भारत का राष्ट्र-निर्माण विमर्श बनाम सामाजिक यथार्थ:

भारत में सांप्रदायिक हिंसा 2025:- गिरावट के आंकड़े,गहरी होती सामाजिक दरारें और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती हिंसा का स्वरूप बदलना,अधिक विकेंद्रित, अनियोजित, व्यक्तिगत या भीड़-आधारित होना,समाज के भीतर गहरे अविश्वास और नफरत की निरंतर मौजूदगी को दर्शाता है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – 14 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित पोंगल महोत्सव के मंच से भारतीय प्रधानमंत्री का यह कथन कि राष्ट्र निर्माण में किसानों का महत्वपूर्ण योगदान है,केवल एकसांस्कृतिक या औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की ओर…

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यौन शोषण के अड्डे बनते स्कूल-कॉलेज

शिक्षा और सुरक्षा के बीच फँसी छात्राएँ: यौन शोषण के अड्डे बनते स्कूल-कॉलेज – डॉ. प्रियंका सौरभ शिक्षा को भारतीय समाज में ‘मंदिर’ कहा जाता रहा है—एक ऐसा पवित्र स्थान जहाँ ज्ञान, संस्कार और भविष्य का निर्माण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से शिक्षण संस्थानों से यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण, डर और असुरक्षा की खबरें सामने आ रही हैं, उसने इस धारणा को गहरी चोट पहुँचाई है। सवाल यह नहीं है कि घटनाएँ हो रही हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारे स्कूल, कॉलेज…

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नार्को-टेरर-मिशन ड्रग फ्री इंडिया @2029:नशे के खिलाफ़ भारत की निर्णायक लड़ाई

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत ने पिछले एक दशक में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जिस प्रकार का निर्णायक बदलाव देखा है, वह न केवल राष्ट्रीय राजनीति बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समुदाय के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है। नक्सलवाद, जिसे लंबे समय तक भारत की सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना गया, उसके विरुद्ध 31 मार्च 2026 तक समाप्ति का लक्ष्य तय कर जिस तरह ठोस, बहु-स्तरीय और निरंतर अभियान चलाया गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत समन्वय…

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एक ‘सहभोज’ ने कैसे बढ़ाया, उत्तरप्रदेश का सियासी पारा!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• इन दिनो उत्तरप्रदेश के सियासी गलियारोँ मे एक ही बात की अनुगूँज उठ रही है– आदित्यनाथ योगी का सिँहासन डोल रहा है और इसके पीछे उनके अपने ही लोग हैँ, जो एक-दूसरे की विरुदावली गाते आ रहे थे। वैसे तो शीत-युद्ध के रूप मे इसकी शुरूआत उस समय से ही हो गयी थी, जब केशवप्रसाद मौर्य को उत्तरप्रदेश-भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था और उनके नेतृत्व मे राज्य मे भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन किया गया था, तब यह सुनिश्चित…

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मनरेगा और जी-राम-जी: कल्याणकारी राज्य की बदलती परिभाषा

कल्याणकारी राज्य की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ संकट के समय कैसे खड़ा होता है। भारत जैसे देश में, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था आज भी अस्थिर कृषि, मौसमी श्रम और असंगठित रोज़गार पर टिकी है, वहाँ रोज़गार की सुरक्षा केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न है। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम—मनरेगा—ने वर्ष 2005 में भारतीय कल्याणकारी राज्य की परिभाषा को नया अर्थ दिया था। अब, विकसित भारत @2047 की राष्ट्रीय परिकल्पना…

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देश को बचाने के लिए अरावली को भी बचाना हे।

* लेखक : प्रतिक संघवी राजकोट गुजरात अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो दिल्ली से गुजरात तक लगभग 650 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह न केवल भूगर्भीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरणीय, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी अपरिहार्य है। हाल के वर्षों में, खनन, निर्माण और निजीकरण की योजनाओं के कारण इसकी सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों ने अनपेक्षित रूप से विपरीत प्रभाव डाला है, जबकि अन्य आदेशों का पूर्ण पालन नहीं होने…

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जब जांच ही अधिकारों का उल्लंघन बन जाए

नार्को टेस्ट और संविधान : अधिकार, नैतिकता और न्याय – डॉ सत्यवान सौरभ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनैच्छिक नार्को‑विश्लेषण परीक्षणों को पुनः असंवैधानिक करार देना भारतीय लोकतंत्र में संविधान की सर्वोच्चता की एक महत्वपूर्ण पुनःघोषणा है। यह निर्णय केवल आपराधिक जांच की किसी एक तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की दंडात्मक शक्ति, व्यक्ति की गरिमा और न्याय व्यवस्था की नैतिक दिशा पर गहरा प्रश्न उठाता है। आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों से समझौता…

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संसद का अवरुद्ध स्वर और लोकतंत्र की कसौटी

लगातार व्यवधानों के दौर में संसदीय लोकतंत्र को सशक्त करने की संस्थागत राह — डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय संसद लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है। यही वह मंच है जहाँ जनता की विविध आकांक्षाएँ, असहमतियाँ और अपेक्षाएँ बहस के माध्यम से नीति और कानून का रूप लेती हैं। किंतु हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होने, प्रश्नकाल के स्थगित रहने, विधेयकों के बिना पर्याप्त चर्चा पारित होने और सदन के समय से पहले स्थगन ने इसकी गरिमा और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। संसद, जो…

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भिवानी से इंकार, हमको चाहिए जिला हिसार : सिवानी की एक दशक पुरानी, न्यायसंगत पुकार

(अगस्त 2016 से जन-जन तक: सिवानी मंडी की आवाज़ और जिला पुनर्गठन का प्रश्न, एक नारा, एक विचार और सिवानी के भविष्य का सवाल।) – डॉ. प्रियंका सौरभ लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सीमाएँ पत्थर की लकीर नहीं होतीं। वे जनता की सुविधा, सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं और क्षेत्रीय संतुलन के अनुरूप समय-समय पर पुनः परिभाषित की जाती हैं। जब कोई प्रशासनिक ढांचा लगातार जनता के लिए असुविधा का कारण बने, तब उसका पुनर्विचार न केवल आवश्यक, बल्कि शासन की संवेदनशीलता की कसौटी भी बन जाता है। सिवानी मंडी उपमंडल को लेकर जिला…

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ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती यहूदी-विरोधी हिंसा: आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक संतुलन

-डॉ. सत्यवान सौरभ ऑस्ट्रेलिया को लंबे समय तक एक ऐसे बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र के रूप में देखा गया है, जहाँ विविध धार्मिक, नस्ली और सांस्कृतिक समुदायों ने अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अनुभव किया। यहूदी समुदाय भी इस सामाजिक संरचना का एक सशक्त और सम्मानित हिस्सा रहा है। किंतु हाल के वर्षों में, विशेषकर 2023 के बाद, यहूदी संस्थानों, सभास्थलों और व्यक्तियों के विरुद्ध लक्षित हिंसा की घटनाओं में वृद्धि ने इस धारणा को गंभीर चुनौती दी है। आगज़नी, नफ़रत भरी ग्रैफिटी, धमकियाँ और हमलों की घटनाएँ केवल आपराधिक कृत्य नहीं हैं,…

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