वैसे हम आपको बता दें कि पाकिस्तान की कूटनीतिक कवायद बेहद कठिन संतुलन की मांग करती है। एक ओर वह सऊदी अरब की आर्थिक सहायता पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर चीन उसका सबसे बड़ा रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। उधर, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के विरुद्ध नौसैनिक नाकाबंदी की घोषणा कर दी है और तेल टैंकरों को निशाना बनाकर पूरे क्षेत्र में तनाव कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में पाकिस्तान यदि ईरान के अधिक निकट दिखाई देता है तो सऊदी अरब नाराज हो सकता है, जबकि चीन चाहता है कि किसी भी कीमत पर क्षेत्र में शांति स्थापित हो ताकि उसके व्यापारिक और ऊर्जा हित सुरक्षित रह सकें।
हम आपको बता दें कि चीन की सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते संकट और लाल सागर में अस्थिरता ने वैश्विक तेल आपूर्ति को गंभीर खतरे में डाल दिया है। चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसके कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार है। यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों मार्ग बाधित होते हैं तो चीन की अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि बीजिंग पाकिस्तान की मध्यस्थता का खुलकर समर्थन कर रहा है और क्षेत्र में तनाव कम कराने के लिए सक्रिय कूटनीतिक प्रयासों में जुटा हुआ है।
दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। अमेरिकी हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान और हूती विद्रोहियों को कड़ी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देते हुए ऊर्जा प्रतिष्ठानों, रणनीतिक ठिकानों और अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर हमले की संभावना भी जताई है। इसके बावजूद उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि यदि गंभीर वार्ता की संभावना बनती है तो समझौते का रास्ता अब भी खुला है। यही विरोधाभास इस पूरे संकट को और अधिक जटिल बना रहा है।
सऊदी अरब पर बढ़ते हमलों ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया है। यमन से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों को वायु रक्षा प्रणाली ने नष्ट कर दिया, जबकि हूती विद्रोहियों ने तेल टैंकरों और सामरिक ढांचे को निशाना बनाकर स्पष्ट संदेश दिया है कि वे लाल सागर में भी दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यदि लाल सागर और होर्मुज दोनों समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहते हैं तो वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मचना तय है। पहले ही कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया जा चुका है, जिसका असर विश्व अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ सकता है।
उधर, यमन भी एक बार फिर व्यापक युद्ध की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। वर्षों से ठहरे संघर्ष में अब नई सैन्य तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। हूती लड़ाके और सरकारी बल आमने-सामने तैनात हैं। संयुक्त राष्ट्र, ओमान और पाकिस्तान की मध्यस्थता के बावजूद समझौते की उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि हूती संगठन अब ईरान के साथ मिलकर सऊदी अरब और अमेरिका पर दबाव बढ़ाने के लिए समुद्री मार्गों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। यदि सऊदी अरब दोबारा बड़े पैमाने पर सैन्य हस्तक्षेप करता है तो पूरा क्षेत्र फिर से भीषण युद्ध की चपेट में आ सकता है।
देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सामरिक महत्व यह है कि समुद्री व्यापार मार्ग अब आधुनिक युद्ध का सबसे प्रभावी हथियार बनते जा रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे समुद्री मार्गों पर नियंत्रण का अर्थ केवल नौसैनिक बढ़त नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रभावी पकड़ भी है। चीन इन मार्गों को खुला रखना चाहता है, अमेरिका ईरान के प्रभाव को सीमित करना चाहता है, जबकि ईरान और उसके सहयोगी इन समुद्री रास्तों को दबाव की रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। पाकिस्तान इस पूरे शक्ति-संघर्ष में एक ऐसे मध्यस्थ के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है, जिसे एक साथ बीजिंग, तेहरान और रियाद, तीनों के हितों का संतुलन साधना है। यदि यह प्रयास विफल होता है तो पश्चिम एशिया का यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था को झकझोर देने वाले बहुआयामी संकट में बदल सकता है।
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