मौजूद जानकारी के अनुसार समझौते को लागू होने में कम से कम एक से दो साल लग सकते हैं। पहले चरण में आयात शुल्क को 40 प्रतिशत तक लाया जाएगा और उसके बाद धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक घटाया जाएगा। गौरतलब है कि इसके लिए कानूनी और नियामकीय मंजूरी के साथ-साथ संबंधित देशों की संसदों से अनुमोदन भी जरूरी है, जो समय लेने वाली प्रक्रिया मानी जाती है।
इस बदलाव का सीधा फायदा केवल उन कारों को मिलेगा जो पूरी तरह विदेश में बनकर भारत आती हैं, यानी सीबीयू मॉडल। भारत में असेंबल होने वाली लग्ज़री कारों पर यह छूट लागू नहीं होगी। ऐसे में मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसे ब्रांड्स के आम सेडान और एसयूवी मॉडल्स की कीमतों में बड़ी कटौती की उम्मीद कम है। हालांकि, इनके हाई-परफॉर्मेंस और सीमित संस्करण वाले मॉडल्स, जैसे एएमजी, बीएमडब्ल्यू एम सीरीज़ और ऑडी आरएस, सस्ते हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुल्क 40 प्रतिशत तक घटता है, तो पूरी तरह आयातित कारों की कीमत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी संभव है। वहीं, 10 प्रतिशत शुल्क की स्थिति में यह राहत और बढ़ सकती है, हालांकि मुद्रा विनिमय दर, अतिरिक्त सेस और कंपनियों की मूल्य नीति जैसे कारक अंतिम कीमत तय करेंगे।
इस समझौते में पुर्जों और कंपोनेंट्स पर शुल्क घटाने का भी प्रस्ताव है, जिसे अगले 5 से 10 वर्षों में लागू किया जा सकता है। इससे भारतीय वाहन निर्माताओं को यूरोपीय सप्लायर्स से बेहतर गुणवत्ता वाले पुर्जे सस्ते दामों पर मिलने का रास्ता खुल सकता है।
कुल मिलाकर, यह समझौता उपभोक्ताओं के लिए बेहतर तकनीक और नए विकल्प लाने की संभावना पैदा करता है, लेकिन यह उम्मीद करना कि कल से ही लग्ज़री कारें बेहद सस्ती हो जाएंगी। धीरे-धीरे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और नए मॉडल्स आने की संभावना जरूर मजबूत होती दिख रही है।
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