अपने घर से बेघर हिंदी

– शिक्षाविद उदयराज मिश्र

फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक अलफांसे दौडेत के अनुसार मातृभाषा एक प्रकार से दासता के विरुद्ध स्वाधीनता की चाभी होती है,जो राष्ट्र अपनी भाषा का सम्मान और संवर्धन नहीं करता है,वह पराधीन हो जाता है।इसी तरह भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने भी अपनी भाषा की उन्नति को सभी प्रकार की उन्नतियों का मूल कहकर हिंदी के संवर्धन की बात कही है।किंतु आज जिस तरह से महाराष्ट्र,कर्नाटक,आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु की प्रांतीय सरकारें हिंदी का अपमान और विरोध कर रही हैं,तथा हिंदी भाषाभाषी प्रांतों में जिस तरह से अंग्रेजियत को बढ़ावा देने वाले अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही है उसके मद्देनजर यही कहा जा सकता है कि हिंदी को अपने ही घर से बेघर करने का ये दौर भारतीयता पर भी उठता प्रश्नचिन्ह और राष्ट्रीयता के विरुद्ध किसी छद्मयुद्ध से कम घातक नहीं है।सत्य तो यह है कि हिंदी को मुंह चिढ़ाते हिन्दुस्तानियों के बारे में कुछ भी लिखना बेमानी होगा और न लिखना समय के साथ किए गए छल जैसा अपराध होगा।
वस्तुत:“भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि सोचने और जीने का तरीका है।”भारत विविधताओं का देश है जहाँ 22 अनुसूचित भाषाएँ और सैकड़ों बोलियाँ बोली जाती हैं। इस विविधता के बीच हिंदी का स्थान विशेष है। यह करोड़ों भारतीयों को जोड़ने वाली भाषा है। संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया। तब से प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को “हिंदी दिवस” मनाया जाता है।
हिंदी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि हमारी मातृभाषा केवल सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वाभिमान का आधार भी है। परंतु वर्तमान समय में अंग्रेज़ी का बढ़ता वर्चस्व एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या हिंदी केवल “भावनात्मक उत्सव” की भाषा रह जाएगी या “व्यावहारिक प्रयोग” की भी?
संविधान सभा में लंबे विमर्श और बहस के बाद हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया। संविधान के अनुच्छेद 343 में स्पष्ट किया गया कि “संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।”महात्मा गांधी ने कहा था—“हिंदी ही वह भाषा है जो पूरे भारत को एक सूत्र में बाँध सकती है।”नेहरू जी ने इसे राष्ट्रीय एकता की भाषा माना।इसलिए हिंदी दिवस केवल भाषाई आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय पहचान की पुनःस्थापना का दिन है।
प्रश्न जहां तक हिंदी की प्रासंगिकता का है तो इसके तमाम महत्वपूर्ण कारण हैं।जैसे –
1. संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम – भारत छोड़ो आंदोलन, नमक सत्याग्रह और जन-जागरण में हिंदी अखबारों ने बड़ी भूमिका निभाई। ‘प्रताप’, ‘आबे-हयात’, ‘हंस’ जैसी पत्रिकाएँ और अखबार जनमानस को जगाने के हथियार बने।
दृष्टांत : जब गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप में अंग्रेज़ी हुकूमत की आलोचना की, तब लाखों लोग हिंदी लेखन से प्रभावित हुए।
2. साहित्य और संस्कृति का संवाहक – कबीर की साखियाँ, तुलसी की चौपाइयाँ, प्रेमचंद के उपन्यास और निराला की कविताएँ हिंदी की आत्मा हैं।
दृष्टांत : जब कोई ग्रामीण किसान ‘गोदान’ पढ़ता है, तो उसे अपनी पीड़ा उसमें झलकती मिलती है। यह वही शक्ति है जो अंग्रेज़ी साहित्य तुरंत नहीं दे सकता।
3. लोकभाषा और जनसंपर्क का साधन – हिंदी आम जनता की भाषा है। रेलवे स्टेशन, खेत-खलिहान, बाज़ार, पंचायत—हर जगह हिंदी संवाद का माध्यम है।
आज अंग्रेज़ी का प्रभाव असंदिग्ध है।शिक्षा प्रणाली – उच्च शिक्षा के अधिकांश पाठ्यक्रम अंग्रेज़ी में हैं।रोज़गार और प्रतिस्पर्धा – बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निजी क्षेत्रों में अंग्रेज़ी को योग्यता का प्रतीक माना जाता है। शहरी समाज में अंग्रेज़ी बोलना आधुनिकता और ‘स्टेटस सिंबल’ माना जाने लगा है।
यह सोचना गलत है कि हिंदी और अंग्रेज़ी प्रतिद्वंद्वी हैं। वास्तव में दोनों का अलग महत्व है।अंग्रेज़ी हमें वैश्विक अवसरों से जोड़ती है।हिंदी हमें अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ती है।यथा पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब छात्रों से हिंदी में संवाद करते थे, तो छात्रों में आत्मीयता जागती थी। किंतु जब वे वैज्ञानिक सम्मेलन में अंग्रेज़ी का प्रयोग करते, तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में सम्मान पाते। यह दोनों भाषाओं के संतुलित प्रयोग का उदाहरण है।
हिंदी दिवस की आज की प्रासंगिकता स्वयं के अस्तित्व को लेकर भी है क्योंकि हिंदी सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक है एवं भाषा से ही संस्कृति जीवित रहती है।इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय एकता का सूत्र भी हिंदी में ही निहित है। भारत की बहुलता में हिंदी एकता का माध्यम है तथा लोकशिक्षा और संचार का उपकरण – जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार हिंदी में अधिक प्रभावी होता है।
इसके साथ ही साथ इंटरनेट, सोशल मीडिया और गूगल ट्रांसलेट जैसी तकनीकों ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया। आज हिंदी यूट्यूब और व्हाट्सएप पर सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है।
बावजूद इसके हिंदी को सर्वजनप्रिय होने की दिशा में अनेक समस्याएं हैं।जिनमें हिंदी बोलने वाले युवाओं में अंग्रेज़ी कॉम्प्लेक्स,सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी की प्रधानता,हिंदी के तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली का अभाव तथा अभिजात्य वर्ग में हिंदी बोलने पर हीनभावना।
हिंदी को वैश्विक स्वरूप प्रदान किए जाने हेतु आवश्यक है कि आज प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा और हिंदी को आधार बनाया जाए, साथ ही अंग्रेज़ी को कौशल भाषा के रूप में सिखाया जाए। प्रशासन और न्यायपालिका में हिंदी का प्रयोग – आदेश और फैसले हिंदी में हों ताकि आम जनता समझ सके। वैज्ञानिक शोध और पुस्तकों का हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराया जाए।युवा पीढ़ी में हिंदी लेखन प्रोत्साहन – ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया और ई-लाइब्रेरी के माध्यम से।सांस्कृतिक गौरव का निर्माण – फिल्मों, धारावाहिकों और संगीत में शुद्ध-सुगम हिंदी का प्रयोग बढ़े।
हिंदी को लेकर भले ही आज के वर्तमान परिवेश में महाराष्ट्र,कर्नाटक,तमिलनाडु आदि प्रांतों की सरकारों द्वारा अलग राग अलापा जाता है किंतु सत्य तो यह है कि आज हिंदी की वैश्विक पहुँच अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों तक है।फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम और त्रिनिदाद में हिंदी प्रवासी संस्कृति की आत्मा है।गूगल के आँकड़ों के अनुसार, इंटरनेट पर हिंदी सामग्री पढ़ने वालों की संख्या अंग्रेज़ी से भी तेजी से बढ़ रही है।
हिंदी दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह तय करना होगा कि अंग्रेज़ी का प्रयोग वैश्विक अवसरों के लिए आवश्यक है।हिंदी का प्रयोग सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अनिवार्य है।अंग्रेज़ी से विश्व को जानें, हिंदी से स्वयं को पहचानें यही हिंदी का समावेशी स्वरूप भी कहता है।हिंदी दिवस का यही संदेश भी है कि भाषा कोई संकीर्णता नहीं, बल्कि स्वाभिमान और संवेदना का आधार है। हमें दोनों भाषाओं का संतुलित प्रयोग करना है, ताकि भारतीयता की जड़ें भी सुरक्षित रहें और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी हम पीछे न हों।

Loading

Related posts