बेंगलोर
संजीव पालीवाल सर और मीनाक्षी चौधरी जी द्वारा लिखित “सम्पा” किताब मुझे तीन दिन पहले ही मिली और तीन ही दिन में पढ़ भी डाली। ये पहली किताब है जिसे मैंने इतने कम समय में पढ़ डाली जिसका कारण शानदार लेखन के साथ-साथ विषय वस्तु भी आकर्षक है।
दो मंझे हुए लेखकों के कर कमल से लिखी गई सच्ची कहानी पर आधारित ये किताब वो दस्तावेज है जो समाज और नेताओं की नियत पर सैंकड़ो सवाल खड़े करती है।
ज़्यादातर मैं प्रेम कहानी या अपराध आधारित काल्पनिक किताबें पढ़ती हूँ लेकिन जो कि “सम्पा” की आधी अधूरी कहानी से वाकिफ़ बस इतना ही जानती थी कि हरियाणा की रहने वाली सम्पा आर्या के पति रवींद्र सिंह, जो मर्चेंट नेवी में थे, उनको सोमालिया के समुद्री लुटेरों द्वारा साल 2010 में अगवा किया गया था। सम्पा ने लगभग 11 महीने तक संघर्ष किया और अंततः अपने पति को सुरक्षित वापस लाने में सफल रहीं।
पूरी कहानी पढ़ने के बाद मुँह से दो ही शब्द निकले: सैल्यूट
“मैं थक चुकी हूँ उन दरवाज़ों पर टक्कर मारकर जिन पर नाम तो मंत्रालय का लिखा है पर इन्सानियत नदारद है” ये वाक्य आम इंसान की राजनीति के प्रति असंतुष्टि और निराशा की पराकाष्ठा है। “सम्पा” का संघर्ष चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि आम इंसान की आवाज़ नेताओं तक पहुँचाना मतलब खाली कुएं में ढ़ोल बजाना।
“सम्पा” महज़ एक स्त्री की कोई मामूली कहानी नहीं। ये एक पत्नी के प्रेम, विश्वास, धैर्य और संघर्ष की कहानी है जिसे संजीव जी और मीनाक्षी जी ने शब्दों का रूप देकर जीवंत किया है।
पन्ना दर पन्ना ये कहानी पाठक के भीतर भी ज़िन्दगी से भिड़ने का जज़्बा जगाती है। बस एक ही लक्ष्य ‘पति की घर वापसी’ जिसके लिए हर दिवार से लड़ जाऊँ। यही बात “सम्पा” को दुनिया की हर औरत से खास बनाती है।
साहस शब्द के सही मायने समझाती इस किताब को मेरी तरफ़ से सौ में से सौ अंक हैं।
अच्छा लेखन पढ़ने वाले सभी पाठकों से निवेदन है “सम्पा” को एक बार ज़रूर पढ़िए। ज़िन्दगी के प्रति आपका नज़रिया बदल जाएगा।
संजीव पालीवाल सर और मीनाक्षी चौधरी जी को _”सम्पा”* के लिए ढ़ेरों बधाई एवं शुभकामनाएं। शानदार लिखा है।
पुस्तक— सम्पा
लेखक—- मीनाक्षी चौधरी, संजीव पालीवाल
प्रकाशक– एकदा प्रकाशन, चेन्नई
बर्ष– 2026
मूल्य–399
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