एक दिवस में क्यों बंधे, हिंदी का अभियान

“एक दिवस में क्यों बंधे, हिंदी का अभियान।
रचे-बसे हर पल रहे, हिंदी हिंदुस्तान।।”
— डॉ. प्रियंका सौरभ
हिंदी दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव बनकर न रह जाए, बल्कि हिंदी हमारी चेतना, व्यवहार और जीवन का स्थायी हिस्सा बने—यही इस दिवस की सार्थकता है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा, संवेदना और आत्मगौरव की पहचान भी होती है। इसलिए हिंदी का सम्मान किसी एक दिन तक सीमित नहीं किया जा सकता। यदि हम अपने घर, शिक्षा, तकनीक, प्रशासन और कार्यस्थल पर हिंदी को सहजता से अपनाएँ, तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार संभव होगा। अंग्रेज़ी सीखना बुरा नहीं है, बल्कि आज के वैश्विक युग में अनेक भाषाओं का ज्ञान हमारी क्षमता बढ़ाता है। लेकिन अपनी भाषा के प्रति हीनभावना रखना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। हिंदी को हर दिन, हर पल जीना ही सच्चा हिंदी दिवस है।
हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें अवसर देता है कि हम विचार करें कि हिंदी का स्थान आज हमारे समाज, शिक्षा, साहित्य, प्रशासन और तकनीक में कहाँ है। प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है, बल्कि प्रश्न यह है कि हिंदी का सम्मान केवल एक दिवस तक ही क्यों सीमित रह जाए? भाषा तो जीवन की धारा है। वह किसी कैलेंडर की एक तारीख में नहीं बंध सकती। इसीलिए यह दोहा हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है कि हिंदी का अभियान किसी एक दिवस में क्यों बंधे? हिंदी तो भारतवासियों के जीवन में हर पल रची-बसी रहनी चाहिए।
हिंदी करोड़ों भारतीयों की अभिव्यक्ति और भावनाओं की सशक्त भाषा है। यह देश के अनेक हिस्सों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत की भाषाई विविधता हमारी शक्ति है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, मराठी, पंजाबी, गुजराती, असमिया, उड़िया सहित सभी भारतीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए हिंदी का सम्मान किसी अन्य भारतीय भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि भारतीय भाषाई समृद्धि के सम्मान के साथ होना चाहिए। हिंदी का विस्तार जोड़ने वाला हो, थोपने वाला नहीं।
आज सबसे बड़ी चुनौती हिंदी के सामने किसी दूसरी भाषा का अस्तित्व नहीं, बल्कि अपनी ही भाषा के प्रति विकसित होती हीनभावना है। समाज के एक वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई है कि अंग्रेज़ी में बोलना आधुनिकता और सफलता का प्रमाण है, जबकि हिंदी में सहज संवाद करना पिछड़ेपन की निशानी है। यह मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। अंग्रेज़ी ज्ञान का विरोध किए बिना हमें यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति की योग्यता उसकी भाषा से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, कौशल, मेहनत, सोच और संवेदनशीलता से निर्धारित होती है।
दुनिया के अनेक विकसित देशों ने अपनी भाषाओं को शिक्षा, अनुसंधान और प्रशासन का मजबूत आधार बनाया है। जापान, चीन, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को विकसित किया और साथ ही विश्व की अन्य भाषाओं से भी संवाद कायम रखा। भारत में भी बहुभाषिकता हमारी विशेषता रही है। आवश्यकता इस बात की है कि हम हिंदी और भारतीय भाषाओं को आधुनिक ज्ञान तथा रोजगार के अवसरों से जोड़ें।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित किया है। नीति में जहाँ संभव हो, कम से कम कक्षा 5 तक और अधिमानतः कक्षा 8 तथा आगे भी मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षण के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों की समझ, सहज अभिव्यक्ति और सीखने की क्षमता को मजबूत करना है। बच्चा जिस भाषा में सोचता और अपने अनुभवों को समझता है, उस भाषा में जटिल अवधारणाओं को समझना उसके लिए अधिक स्वाभाविक हो सकता है। आवश्यकता केवल नीति बनाने की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन की है।
हिंदी दिवस पर विद्यालयों, महाविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं। भाषण दिए जाते हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं और हिंदी के गौरव का उल्लेख किया जाता है। यह सब आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि 14 सितंबर को हिंदी के सम्मान में कार्यक्रम हों और अगले दिन कार्यालय की फाइल, डिजिटल प्लेटफॉर्म, संवाद तथा व्यवहार में हिंदी फिर पीछे चली जाए तो उद्देश्य अधूरा रह जाता है। हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ तभी है, जब 14 सितंबर की चेतना 15 सितंबर और उसके बाद के हर दिन में दिखाई दे।
हिंदी को केवल साहित्य और भावनाओं की भाषा मानना भी उसके दायरे को सीमित करना है। हिंदी विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कानून, प्रबंधन, अर्थव्यवस्था और अनुसंधान की भाषा भी बन सकती है। इसके लिए उच्च स्तरीय पुस्तकों, शोध सामग्री, पाठ्यक्रमों और डिजिटल संसाधनों का निर्माण आवश्यक है। ज्ञान जितना अधिक हिंदी में उपलब्ध होगा, उतनी ही अधिक संख्या में लोग उसका लाभ उठा सकेंगे। भाषा का भविष्य केवल उसके बोलने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसमें उपलब्ध ज्ञान और अवसरों से भी तय होता है।
डिजिटल युग ने हिंदी के सामने अभूतपूर्व संभावनाएँ खोली हैं। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल पत्रकारिता, अनुवाद तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हिंदी में सामग्री के निर्माण और प्रसार को आसान बनाया है। आज हिंदी में लिखना और पढ़ना केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। समाचार, ब्लॉग, वीडियो, पॉडकास्ट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और डिजिटल पुस्तकें हिंदी को नई पीढ़ी तक पहुँचा रही हैं। इस अवसर का उपयोग करते हुए हमें हिंदी को तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ाना होगा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन अनुवाद के बढ़ते दौर में हिंदी के लिए गुणवत्तापूर्ण डिजिटल शब्द-संसाधन, कॉर्पस, शब्दकोश और विश्वसनीय ज्ञान-सामग्री तैयार करना भी जरूरी है। यदि हिंदी तकनीकी दुनिया में मजबूत होगी तो वह केवल भावनाओं की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि रोजगार, नवाचार और ज्ञान-विनिमय की प्रभावशाली भाषा भी बनेगी।
हिंदी साहित्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। कबीर की निर्भीक वाणी, तुलसी की लोकचेतना, सूर की भक्ति, प्रेमचंद का सामाजिक यथार्थ, निराला का विद्रोही स्वर और महादेवी वर्मा की संवेदनशीलता हिंदी साहित्य की व्यापकता और गहराई को दर्शाते हैं। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी को इस साहित्य से जोड़ा जाए। साहित्य केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि जीवन और समाज को समझने का माध्यम है। जब युवा हिंदी साहित्य में अपने समय, अपनी संवेदनाओं और अपने प्रश्नों को खोजेंगे, तभी भाषा के साथ उनका संबंध और मजबूत होगा।
हिंदी को जीवंत बनाए रखने की शुरुआत घर से होनी चाहिए। माता-पिता बच्चों से अपनी भाषा में संवाद करें, शिक्षक कक्षा में सहज और प्रभावी हिंदी का प्रयोग करें, कार्यालयों में हिंदी के व्यवहारिक उपयोग को बढ़ावा मिले और सोशल मीडिया पर हिंदी में गुणवत्तापूर्ण सामग्री तैयार की जाए। भाषा किसी सरकारी आदेश से जीवित नहीं रहती; वह समाज के निरंतर प्रयोग से जीवंत रहती है।
साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि हिंदी का सम्मान करने का अर्थ दूसरी भाषाओं का अपमान करना नहीं है। भारत की भाषाई विविधता हमारी पहचान है। एक भारतीय जितनी अधिक भाषाएँ सीखे, उतना ही उसका दृष्टिकोण व्यापक होता है। हिंदी को संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में विकसित करते हुए हमें सभी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान बनाए रखना होगा। हिंदी की शक्ति उसकी समावेशी प्रकृति में है।
हिंदी के विकास में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी सरकार की नहीं हो सकती। लेखक, पत्रकार, शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, तकनीकी विशेषज्ञ और सामान्य नागरिक—सभी की भूमिका है। जब हम अपनी भाषा में लिखने में संकोच नहीं करेंगे, अपने बच्चों को हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे और हिंदी में उपलब्ध ज्ञान की गुणवत्ता बढ़ाने में योगदान देंगे, तभी हिंदी का अभियान जन-अभियान बनेगा।
आज आवश्यकता हिंदी को केवल गौरव की भाषा कहने की नहीं, बल्कि उसे अवसर की भाषा बनाने की है। हिंदी में उच्च शिक्षा, शोध, तकनीकी ज्ञान और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे तो युवाओं का उससे संबंध स्वतः मजबूत होगा। हमें यह धारणा तोड़नी होगी कि सफलता केवल अंग्रेज़ी माध्यम से ही संभव है। सफलता का आधार ज्ञान, परिश्रम, कौशल और आत्मविश्वास है। अपनी भाषा इन क्षमताओं के विकास में बाधा नहीं, बल्कि मजबूत आधार बन सकती है।
हिंदी दिवस इसलिए केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन होना चाहिए। हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम हिंदी का सम्मान केवल मंच पर करते हैं या अपने जीवन में भी उसे स्थान देते हैं? क्या हम अपने बच्चों से हिंदी में बात करने में गर्व महसूस करते हैं? क्या हम हिंदी में ज्ञान और तकनीकी सामग्री उपलब्ध कराने के प्रयासों का समर्थन करते हैं? क्या हम अपनी भाषा को आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप विकसित करने के लिए तैयार हैं?
हिंदी का भविष्य किसी एक दिवस के आयोजनों से तय नहीं होगा। उसका भविष्य हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार, शिक्षा, तकनीक, साहित्य और सामाजिक दृष्टिकोण से तय होगा। हिंदी को यदि हम जीवन की भाषा बनाएँगे, तो वह केवल हिंदी दिवस की पहचान नहीं रहेगी, बल्कि हमारी निरंतर चेतना का हिस्सा बनेगी।
इसलिए हिंदी दिवस पर संकल्प इतना ही नहीं होना चाहिए कि हम हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी का गुणगान करेंगे। संकल्प यह होना चाहिए कि हिंदी हमारे विचारों, व्यवहार और संवाद में हर दिन जीवित रहेगी। क्योंकि हिंदी का वास्तविक उत्सव तब है, जब उसे मनाने के लिए किसी विशेष दिवस की आवश्यकता ही न पड़े।
“एक दिवस में क्यों बंधे, हिंदी का अभियान।
रचे-बसे हर पल रहे, हिंदी हिंदुस्तान।।”
— डॉ. प्रियंका सौरभ
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
हिसार (हरियाणा) – 125005
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  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

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