पूंजी प्रवाह से सुदृढ़ हुई भारतीय अर्थव्यवस्था

महेन्द्र तिवारी

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए यह सप्ताह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि लेकर आया है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 716.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जो लगभग छह महीने का सर्वोच्च स्तर है। एक ही सप्ताह में इसमें लगभग 9.9 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की वित्तीय मजबूती, निवेशकों के बढ़ते विश्वास और बाहरी भुगतान क्षमता का स्पष्ट संकेत भी है। लगातार सात सप्ताह से विदेशी मुद्रा भंडार में हो रही वृद्धि यह दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी दबावों का सामना करने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम होती जा रही है।

विदेशी मुद्रा भंडार को सामान्य भाषा में समझें तो यह किसी राष्ट्र की वह वित्तीय पूंजी है जिसे वह विदेशी मुद्राओं, स्वर्ण, विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी आरक्षित हिस्सेदारी के रूप में सुरक्षित रखता है। जिस प्रकार किसी परिवार के पास कठिन समय के लिए बचत होती है, उसी प्रकार किसी देश के लिए विदेशी मुद्रा भंडार आर्थिक संकट, युद्ध, प्राकृतिक आपदा, आयात भुगतान और मुद्रा स्थिरता के समय सुरक्षा कवच का कार्य करता है। यही कारण है कि विश्व के विकसित और उभरते हुए सभी देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखने का प्रयास करते हैं।

भारत के भंडार में आई इस वृद्धि का सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता विदेशी पूंजी प्रवाह है। पिछले कुछ महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक ने ऐसी कई नीतिगत पहल कीं जिनका उद्देश्य देश में विदेशी मुद्रा का आगमन बढ़ाना था। सरकारी कंपनियों और बैंकों के विदेशी ऋणों के लिए विनिमय जोखिम को कम करने वाली सुविधाएं दी गईं तथा विदेशों से जमा जुटाने वाले बैंकों को विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया गया। इन उपायों के परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत आई और उसका महत्वपूर्ण हिस्सा रिजर्व बैंक के भंडार में जुड़ गया।

विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का होता है। वर्तमान वृद्धि में भी लगभग 7.2 अरब डॉलर की बढ़ोतरी इसी हिस्से में हुई है। इसके अतिरिक्त स्वर्ण भंडार का मूल्य भी लगभग 2.7 अरब डॉलर बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में मजबूती का लाभ भारत को मिला है। दूसरी ओर विशेष आहरण अधिकार में मामूली परिवर्तन देखने को मिला, किंतु उसका समग्र प्रभाव नगण्य रहा। कुल मिलाकर यह वृद्धि संतुलित और व्यापक आधार वाली मानी जा रही है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने से आम नागरिक को क्या लाभ होता है। इसका सबसे पहला प्रभाव रुपये की स्थिरता पर पड़ता है। जब किसी देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा होती है, तब उसका केंद्रीय बैंक आवश्यकता पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर रुपये की अत्यधिक गिरावट को रोक सकता है। यदि विदेशी मुद्रा का भंडार कमजोर हो तो आयात महंगे हो जाते हैं, पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ता है तथा महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। मजबूत भंडार इन जोखिमों को काफी हद तक नियंत्रित करने में सहायता करता है।

भारत विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, उर्वरक और अनेक औद्योगिक कच्चे माल के लिए विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है। यदि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें अचानक बढ़ जाएं या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संकट उत्पन्न हो जाए, तब विदेशी मुद्रा भंडार देश को बिना घबराहट के आयात जारी रखने की क्षमता देता है। इसका सीधा लाभ उद्योगों, परिवहन, कृषि और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार केवल बैंक की तिजोरी में रखा धन नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों का मौन संरक्षक भी है।

वर्तमान उपलब्धि का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष निवेशकों का विश्वास है। जब विदेशी निवेशक किसी देश में निवेश करने का निर्णय लेते हैं, तब वे केवल बाजार के आकार को नहीं देखते, बल्कि उस देश की बाहरी वित्तीय स्थिति, मुद्रा की स्थिरता और भुगतान क्षमता का भी मूल्यांकन करते हैं। 716.9 अरब डॉलर का भंडार यह संदेश देता है कि भारत अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने में सक्षम है और अचानक आने वाले वैश्विक वित्तीय झटकों का सामना कर सकता है। यही विश्वास प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पूंजी बाजार में निवेश दोनों को प्रोत्साहित करता है।

हालांकि यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, फिर भी इसे सर्वकालिक रिकॉर्ड नहीं कहा जा सकता। इस वर्ष फरवरी में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 728.5 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचा था। वर्तमान भंडार उससे कुछ कम है, किंतु छह महीने बाद दोबारा उस स्तर के निकट पहुंचना यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने अस्थायी उतार चढ़ाव से उबरकर फिर मजबूती हासिल की है। यदि पूंजी प्रवाह और निर्यात में सुधार की यह गति बनी रहती है, तो आने वाले समय में नया रिकॉर्ड बनना भी संभव है।

विश्व अर्थव्यवस्था इस समय अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक शुल्क विवाद, पश्चिम एशिया में भू राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को अस्थिर बनाया हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में जिन देशों के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में रहते हैं। भारत की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने वैश्विक अस्थिरता के दौर में अपनी वित्तीय नींव को मजबूत बनाए रखा है।

भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भी यहां उल्लेखनीय है। केंद्रीय बैंक केवल मुद्रा छापने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह विदेशी मुद्रा बाजार में संतुलन बनाए रखने का दायित्व भी निभाता है। जब अत्यधिक विदेशी पूंजी देश में आती है, तब रिजर्व बैंक उसका एक हिस्सा खरीदकर अपने भंडार में जोड़ लेता है ताकि रुपये का अत्यधिक मूल्यवृद्धि न हो। दूसरी ओर जब डॉलर की मांग बढ़ जाती है, तब वही भंडार बाजार में उपलब्ध कराया जाता है। इस संतुलित हस्तक्षेप से मुद्रा बाजार में अनावश्यक उतार चढ़ाव कम होता है और व्यापार जगत को स्थिर वातावरण मिलता है।

विदेशी मुद्रा भंडार का संबंध केवल वित्त मंत्रालय या रिजर्व बैंक तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव किसानों, उद्यमियों, निर्यातकों, विद्यार्थियों और विदेश यात्रा करने वाले नागरिकों तक पहुंचता है। यदि रुपया स्थिर रहता है तो विदेश में पढ़ाई का खर्च अपेक्षाकृत नियंत्रित रहता है, आयातित मशीनें कम महंगी होती हैं, उद्योगों की उत्पादन लागत संतुलित रहती है और निर्यातकों को भी विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता का सामना नहीं करना पड़ता। इस प्रकार यह भंडार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में आर्थिक जीवन को प्रभावित करता है।

आने वाले समय में भारत के सामने चुनौती केवल भंडार बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसे टिकाऊ आधार पर बनाए रखने की होगी। इसके लिए निर्यात में वृद्धि, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार, सेवा क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता, पर्यटन से विदेशी आय और दीर्घकालिक विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना आवश्यक होगा। केवल अल्पकालिक पूंजी प्रवाह पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। स्थायी आर्थिक शक्ति वही होती है जो उत्पादन, नवाचार और वैश्विक व्यापार में निरंतर बढ़त बनाए रखे।

716.9 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत की आर्थिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह उपलब्धि बताती है कि देश ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अपनी बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत किया है और निवेशकों के विश्वास को बनाए रखा है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी राष्ट्र के लिए आर्थिक स्वतंत्रता, मुद्रा स्थिरता और संकट से निपटने की क्षमता का प्रतीक होता है। यदि भारत इसी संतुलित नीति, विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन और उत्पादन आधारित विकास की दिशा में आगे बढ़ता रहा, तो यह भंडार केवल एक आंकड़ा नहीं रहेगा, बल्कि विकसित भारत की आर्थिक नींव का सशक्त स्तंभ सिद्ध होगा।

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