‘हिंदी पखवाड़ा’ के बैनर टँग जाते हैं और कुछ दिनों के लिए हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर देवनागरी में शुभकामनाओं के दीप जलने लगते हैं। व्हाट्सऐप पर ‘हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ’ के संदेश फॉरवर्ड होते हैं। चौदह सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं, पर क्या हमने एकांत में बैठकर कभी सोचा है कि हम मना क्या रहे हैं? क्या यह केवल एक सरकारी औपचारिकता है या अपनी ही साँसों को पहचानने का दिन है?
सन् 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया था। लंबे विमर्श, तर्कों और असहमतियों के बीच हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया था। यह किसी एक भाषा को सिंहासन देने का उत्सव नहीं था, यह इस देश की आत्मा को उसकी अपनी वाणी लौटाने का संकल्प था। सदियों तक हमने अपनी अदालतों में, अपनी शिक्षा में, अपने राज-काज में और अपने सपनों में दूसरी भाषा का ऋण लिया था। मुगलों की कचहरी में फ़ारसी और अंग्रेजों के दफ्तर में अंग्रेजी। हमारी अपनी जनता अपनी ही जमीन पर अनुवादकों की मोहताज हो गई थी। उस पराधीनता के ऋण से मुक्ति का पहला स्वर था हिंदी दिवस। संविधान निर्माताओं ने यह जानते हुए भी कि भारत में अनेक महान भाषाएँ हैं, हिंदी को एक सेतु के रूप में चुना, जो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम को एक सूत्र में पिरो सके।
हिंदी का संघर्ष कभी अंग्रेजी से नहीं रहा। उसका असली संघर्ष अपनी ही हीनभावना से रहा है। हमने अंग्रेजी को ज्ञान समझा और हिंदी को केवल भावना। हमने मान लिया कि जो तेज बोलेगा, जो सूट-बूट में बोलेगा, वही बुद्धिमान है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जब लिखा था – “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल”, तो वे कविता नहीं रच रहे थे, वे एक सोए हुए समाज को जगा रहे थे। 9 सितंबर 1850 को काशी में जन्मे उस युवक ने केवल 35 साल के छोटे से जीवन में हिंदी को केवल साहित्य नहीं दिया, उसने हमें भाषा का स्वाभिमान दिया। उन्होंने कहा था कि अपनी भाषा को छोड़कर आप तरक्की नहीं कर सकते, चाहे जितनी बड़ी इमारत बना लो, नींव अपनी ही मिट्टी की होगी।
उसके बाद हिंदी की यात्रा अद्भुत रही, जैसे गंगा का प्रवाह। हर मोड़ पर उसने नया रूप लिया, नया रंग लिया। प्रेमचंद ने उसे किसानों की फटी धोती पहनाई और वह हमारी अम्मा की भाषा बन गई, जो गोदान के होरी के साथ रोती है और ईदगाह के हामिद के साथ हँसती है। निराला ने उसे मेघों की गर्जना दी – “बादल, गरजो”, महादेवी वर्मा ने उसे संध्या के दीये की लौ दी, एकांत की पीड़ा दी और रामधारी सिंह दिनकर ने जब “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” कहा तो हिंदी राष्ट्र की हुंकार बन गई। हरिवंश राय बच्चन ने उसे मधुशाला की मादकता दी तो सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने उसे मौन की गहराई दी। यही तो हिंदी का वैभव है कि वह एक साथ तुलसी की चौपाई भी है और धूमिल की बेबाक कविता भी।
आज की त्रासदी यह नहीं है कि हमारे बच्चे अंग्रेजी बोलते हैं, त्रासदी यह है कि हम हिंदी में सोचने से कतराने लगे हैं। हम गर्व से कहते हैं कि हमारा बच्चा अंग्रेजी में सोचता है। हम अपने बच्चों से कहते हैं – बेटा, अंग्रेजी अच्छी कर लो, नहीं तो दुनिया में पीछे रह जाओगे। हम कभी यह नहीं कहते – बेटा, हिंदी अच्छी कर लो, नहीं तो अपनी मिट्टी से कट जाओगे। हमने सफलता की परिभाषा को इतना संकुचित कर दिया है कि उसमें जड़ें शामिल ही नहीं हैं। अंग्रेजी में आप नौकरी पा सकते हैं, व्यापार कर सकते हैं, विदेश में पढ़ सकते हैं, पर माँ से माफी, प्रेमी से प्रेम, मित्र से मन की बात और ईश्वर से प्रार्थना तो अंत में अपनी ही भाषा में होती है। दर्द का कोई शुद्ध अंग्रेजी अनुवाद नहीं होता, आँसू का कोई विलायती पर्याय नहीं होता और ‘माँ’ शब्द का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।
आज जब दुनिया डिजिटल हो गई है, तब हिंदी के सामने एक नया अवसर भी है और नई चुनौती भी। आज हिंदी केवल किताबों में नहीं है, वह आपके कीबोर्ड पर है, वह यूट्यूब के वीडियो में है, वह मीम्स में है, वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात करने की भाषा बन रही है। आज दुनिया का सबसे बड़ा कंटेंट हिंदी में देखा जा रहा है। पर हमने उसे अभी भी केवल मनोरंजन की भाषा बना रखा है, ज्ञान-विज्ञान की नहीं। हमें मेडिकल, इंजीनियरिंग, कोर्ट और तकनीक में हिंदी को लाना होगा। जब तक एक किसान अपनी जमीन का कागज हिंदी में नहीं समझेगा, एक माँ अपने बच्चे की दवा का पर्चा हिंदी में नहीं पढ़ पाएगी, तब तक राजभाषा का संकल्प अधूरा है।
हिंदी दिवस भाषणों का दिन नहीं, आचरण का दिन है। इस दिन बैनर नहीं, प्रण चाहिए। मंच पर बड़ी-बड़ी बातें कहकर अगली सुबह फिर अंग्रेजी में हस्ताक्षर करने से हिंदी का भला नहीं होगा।
इसलिए सोचिए, अगर हम सब ये पाँच छोटे, पर सच्चे प्रण ले लें तो क्या होगा? पहला – अपने फोन का कीबोर्ड एक साल हिंदी में रखेंगे, लिखना धीरे होगा पर सोचना अपनी भाषा में शुरू होगा। दूसरा – अपने हस्ताक्षर हिंदी में करना सीखेंगे, क्योंकि हस्ताक्षर केवल नाम नहीं, पहचान होते हैं। तीसरा – अपने घर में एक किताब, केवल एक किताब हिंदी की अपने बच्चे को पढ़कर सुनाएँगे। चौथा – दुकान के नाम, अपनी नेम-प्लेट पर अंग्रेजी के साथ हिंदी को भी छोटा नहीं, बराबर स्थान देंगे। और पाँचवाँ – अपने बच्चों को डाँटने और प्यार करने के लिए हिंदी का ही उपयोग करेंगे, क्योंकि संस्कार अनुवाद से नहीं आते। भाषाएँ सरकारी फाइलों में नहीं, रसोई की कहानियों में, दादी की लोरियों में, चूल्हे की आँच में और मेले के शोर में जीवित रहती हैं। जिस दिन हमारी दादी की कहानी फिर से बिना किसी अनुवाद के हमारे बच्चों के कानों में गूँजेगी, जिस दिन नानी का “भइया, आओ खाना खा लो” फिर से हमारे घरों की सबसे मीठी आवाज बनेगा, उसी दिन हिंदी दिवस सार्थक होगा। हिंदी किसी भाषा की विरोधी नहीं है। यह तो वह विशाल आँगन है जो उर्दू के ‘इश्क’ को भी गले लगाता है, संस्कृत के ‘प्रेम’ को भी माथे पर बिठाता है और अंग्रेजी के ‘लव’ को भी मुस्कुराकर स्वीकार कर लेता है। यही उसकी सनातनता है, यही उसका सौंदर्य है। वह लड़ना नहीं जानती, वह जोड़ना जानती है। वह गंगा की तरह है, जिसमें हर बोली आकर मिल जाती है और पवित्र हो जाती है। इसलिए 14 सितंबर को ध्वज फहराइए, गीत गाइए, कविता सुनाइए, पर 15 सितंबर की सुबह हिंदी को भूल मत जाइए। हिंदी को एक दिन का उत्सव नहीं, जीवन का उत्सव बनाइए।
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