शिक्षा का मजदूर: आज का शिक्षक

डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती अध्यापिका बैंगलोर, कर्नाटक शिक्षक शब्द सुनते ही हमारे मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उमड़ती है जो हाथ में पुस्तक लिए छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन करता है, उन्हें नई दिशा देता है और उनके व्यक्तित्व का निर्माण करता है। एक शिक्षक केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि विद्या और संस्कार का प्रतीक होता है। परंतु वर्तमान समय में देखा जाए तो आज की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता इससे काफी अलग नजर आती है। आज का शिक्षक इस प्रणाली का एक ऐसा मजदूर बनकर रह गया है, जिसके…

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पितृपक्ष : स्मृति, श्रद्धा और संस्कारों का पर्व

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र (“ज्योतिष : जीवन पथ का विज्ञान” ज्योतिषीय ग्रन्थ के लेखक) मानव जीवन केवल वर्तमान का नाम नहीं है। हमारे अस्तित्व के पीछे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और असंख्य पूर्वजों की एक दीर्घ वंशपरम्परा विद्यमान है। हम जिस परिवार, संस्कार, संस्कृति, भाषा, आचार-विचार और जीवन-मूल्यों को प्राप्त करके आगे बढ़ते हैं, उनके निर्माण में हमारे पूर्वजों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष योगदान रहता है। इसी कृतज्ञता, स्मरण और उत्तरदायित्व की भावना को भारतीय ज्ञानपरम्परा ने पितृपक्ष के रूप में एक विशिष्ट आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक स्वरूप प्रदान किया है।…

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अंग की धरती पर मुक्ति का संदेश:भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक

कुमार कृष्णन भागलपुर को केवल गंगा, रेशम और विक्रमशिला से जानना अधूरा है। शहर से कुछ दूर नाथनगर का चंपापुर उस प्राचीन स्मृति का द्वार खोलता है, जहां जैन परंपरा के बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की जीवनगाथा जीवित है। चंपापुर को उनकी पंचकल्याणक (गर्भ,जन्म,तप, केवलज्ञान और मोक्ष) भूमि माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक मनाया जाता है। इस अवसर पर निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। यह अनुष्ठान जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण वह दर्शन है जिसके केंद्र में कर्मबंधन से मुक्ति और आत्मा…

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पितृपक्ष: पित्रों के स्वागत, आशीष, नमन और वंदन का महापर्व

डॉ.दीपक गोस्वामी मनुष्य अपने जन्म का निर्माता स्वयं नहीं होता। उसकी देह,भाषा,संस्कार, परिवार और जीवन की आधारभूमि उसके पहले की पीढ़ियों से आती है। जिनके कारण हम हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होना ही पितृऋण की पहली पहचान है और उसी कृतज्ञता का संस्कारित रूप है श्राद्ध। महालय इसी कृतज्ञता का महापर्व है। भारतीय परंपरा की भावभूमि में पितृपक्ष वह विशेष काल है जब मनुष्य अपनी जड़ों की ओर लौटता है। वैदिक वाङ्मय में पित्रो के लिए स्वधा, तर्पण और स्मरण की परंपरा मिलती है। वाजसनेयी संहिता में पिता, पितामह और…

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जमुई की घटना और सार्वजनिक संवेदना का संकट

रंजीत विद्यार्थी महाभारत में द्रौपदी के अपमान का प्रसंग भारतीय स्मृति में केवल एक स्त्री के साथ हुए अन्याय की कथा नहीं है, वह उस सभा की चुप्पी का भी स्मरण कराता है जिसमें अन्याय सामने था और हस्तक्षेप का साहस कमजोर पड़ा। जमुई की घटना की तुलना उस प्रसंग से करना उचित नहीं होगा। दोनों के संदर्भ और परिस्थितियां अलग हैं। फिर भी यह प्रश्न जरूर उठता है कि जब किसी के साथ सार्वजनिक रूप से अन्याय होता दिखाई दे, तब वहां मौजूद लोगों की जिम्मेदारी क्या है? यह…

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पाँच दिन के सप्ताह के लिए पांच दिन बैंक बंद

डॉ. शैलेश शुक्ला देश के सरकारी बैंकों में 26 से 30 सितंबर तक लगातार पाँच दिन शाखा सेवाएँ प्रभावित रहने की स्थिति बन रही है। 26 सितंबर को चौथा शनिवार है, 27 को रविवार है और 28, 29, 30 सितंबर को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने तीन दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का नोटिस दिया है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने एडवाइजरी में कहा है कि यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने 28 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक हड़ताल प्रस्तावित की है और ग्राहक जरूरी लेनदेन पहले निपटा लें।…

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आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में दिन दहाड़े डकैती

डॉ.दीपक गोस्वामी जिस देश में मंदिर की घंटी से लेकर संसद की बहस तक मानवता की दुहाई दी जाती है, उसी देश में यदि जीवन-रक्षक दवा के मूल्य में दस गुना अंतर सामने आए तो स्पष्ट समझ में आ जाता है कि बीमार आदमी के सामने या तो बाजार बैठा है या मौत का सौदागर। 22 सितंबर, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक कैंसर-रोधी दवा का उदाहरण आया। लगभग 2,700 रुपये में उपलब्ध दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अंकित था। इस असाधारण अंतर पर न्यायालय…

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कैसे हो महिला सशक्तिकरण

आर.सूर्य कुमारी- भारतीय महिलाओं के सामने सबसे विकट समस्या तभी खड़ी हो जाती है जब वे जन्म लेती हैं। अशिक्षित माता-पिता ही नहीं पढ़े-लिखे माता-पिता भी अधिकांश मामलों में बेटा और बेटी के बीच भेदभाव करते हैं। मातृत्व के नाम पर बालिकाओं के साथ भेदभाव होता है। यह मानवीय प्रकृति से ज्यादा हमारी परम्परागत और वैचारिक अशुद्धि है। यहां मत बैठो, यहां मत खड़ी हो,इस तरह की समस्याएं लगभग साठ प्रतिशत बालिकाओं के साथ होती हैं। जबकि आवश्यकता इस बात की होती है कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ बालिकाओं को…

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पुस्तक चर्चा नाभिनाल का अटूट रिश्ता

विवेक रंजन श्रीवास्तव माँ को पढ़ना दरअसल उस मौन को पढ़ना है जिसे वह जन्म से पहले से पल-पल कष्ट सहकर भी आनंद में बदलती है। माँ जीवन का अमर तत्व है और उस पर प्रायः प्रत्येक कवि ने लिखा है। माँ और संतान का रिश्ता एक अदृश्य धागा है जो जन्म के क्षण में शारीरिक रूप से अलग हो जाता है, लेकिन स्मृति, संवेदना और आत्मा के धरातल पर कभी विच्छिन्न नहीं होता। खुदेजा खान और डॉ. मयंक मुरारी द्वारा संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी शाश्वत…

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मोहल्ले में बाजार या बाजार में मोहल्ला

सुधाकर आशावादी जब किसी के घर में आग की लपटें उठती हैं, पड़ोसी तब तक तमाशबीन बने रहते हैं, जब तक आग की लपटें खुद के घर तक नहीं पहुँचती। जमाने का दस्तूर यही है। चालीस बरस पहले किसी ने अपने मकान में दुकान बनाई। सोचा घर बैठे छोटा मोटा व्यापार करके अपना और अपने परिवार का गुजारा कर लूंगा। उसकी देखादेखी पड़ोसियों ने भी अपने मकान में दुकान बनाकर व्यापार करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते आवासीय मोहल्ले ने बाजार का स्वरूप धारण कर लिया। अपनी जमीन,अपना घर,अपना…

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