“पाण्डे! तू मेरा ‘ट्यूटर’ बन जा”–डॉ० अब्दुल कलाम

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से भारत के प्रसिद्ध प्रौद्योगिकीविद् और भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० अब्दुल कलाम की पुण्य-स्मृति मे उनके कर्त्तृत्व पर एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर इसरो-विज्ञानी प्रो० मेघना नायडू ने बताया– मेरी तो कलाम सर से कई बार मुलाक़ात होती रही। वे इतने सीधे और सज्जन थे कि उनके भीतर भारत के प्रथम नागरिक होने का ज़रा भी दम्भ नहीँ था। वे हम विज्ञानियोँ को बहुत प्रोत्साहित करते थे। जब मैने उनकी पुस्तक ‘विंग्स ऑव़ फायर’ (अग्नि की उड़ान) का अध्ययन किया तब लगा कि वे कितने कल्पनाशील व्यक्ति थे।
आयोजक एवं ‘शून्य से शिखर तक डॉ० अब्दुल कलाम’ और ‘रामेश्वरम से राजपथ तक डॉ० कलाम’ पुस्तकोँ के लेखक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक संस्मरण सुनाया– डॉ० अब्दुल कलाम ‘हिन्दी’ सीखना चाहते थे; उन्हेँ समय नहीँ मिल पाता था। एक स्थिति ऐसी आयी कि उस महामानव ने जाने क्या सोचा-विचार किया और एक झटके मे मुझे ‘गुरु’ बना लिया था।
आचार्य ने आगे बताया– इसके पीछे भी एक आत्मीय घटना है। हुआ योँ कि मेरे हाथोँ मे मेरी एक पुस्तक ‘भारतीय वैज्ञानिक और उनकी देन’ थी। उसको देखते ही उन्होंने मुझसे ले ली। कलाम साहिब टूटी-फूटी हिन्दी बोल लेते थे। मेरी कोशिश थी, उनकी हिन्दी न बोल पाने की झिझक समाप्त करूँ। उनका प्रश्न था, “तुमने (तुम्हारे) इस बुक मेँ क्या है ?” मैने बताया, “इसमे इण्डियन साइंस्टिट के बारे मे है।” फिर वे चहक कर बोले,”मेरा भी।” मेरा उत्तर था,”आप साइण्टिस्ट नहीँ हैँ।” वे विस्मित होकर पूछ बैठे, “फिर?” मैने उन्हेँ बताया कि उनके सभी काम ‘टेक्निकल’ रहे हैँ :– ‘उपग्रह’, ‘पेसमेकर’, ‘परमाणुबॉम्ब’ से लेकर ‘मिसाइल’ तक, तब वे समझ गये थे। मैने बताया कि वे एक कुशल ‘टेक्नोलॉजिस्ट’ हैँ, फिर मैने बताया,” मेरी पुस्तक मे भी ग़लत है।” वे बोले, “हाऊ?” मैने बताया कि वैज्ञानिक की जगह कुछ और होगा; प्रकाशक ने मेरे लिखकर दिये शुद्ध शब्द बदल दिये हैँ। तभी उनके सामने मैने तीन शब्द लिखे थे और उनके अर्थ पूछे थे। वे शब्द थे :–साइंस, साइण्टिस्ट तथा साइण्टिफ़िक। मैने उनसे इन तीनोँ के अर्थ पूछे थे। उन्होँने कहा,”बिग्यान।” मैने उच्चारणसहित सुधारा था,”विज्ञान कहिए।” दूसरे शब्द ‘साइण्टिस्ट’ का अर्थ ‘बैग्यानिक’ कहा। मै चुप रहा। जब ‘साइण्टिफ़िक’ का अर्थ पूछा था तब अपना सिर खुजलाते रहे और स्वयं से अर्थ लेते हुए गरदन हिलाते रहे; यानी ‘यह नहीँ, वह नहीँ’ का भाव-प्रदर्शन, फिर जब कुछ नहीँ सूझा तब मेरे गाल पर चपत लगाते हुए कहा, “पाण्डे! तू मेरा ट्यूटर बन जा।”
नागपुर से शिक्षाशास्त्री डॉ० अविनाश निगम ने कहा– डॉ० कलाम पर जितना भी कहा जाये, कम है। वे भारत को विकसित राष्ट्रोँ की पंक्ति मे देखना चाहते थे। उनके भीतर की मनुष्यता “वसुधैव कुटुम्भकम्” का बराबर आह्वान करती रहती थी।

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