प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए

उमंग सिंघार ‘विश्व आदिवासी दिवस’ की सभी बहनों-भाइयों और युवाओं को जोहार! 9 अगस्त का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया में हमारे अस्तित्व, हमारी जीवंत संस्कृति और हमारे पुरखों के संघर्ष को याद करने का दिन है। मैं जब भी अपने जंगलों, पहाड़ों और अपनी माटी के बीच पहुँचता हूँ, तो मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता है। यह वही माटी है जिसने हमें सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया है। हम आदिवासी केवल प्रकृति के बीच रहते नहीं हैं, हम प्रकृति को जीते हैं। हमारी सोच,…

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व्यंग्य : चल सन्यासी अखाड़े में

सुधाकर आशावादी जिसका काम उसी को साजे, और कोई करे तो मुसीबत बाजे। कहते हैं न कि नाचने के लिए शरीर में क्षमता भी होनी चाहिए और नृत्य कौशल भी। फिर भी कव्वा चले हंस की चाल और अपनी भी चाल भूल जाए। व्यवहार में ऐसा होता ही है। रंगमंच उनके लिए हैं, जो अभिनय में निपुण होते हैं। जिसे अभिनय का अ भी समझ न आए और वह अभिनय करने लगे, तो हंसी का पात्र तो बनता है साथ ही बिन बुलाई मुसीबतों का आमंत्रित कर लेता है। अपने…

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भारतीय संस्कृति में गालियाँ

विवेक रंजन श्रीवास्तव भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। वह समाज का आईना भी होती है। मनुष्य के भीतर जितने भाव हैं, भाषा में उनके उतने ही रूप मिलते हैं। प्रेम है, तो प्रार्थना है। करुणा है, तो आँसू हैं। क्रोध है, तो कटु वचन भी हैं। इन्हीं कटु वचनों का ही एक रूप है गाली। पहली दृष्टि में गाली असभ्यता लगती है पर संस्कृति का अध्ययन हमें बताता है कि किसी भी सामाजिक व्यवहार को केवल नैतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उसके पीछे इतिहास भी होता…

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मानव कल्याण को समर्पित माला के 108 मनके

डॉ. दीपक गोस्वामी 108 केवल एक संख्या नहीं है। यह ब्रह्मांड की धड़कन है। यह वह सूत्र है जो लौकिक और परालौकिक जगत को एक माला के धागे में पिरो देता है। ऋषियों ने इसे यूँ ही नहीं चुना। 108 में सृष्टि का पूरा गणित, विज्ञान और अध्यात्म एक साथ बसता है। वैदिक ऋषि खगोल के सबसे बड़े विद्यार्थी थे। उन्होंने देखा कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास से 108 गुना है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी भी सूर्य के व्यास की 108 गुना है। ठीक…

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सरकारी स्कूल बचेंगे तो बचे, संस्कार और ज्ञान

रचनाकार : डॉ. प्रियंका सौरभ सरकारी स्कूल बचेंगे तो बचे, संस्कार और ज्ञान” केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था, समान अवसर और सामाजिक समरसता के पक्ष में एक भावपूर्ण संदेश है। यह दोहा-गीत सरकारी विद्यालयों की उस महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है, जहाँ केवल पुस्तकें ही नहीं, बल्कि संस्कार, अनुशासन, समानता, लोकतांत्रिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएँ भी विकसित होती हैं। किसान, मजदूर और सामान्य परिवारों के बच्चों के सपनों को उड़ान देने में सरकारी विद्यालयों का योगदान अतुलनीय रहा है। यह रचना शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर…

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असहमति का सम्मान ही लोकतंत्र की सच्ची कसौटी

विवेक रंजन श्रीवास्तव इतिहास का एक विचित्र दृश्य बार-बार सामने आता है। जब किसी समाज को किसी विचार से असहमति होती है, तब वह पहले उसके तर्कों का उत्तर नहीं देता, बल्कि किसी समय स्थापित की गई प्रतिमाएं गिराने लगता है। पत्थर टूटते हैं, कांस्य बिखरता है, नामपट्टिकाएँ उखाड़ दी जाती हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या विचार भी हथौड़े की चोट से टूट जाते हैं? सन् 2003 में बगदाद में सद्दाम हुसैन की विशाल प्रतिमा गिराई गई। वह केवल एक शासक की मूर्ति नहीं थी, एक युग के…

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समय की मांग : व्यापक, न्यायसंगत और आवश्यकता आधारित आरक्षण

डॉ. शैलेश शुक्ला भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समान उपलब्धता के सिद्धांत पर आधारित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि सदियों से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं। इसी सोच के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। उस समय यह भी अपेक्षा थी कि यह व्यवस्था संविधान लागू होने से 10 वर्ष की अवधि के लिए एक संक्रमणकालीन…

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बरखा बहार,सावन और कजरी एक दूसरे के पर्याय – अशोक बेशरम

गांव की चौपालों में कजरी गीतों का रागरंग सहेजें लोक कलाकार कभी तीन दशक पहले सावन और बरखा बहार में गांव-गांव की चौपालों और खेत सिवानों से उठने वाली कजरी की गूंज और बागों में पड़ने वाले झूलों का वह आलम अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। हमारी लोक संस्कृति और सामाजिक परंपरा के ताने-बाने से बुने कजरी गीतों की विविधता का वह लोकरंग आम आदमी के जीवन की आपाधापी में कहीं गुम सा हो रहा है। कजरी का वह लोक स्वरुप जहां एक ओर समुद्र रूपी जल कलश को…

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मुख्यमंत्री मोहन यादव का जन विश्वास अभियान या पहले से तय ‘सब चंगा है जी’ इवेंट?

पवन वर्मा-‘ मध्य प्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा भी था, जब मुख्यमंत्री निवास सत्ता के केंद्र के साथ आम जनता की उम्मीदों का दरवाजा भी हुआ करता था। स्वर्गीय अर्जुन सिंह, स्वर्गीय मोतीलाल वोरा, स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा, दिग्विजय सिंह, उमा भारती और स्वर्गीय बाबूलाल गौर जैसे मुख्यमंत्री सप्ताह में एक दिन कुछ घंटे आम नागरिकों से मिलने के लिए तय रखते थे। कोई किसान अपनी जमीन का विवाद लेकर पहुंचता था, कोई कर्मचारी अपनी सेवा संबंधी समस्या तो कोई गरीब अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री के सामने खड़ा हो…

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पंजाब मॉडल युद्ध नशेआं विरुद्ध का राष्ट्रीय विस्तार समय की मांग

एडवोकेट किशन सनमुखदास  वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी में नशा और मादक पदार्थों का अवैध व्यापार केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है,बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य,पारिवारिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण,युवा भविष्य,आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बहु आयामी चुनौती बन चुका है। नशीले पदार्थों का जाल किसी एक व्यक्ति को प्रभावित करके नहीं रुकता, बल्कि धीरे-धीरे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिरता, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करता है। जब किसी घर का युवा,पति,पिता, भाई या अन्य सदस्य नशे की गिरफ्त में आता है,तब उसका सबसे गहरा और दीर्घकालिक…

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