भारतीय लोक संस्कृति की समृद्ध परंपरा एवं नवाचार पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ सरोज ढींगरा और पं. विजय शंकर मिश्र बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे। साथ ही सुश्री कल्पना सहाय, डॉ राम भजन सिंह, सुश्री सुषमा शर्मा, श्री प्रवीण शेखर, श्री अजय मुखर्जी, सुश्री ऋतिका अवस्थी, डॉ रवि नंदन सिंह, डॉ श्लेष गौतम, डॉ अनुपम परिहार, डॉ मृत्युंजय राव परमार, प्रो रेनू जौहरी, डॉ ज्योति मिश्रा, सुश्री अस्मिता मिश्रा, सुश्री तनुश्री कश्यप, सुश्री ऋतिका गुप्ता, डॉ नम्रता देब, डॉ राजा राम यादव, श्री व्योमेश शुक्ल, डॉ उमेश चन्द्रा ने अहम भूमिका निभाई।”व्यंजना द्वारा राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन समुद्र मंथन के समान है, जिससे निकला अमृत ने दशकों तक के लिए लोक संस्कृति के रंग को समाज में और ज्यादा व्याप्त कर दिया है।”: प्रो राजाराम यादव
लोक परिधान प्रतियोगिता में बनारसी साड़ी को लेकर गज़ब दिलचस्पी दिखी। एक प्रतियोगी ने प्रस्तुति के दौरान कहा- “घर अयोध्या हा, पतोहिया इलाहाबाद हईं, लेकिन सड़िया बनारस के ही प्यारी बा।” हनुमान गुप्ता जी के गायन “पहिले पहिल हम कईनी छठी मईया व्रत तोहार” से सभी मंत्रमुग्ध हो उठे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ़ मीडिया स्टडीज के पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ धनंजय चोपड़ा ने विशेष कथा कथन से मानो महफ़िल ही लूट ली। रोचकता इतनी कि कभी आगंतुकों के आंख में पानी तो कभी ठिठककर हंसी देखने को मिली। श्री फौजदार सिंह के आल्हा की प्रस्तुति से दर्शकों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कार्यक्रम की अंतिम कड़ी में नीलोत्पल मृणाल, शिवम् भगवती, रितेश राजवाड़ा, आर के अग्रवाल, रुचि चतुर्वेदी, प्रकाश उदय जैसे दिग्गज कवियों ने कवि सम्मेलन में जमकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया। तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन पर धन्यवाद ज्ञापित करते हुए डॉ मधु शुक्ला ने कहा- “व्यंजना आर्ट एंड कल्चर सोसायटी एक गुलाब के फूल की तरह है, जिसकी हर पंखुड़ी में अद्भुत शोभा होती है। कार्यक्रम का एक-एक सहयोगी उसी पंखुड़ी के समान है। यह लोक संस्कृति उत्सव देश की संस्कृति को संजोए रखने के लिए इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा।”
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