न्याय कहीं अँधेरे में…!

आज तख्तों पर बैठे फ़ैसले, सत्य अभी भी कटघरे में है। ताक़त के आगे झुकता जग, न्याय लगा कहीं अँधेरे में है। जहाँ में रोते बच्चे, उजड़े घर, यहाँ ख़ामोश हुआ हर इंसान। युद्धों की धधक रहीं आग में, यूं जलता जा रहा है सम्मान। यहाँ कानून की मोटी किताबें, सिर्फ़ शब्दों का बोझ हैं बनीं। न जाने निर्दोषों की टूटी साँसें, किसके हिस्से की खोज बनीं? जब ताक़त ही सच कहलाए, तब न्याय कहाँ टिक पाएगा? यदि मानवता संसार हार गई, तो इतिहास क्या दोहराएगा? उठो, विवेक की लौ…

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सड़क दुर्घटनाएँ: व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुशासन की चुनौती

  – डॉ. सत्यवान सौरभ भारत आज विश्व में सड़क दुर्घटनाओं से सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 1.77 लाख लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई। यह संख्या किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी से कम नहीं है। प्रत्येक दिन सैकड़ों परिवार अपने किसी प्रियजन को खो देते हैं, हजारों लोग स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाते हैं और देश को उत्पादक मानव संसाधन तथा अरबों रुपये की आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। इसलिए सड़क दुर्घटनाओं को केवल चालक…

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पुस्तक समीक्षा ******** न के बाद भी खड़ी रही “सम्पा”

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर संजीव पालीवाल सर और मीनाक्षी चौधरी जी द्वारा लिखित “सम्पा” किताब मुझे तीन दिन पहले ही मिली और तीन ही दिन में पढ़ भी डाली। ये पहली किताब है जिसे मैंने इतने कम समय में पढ़ डाली जिसका कारण शानदार लेखन के साथ-साथ विषय वस्तु भी आकर्षक है। दो मंझे हुए लेखकों के कर कमल से लिखी गई सच्ची कहानी पर आधारित ये किताब वो दस्तावेज है जो समाज और नेताओं की नियत पर सैंकड़ो सवाल खड़े करती है। ज़्यादातर मैं प्रेम कहानी या अपराध आधारित…

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भारत बन गया दुनिया का डॉक्टर

 यह कहना बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत आज ‘दुनिया के डॉक्टर’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। अपनी उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं, किफ़ायती दवाओं और वैश्विक संकटों में अपनी अग्रणी भूमिका के कारण भारत ने मानवता की सेवा में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।वैसे भी प्राचीन काल से ही भारत ‘आयुर्वेद’ और ‘सुश्रुत’ की विरासत के माध्यम से चिकित्सा जगत का मार्गदर्शक रहा है। लेकिन आधुनिक युग में, भारत ने तकनीकी प्रगति और दुनिया के स्वास्थ्य मानचित्र पर अपनी एक अनिवार्य जगह बना ली है। बीते कुछ दशकों में वैश्विक परिदृश्य पर भारत की…

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विमान हादसों में नेताओं की असमय विदाई

 डॉ. सत्यवान सौरभ भारत की राजनीतिक यात्रा बार-बार आकाशी हादसों की भेंट चढ़ती रही है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती विमान दुर्घटना ने एक बार फिर पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। पांच लोगों की मौत के साथ राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हुआ, जिसकी भरपाई केवल संवेदनाओं से संभव नहीं। यह पहला मामला नहीं है—संजय गांधी (1980), माधवराव सिंधिया (2001), वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (2009) जैसे उदाहरण बताते हैं कि उच्च पदस्थ नेताओं की अकाल मृत्यु बार-बार एक ही प्रश्न खड़ा करती है: क्या विमान हादसे महज़…

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कन्यादान नहीं, सम्मान चाहिए

 डॉ. प्रियंका सौरभ आज विश्व बालिका दिवस मनाया जा रहा है। देश और दुनिया में इस अवसर पर अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ और प्रतीकात्मक आयोजन हो रहे हैं। मंचों से बालिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तीकरण की बातें कही जा रही हैं। लेकिन यह प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या किसी एक दिवस का आयोजन वास्तव में उस गहरी सामाजिक समस्या का समाधान कर सकता है, जो पीढ़ियों से बालिकाओं के जीवन को प्रभावित करती आ रही है। सम्मान किसी कैलेंडर की तारीख से तय नहीं होता, बल्कि वह समाज…

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डॉ. प्रियंका सौरभ की बाल काव्य पुस्तकें:

डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा शिक्षा विभाग में राजनीति विज्ञान की पीजीटी लेक्चरर हैं तथा राजनीति विज्ञान में पीएचडी धारक। उनकी बाल कविता पुस्तकें “बच्चों की दुनिया और परियों से संवाद” बच्चों के लिए अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक हैं। ये काव्य संग्रह बाल मन की मासूमियत को परियों के जादुई संवादों से सजाते हैं, नैतिक शिक्षा प्रदान करते हुए कल्पना की उड़ान भराते हैं। लेखिका का संक्षिप्त परिचय डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा के सरकारी स्कूलों में छात्रों को राजनीतिक सिद्धांत, लोकतंत्र और शासन व्यवस्था सिखाती हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें बाल…

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77वां गणतंत्र दिवस 2026:वंदे मातरम के 150 वर्ष,

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत एक बार फिर इतिहास के ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है,जहां परंपरा और भविष्य एक-दूसरे से हाथ मिलाते दिखाई दे रहे हैं।26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है और इस बार यह समारोह केवल एक संवैधानिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना,सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक कूटनीति का भव्य प्रदर्शन बनने जा रहा है। कर्तव्य पथ पर होने वाला यह आयोजन भारत की उस यात्रा का प्रतीक है,जिसमें वह औपनिवेशिक विरासत से निकलकर आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी…

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गणतंत्र के 77 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य का संकल्प

– डॉ. सत्यवान सौरभ भारत का गणतंत्र आज 77 वर्ष का हो चुका है। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने एक नई भारत की नींव रखी, जो स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों से प्रेरित थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हमने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की—साहित्य, खेल, कृषि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर आर्थिक-सैन्य क्षमता तक। विविध संस्कृति को मजबूत करते हुए राष्ट्र ने वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई। चंद्रयान मिशनों से अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी बने, यूपीआई जैसी डिजिटल क्रांति ने भुगतान व्यवस्था बदल दी, जबकि ओलंपिक-एशियाड में पदकों…

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माँ-बाप की नीयत, परवरिश और टूटते घर

– डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय समाज में माता-पिता को सर्वोच्च नैतिक स्थान प्राप्त है। उन्हें त्याग, तपस्या और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि माँ-बाप कभी गलत नहीं हो सकते। उनकी हर बात आदेश है, हर निर्णय अंतिम सत्य। लेकिन बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह धारणा अब कई सवालों के घेरे में है। आज जब पारिवारिक विघटन, तलाक, अलगाव और घरेलू तनाव की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब यह जरूरी हो गया है कि हम ईमानदारी से यह स्वीकार करें—माँ-बाप भी…

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