आज तख्तों पर बैठे फ़ैसले,
सत्य अभी भी कटघरे में है।
ताक़त के आगे झुकता जग,
न्याय लगा कहीं अँधेरे में है।
जहाँ में रोते बच्चे, उजड़े घर,
यहाँ ख़ामोश हुआ हर इंसान।
युद्धों की धधक रहीं आग में,
यूं जलता जा रहा है सम्मान।
यहाँ कानून की मोटी किताबें,
सिर्फ़ शब्दों का बोझ हैं बनीं।
न जाने निर्दोषों की टूटी साँसें,
किसके हिस्से की खोज बनीं?
जब ताक़त ही सच कहलाए,
तब न्याय कहाँ टिक पाएगा?
यदि मानवता संसार हार गई,
तो इतिहास क्या दोहराएगा?
उठो, विवेक की लौ जलाओ,
सत्ता से “सच” मत हारने दो।
धरती सबकी, जीवन सबका,
इंसानियत को जिन्दा कर दो।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986
(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित)
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