किसानों के लिए सुअवसर : वृक्षों से प्राप्त होगा हरा चारा

प्रयागराज। भा.वा.अ.शि.प.- पारिस्थितिक पुर्नस्थापन केन्द्र, प्रयागराज द्वारा संचालित अखिल भारतीय समन्वित अनुसन्धान परियोजना-फॉडर के अंतर्गत एक दिवसीय प्रशिक्षण सह कार्यशाला का आयोजन दिनांक 19.03.2025 को किया गया। कार्यशाला का शुभारम्भ मुख्य अतिथि डॉ. देवेंद्र स्वरुप, सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र, मैनपुरी द्वारा किया गया। उन्होंने उपस्थित किसानों को साइलेज विधि से अवगत कराते हुए इसके माध्यम से हरे चारे के संरक्षण पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया साथ ही इस चारा को खिलाने से होने वाले लाभ से भी अवगत कराया। इसी क्रम में उन्होंने पशुधन विकास हेतु सरकारी ऋण योजना पर भी चर्चा किया। कार्यशाला समन्वयक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनीता तोमर ने कार्यशाला के मुख्य उद्देश्य पर चर्चा करते हुए साइलेज विधि द्वारा हरे चारे के संरक्षण से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि पशुओं के लिए सूखे के मौसम में जब खेतों व प्राकृतिक चारागाहों में हरा चारा उपलब्ध नही होता है तो उस स्थिति में यह साइलेज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी क्रम में केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक आलोक यादव ने बताया कि साइलेज के अंतर्गत हरे चारे में पाए जाने वाले सभी पौष्टिक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते हैं, जो कि गाय, भैंस, बकरी तथा अन्य पशुओं हेतु अत्यंत उपयोगी साबित होते हैं। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनुभा श्रीवास्तव द्वारा साइलेज की सुरक्षा और भण्डारण के अंतर्गत साफ-सफाई, स्वच्छ चारा, उचित भण्डारण स्थल तथा ख़राब हिस्सों को हटाना आदि सम्बन्धित विषयों से अवगत कराया गया। कार्यशाला में उपस्थित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आलोक कुमार सिंह ने बताया कि साइलेज में आमतौर पर हरे घास, मक्का, सोरघम तथा अन्य फसलों से बनाया जा सकता है साथ ही बिपिन कुमार सिंह ने साइलेज पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें सूखे चारे कि अपेक्षा प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम व फाइबर आदि जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। केन्द्र के तकनीकी अधिकारी रतन गुप्ता के कुशल नेतृत्व में परियोजना कर्मियों यथा सत्यव्रत सिंह एवं स्वाति प्रिया द्वारा उपस्थित किसानों के समक्ष वृक्ष की पत्तियों आदि से हरा चारा तैयार करना तथा उनके भण्डारण हेतु विभिन्न तरीकों का प्रदर्शन किया गया। आयोजित प्रशिक्षण सह कार्यशाला में 100 से अधिक किसानों ने प्रतिभागिता करते हुए हरे चारे के अधिक से अधिक उत्पादन तथा इसके उपयोग पर विस्तृत जानकारी प्राप्त किया।

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