स्वतंत्र लेखक
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा भारतीय कालगणना और सांस्कृतिक चेतना में ज्ञान और कृतज्ञता के पर्व के रूप में प्रतिष्ठित है। गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह उस शाश्वत परम्परा का स्मरणोत्सव है जिसने भारतीय सभ्यता को निरंतरता, गहनता और दिशा प्रदान की है। यह दिन गुरु-शिष्य सम्बन्ध की गरिमा, ज्ञान के महत्व और कृतज्ञता के भाव का सामूहिक उद्घोष है।
इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। परम्परा के अनुसार इसी दिन महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास को भारतीय ज्ञान-परम्परा का व्यवस्थापक कहा जाता है। उन्होंने श्रुति परम्परा में विद्यमान ज्ञानराशि को व्यवस्थित कर चार वेदों – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभक्त किया। इसके अतिरिक्त अठारह पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत की रचना कर उन्होंने दर्शन, इतिहास, नीति और भक्ति को एक सूत्र में पिरोया। इसीलिए प्रत्येक गुरु को ‘व्यास’ के पद पर आसीन माना जाता है। गुरु ही आधुनिक युग का व्यास है जो शिष्य के समक्ष बिखरे हुए ज्ञान को व्यवस्थित कर प्रस्तुत करता है। बौद्ध परम्परा में भी इस तिथि का विशिष्ट महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश देकर धर्मचक्र का प्रवर्तन किया। जैन परम्परा में गुरु को तीर्थंकर के पश्चात सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। योग परम्परा में आषाढ़ पूर्णिमा को आदियोगी शिव द्वारा सप्तर्षियों को योग विज्ञान प्रदान करने का दिन माना जाता है। इस प्रकार गुरु पूर्णिमा वैदिक, बौद्ध, जैन और योग – सभी ज्ञानधाराओं का संगम बिन्दु बन जाती है।
‘गुरु’ शब्द की व्युत्पत्ति अत्यंत गहन है। संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ निवारक है। अतः गुरु वह तत्व है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर विवेक रूपी प्रकाश प्रदान करता है। गुरु केवल सूचना प्रदाता नहीं है। सूचना और ज्ञान में मौलिक अंतर है। सूचना तथ्य देती है, ज्ञान दृष्टि देता है। गुरु शिष्य को वह चक्षु प्रदान करता है जिससे वह जगत, स्वयं और परम को देख सके। भारतीय चिन्तन में गुरु को त्रिविध रूप में देखा गया है। प्रथम माता-पिता, जो संस्कार के प्रथम गुरु हैं। द्वितीय आचार्य, जो शास्त्र और विद्या के गुरु हैं। तृतीय सद्गुरु, जो आत्मज्ञान और मोक्षमार्ग के गुरु हैं। कबीर ने इसी कारण कहा – “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।” अर्थात ईश्वर तक पहुँचाने का माध्यम गुरु ही है। गुरु की महिमा वेदों से लेकर उपनिषदों तक सर्वत्र वर्णित है। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है कि ब्रह्मविद्या को जानने के लिए श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए। छान्दोग्य उपनिषद में गुरु को ही सत्य का सेतु कहा गया है। इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय ज्ञान मीमांसा का मूलाधार रही है।
गुरु पूर्णिमा हमें तीन मूलभूत सत्यों का स्मरण कराती है। प्रथम यह कि सीखना कभी समाप्त नहीं होता। पूर्णिमा का चन्द्रमा अपनी पूर्णता में भी प्रतिदिन घटता-बढ़ता रहता है। उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति भी निरंतर सीखता रहता है। द्वितीय सत्य कृतज्ञता का है। भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता को सभ्यता का प्रथम लक्षण माना गया है। गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना वस्तुतः ज्ञान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। तृतीय सत्य परम्परा के निर्वाह का है। प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है कि वह पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान को परिष्कृत कर अगली पीढ़ी को सौंपे। आधुनिक युग में जब सूचना प्रौद्योगिकी ने ज्ञान को सुलभ बना दिया है, तब गुरु की आवश्यकता और बढ़ गई है। आज हमारे पास डेटा है, पर विवेक दुर्लभ है। हमारे पास जानकारी है, पर दिशा नहीं। गुरु इसी दिशा का नाम है। वह छांटता है कि क्या ग्राह्य है और क्या त्याज्य। वह शिष्य में जिज्ञासा जगाता है, तर्क की कसौटी पर सत्य को परखना सिखाता है और चरित्र निर्माण में सहायक होता है।
गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। गुरु के चित्र या चरणों का पूजन करते हैं। उन्हें वस्त्र, फल और दक्षिणा समर्पित की जाती है। आश्रमों, विद्यालयों और मठों में प्रवचन, सत्संग और सामूहिक उपासना होती है। परन्तु इन बाह्य कर्मकाण्डों का वास्तविक प्रयोजन आंतरिक शुद्धि है। वास्तविक गुरु-दक्षिणा वही है जो एकलव्य ने दी थी। गुरु के एक वाक्य को जीवन का आदर्श बना लेना। वास्तविक पूजा वही है जिसमें शिष्य गुरु के उपदेशों को अपने आचरण में उतारे। उपनिषदों में कहा गया है – “श्रद्धावान लभते ज्ञानम्”। श्रद्धा के बिना ज्ञान नहीं मिलता और ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती। अतः इस दिन की साधना श्रद्धा और समर्पण की साधना है।
वर्तमान समय में गुरु की अवधारणा का विस्तार हुआ है। अब गुरु केवल व्यक्ति नहीं रहा। एक अच्छी पुस्तक गुरु है, प्रकृति गुरु है, असफलता गुरु है, इतिहास गुरु है। जो भी हमें विनम्र बनाए, जो भी हमें अपने अहंकार से मुक्त करे, वह गुरु है। शिक्षा के क्षेत्र में भी गुरु की भूमिका पुनर्परिभाषित हो रही है। अब गुरु का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं है। उसका कार्य आलोचनात्मक चिंतन विकसित करना, नैतिक साहस देना और वैश्विक नागरिक बनाना है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और मानविकी के बीच सेतु बनाना है। समाज में भी गुरु की आवश्यकता है। राजनीतिक गुरु, सामाजिक गुरु, सांस्कृतिक गुरु। जो समाज को सही दिशा दे सके, जो मूल्यों को पुनर्स्थापित कर सके। इसीलिए महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे व्यक्तित्व युग के गुरु कहलाते हैं।
गुरु पूर्णिमा हमें यह बोध कराती है कि सभ्यता का प्रवाह गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से ही अविरल रहता है। जब यह परम्परा टूटती है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है। इस पूर्णिमा पर हम उन सभी को प्रणाम करें जिन्होंने हमारे जीवन में प्रकाश किया। साथ ही यह संकल्प लें कि हम भी किसी के लिए दीपस्तम्भ बनेंगे। क्योंकि गुरु होने का अर्थ केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि यह उत्तरदायित्व लेना है कि ज्ञान अगली पीढ़ी तक शुद्ध रूप में पहुंचे। अंत में वही प्रार्थना – “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥” ज्ञान, अनुशासन और कृतज्ञता – यही गुरु पूर्णिमा का संदेश है।
![]()
