याचिका दर्ज करने वाले वकील ने कहा है कि कई बार एआई ऐसे न्यायिक फैसले बना देता है जो असल में मौजूदा ही नहीं होते हैं और बाद में वे फैसले दस्तावेजों में शामिल भी हो जाते हैं। मुख्य न्यायधीश ने माना कि यह चिंता एकदम उचित है और कहा कि वकीलों और जजों दोनों को एआई-जनित फैसलों की जांच करना सीखना होगा। इसके लिए न्यायिक अकादमी में ट्रेनिंग दी जा सकती है। मुख्य न्यायधीश ने कहा कि, हम एआई का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करते हैं और हम नहीं चाहते कि एआई हमारी निर्णय लेने की क्षमता में बाधक बने”।
एआई मदद कर सकता है, लेकिन फैसला इंसान ही करेगा
इस दौरान मुख्य न्यायधीश में स्पष्ट तरीके से कहा कि एआई केवल मददगार टूल हो सकता है। हालांकि, असनी न्यायिक तर्क और फैसले हमेशा मानव जज ही करेंगे। वकील ने बताया है कि निचली अदालतें भी कई बार ‘अस्तित्वहीन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों’ का हवाला देने लगी हैं। इस पर मुख्य न्यायधीश ने कहा कि न्यायपालिका इन खतरों से वाकिफ है और जजों को लगातार ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि- “जजों को हर चीज क्रॉस-चेक करनी होगी। समय के साथ वकील और हम दोनों सीखेंगे।”
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