सामूहिक सामर्थ्य की ओर…

विस्तार हुआ अब ज़रूरत है, आधार बनाने की, बिखरी हुई हरेक शक्ति को फिर, साथ लाने की। “ब्रिक्स” देशों का समूह नहीं, सपनों का संगम है, दक्षिण की आवाज़ विश्व में, लाने का संकल्प है। अर्थव्यवस्था हो या तकनीक, व्यापार हो या ज्ञान, साझेदारी के मजबूत पुलों से, बढ़े सभी का मान। न कोई छोटा, न कोई बड़ा, साझा हित हो पहचान, मतभेद रहें तो संवाद रहे, यहीं तो हो इसकी शान। भारत धरा से उठे स्वर, विश्व-व्यवस्था राह दिखाए, विविधताओं में एका रख, संतुलन के दीप जलाए। विस्तार तभी…

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हिंदी: मिट्टी की लोरी, मन की बोली

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय असिस्टेंट प्रोफेसर, देवरिया, उत्तर प्रदेश सितंबर आते ही हिंदी के आँगन में एक जानी-पहचानी हलचल लौट आती है। विद्यालयों की दीवारों पर निबंधों के पोस्टर सज जाते हैं, प्रार्थना-सभाओं में कविताएँ गूँजने लगती हैं, कार्यालयों में ‘हिंदी पखवाड़ा’ के बैनर टँग जाते हैं और कुछ दिनों के लिए हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर देवनागरी में शुभकामनाओं के दीप जलने लगते हैं। व्हाट्सऐप पर ‘हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ’ के संदेश फॉरवर्ड होते हैं। चौदह सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं, पर क्या हमने एकांत में बैठकर…

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समाज सुधार, शिक्षा और राष्ट्रसेवा के महान प्रेरणास्रोत स्वामी ब्रह्मानंद जी

डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत स्वामी ब्रह्मानंद का व्यक्तित्व महान था। उन्होंने समाज सुधार के लिए काफी कार्य किए। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने जहां स्वयं को समर्पित कर कई आंदोलनों में जेल काटी। आजादी के बाद देश की राजनीति में भी उनका भावी योगदान रहा है। स्वामी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही कार्य किए। समाज के लोगों को शिक्षा की ओर ध्यान देने का आह्वान किया। स्वामी ब्रह्मानंद महाराज का जन्म 04 दिसंबर 1894 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की राठ तहसील के बरहरा नामक गांव…

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शुभ मुहूर्त में जन्म या सुरक्षित प्रसव ?

(पूरन चन्द्र शर्मा मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम बंगाल कूचबिहार के कुछ सरकारी और निजी अस्पतालों में कई भावी माता-पिताओं ने इच्छा व्यक्त की कि उनकी संतान का जन्म श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिन हो। इसके लिए कुछ परिवारों ने प्राकृतिक प्रसव की प्रतीक्षा करने के स्थान पर निर्धारित समय पर प्रसव अथवा सिजेरियन कराने के विषय में चिकित्सकों से चर्चा की। इसके पीछे उनकी धार्मिक आस्था थी कि जन्माष्टमी के दिन जन्म लेने वाली संतान को भगवान श्रीकृष्ण का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होगा।           भारतीय…

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मौत का जाम…!

सागर की धरती रो पड़ी, आँखों में है नमी, किसने घोला ज़हर, बाँटी हैं मौत की ग़मी? जाम समझ बढ़े, “जिंदगी” हाथ से छूट गई, घर की चौखट सूनी, लाखों उम्मीदें टूट गईं। वो किसके लाल ग्यारह, बहुतों के थे सहारे, हर माँ की आँखें पूछ रहीं, कहाँ मेरे दुलारे? शराब नहीं, ये ज़हर था, घर-घर शोक दिया, लालच की आँधी ने घर संसार झोंक दिया। सात दुकानों पे ताले, सवाल अभी बाकी है, कानून की चौखट पे जवाबदेही की बारी है। कितना बिकता रहेगा ज़हर, यूं घर उजड़ेंगे? चंद…

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सैप्टिक टैंक हादसे:चमचमाते शहरों के नीचे दम तोड़ती जिंदगियां

कुमार कृष्णन तमिलनाडु के त्रिची जिले में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दो युवकों की मौत महज एक दुखद दुर्घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें शहरों और गांवों की स्वच्छता का बोझ उठाने वाले श्रमिकों की जिंदगी को आज भी सबसे सस्ता संसाधन समझ लिया जाता है।           2 सितंबर को अन्नई नगर, वडुगरपट्टी के पास लगभग बारह फुट गहरे सेप्टिक टैंक में जहरीली गैस के संपर्क में आने से 25 वर्षीय एम. गणेश और 26 वर्षीय बिहार निवासी मुकेश कुमार…

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हनुमान अंश: वह फिल्म जिसने दर्शकों को श्रद्धालु बना दिया

महेन्द्र तिवारी भारत में समय समय पर ऐसी फिल्में आती रही हैं जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि समाज की भावनाओं, संस्कृति और आस्था से गहरा संवाद स्थापित करती हैं। वर्ष 2026 की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हनुमान अंश भी ऐसी ही एक कृति है। संत नीम करौली बाबा के जीवन, उनकी करुणा, सेवा और हनुमान भक्ति से प्रेरित यह फिल्म शुरुआत में साधारण मानी गई, लेकिन कुछ ही सप्ताह में इसने करोड़ों दर्शकों के हृदय में विशेष स्थान बना लिया। आश्चर्य की बात यह है कि न इसमें बड़े सितारों की…

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हादसे होने दो जेन-जी,पर तुम नाराज मत होना

(विवेकानंद दिल्ली में एक हॉस्टल गिरा और पांच छात्रों की मौत हो गई। पांच युवाओं के सपने, पांच परिवारों के अरमान बिल्डिंग के मलबे में दफन हो गए। इसके बाद सरकार ने क्या-क्या किया होगा, किसी बच्चे से भी पूछ लीजिए सारी कार्यवाही क्रम से बता देगा। दरअसल यह औपचारिकताएं हर राज्य में हर घटना के बाद होती हैं। इसलिए लोगों को रट चुकी हैं। किसी भी राज्य में कोई भी सरकार कभी भी हादसों से सबक लेते नहीं दिखी। हादसा, कार्रवाई और कुछ दिन में सब बराबर, यह नियति…

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हनुमान अंश : हिंदुस्तान की जड़ों से संवाद करता सिनेमा

संजय एम तराणेकर)   भारत को समझने के लिए केवल उसके शहरों, बाजारों और आधुनिकता को देखना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझना हो तो उसकी जड़ों तक पहुँचना होगा-उसकी आस्था, लोक-स्मृति, संस्कृति और उन कथाओं तक, जिन्होंने सदियों से उसके सामूहिक मन को आकार दिया है। इसी संदर्भ में ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म का महत्व केवल उसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह जाता।   यह फिल्म इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उसने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें उनकी अपनी सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ने का…

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निज भाषा का चाँद: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र*

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय*     *स्तंभकार* हर साल 9 सितंबर आते ही हिंदी साहित्य अपने पितामह के दरवाजे पर सिर झुकाता है। काशी की एक तंग गली, एक हवेली और उस हवेली में जन्मा एक बालक — जिसने कुल 34 साल और 4 महीने के जीवन में वह कर दिखाया, जिसे करने में सदियों लग जाती हैं। वह बालक था हरिश्चंद्र, जिसे दुनिया ने बाद में ‘भारतेन्दु’ कहा, यानी भारत का चंद्रमा। 1850 का भारत, गुलामी का अंधेरा, अंग्रेजी हुकूमत की धाक, और ऐसे में एक किशोर का यह संकल्प…

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